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कोरिया@गलती अपनी, बचाव के लिए संगठन का सहारा?

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  • जब कार्यालय में पर्याप्त लिपिक स्टाफ मौजूद है तो बिल पास करने की जिम्मेदारी आपरेटर को क्यों?
  • अब सवाल सीधा है, क्या प्रशासन इस स्थिति को गंभीर विषय मानेगा या इसे फिर “आंतरिक विवाद” कहकर किनारे कर देगा?
  • कोरिया जिले में बढ़ रही मनमानी,कोषालय से लेकर स्कूल तक लापरवाह कर्मचारी,सवालों के घेरे में प्रशासन
  • कोषालय में बढ़ता विवाद: आपरेटर को बिल पासिंग की जिम्मेदारी देने पर उठे सवाल, जांच की मांग तेज


-रवि सिंह-
कोरिया,09 नवंबर 2025
(घटती-घटना)।

कोरिया जिले में एक बार फिर सरकारी कर्मचारियों की कार्यशैली पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। कोषालय में पदस्थ ऑपरेटर भवानी ठाकुर पर गंभीर आरोप लगे हैं, महिलाओं के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी, बिल पास करने के नाम पर उगाही, और कार्यालयीन अनुशासन का खुला उल्लंघन, सूत्रों के मुताबिक कुछ माह पूर्व कलेक्टर ने अपने चैम्बर में भवानी ठाकुर को फटकार लगाई थी, अब जब मामले की खबर प्रकाशित हुई तो उसे गलत ठहराते हुए कर्मचारी संगठन सामने आ गए, सवाल उठता है, क्या संगठन ने कभी यह तस्दीक की कि कलेक्टर ने फटकार क्यों लगाई थी? वाह भवानी ठाकुर वाह! आप कोषालय में बैठकर गलत करो,महिलाओं के खिलाफ टिप्पणी करो,बिल पास करने के लिए उगाही करो और जब खबर का प्रकाशन हो तो उसे ग़लत ठहराकर कार्यवाही से बचने संगठन को आगे करो,कोरिया जिले में बेपरवाह हुए कर्मचारी,करते हैं गलत फिर लेते हैं संगठन का सहारा,कोई लेता है कर्मचारी संगठन का सहारा तो कोई लेता है समाज का सहारा, लेकिन खुद की गलती नहीं देती दिखाई, वेतन से नहीं भरता पेट,वेतन से अतिरिक्त लाभ की रहती है मंशा, इसलिए होती है उगाही? क्या खबर ही हर बार होती है ग़लत? क्या हमेशा पाक साफ रहता है कर्मचारी? ख़बरें विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के आधार पर ही प्रकाशित की जाती हैं,जितना एक पाठक को अखबार पर होता है भरोसा उतना ही एक पत्रकार को अपने सूत्र पर होता है भरोसा, तब मजबूती के साथ टिका रहता है लोकतंत्र का चौथा स्तंभ, वही है आपरेटर भवानी ठाकुर जिसे कलेक्टर ने कुछ माह पहले अपने चेंबर में बुलाकर लगाई थी कड़ी फटकार,क्या संगठन ने इस बात की तस्दीक की? क्या कि भवानी ठाकुर को क्यों कलेक्टर ने फटकारा था? सूत्रों का दावा,दिन में भी होती है शराबखोरी, मौका तलाशकर कई कर्मचारी शराब पीकर करते हैं कोषालय जैसे संवेदनशील जगह में काम, खबर प्रकाशन के बाद फेडरेशन के नेतृत्व में कलेक्टर से मिलने पहुचें कुछ कर्मचारी, कार्यालयीन और स्कूली समय में काम छोड़ कलेक्टर कार्यालय जाना कहां तक था उचित?
कर्मचारी संघों को अपनी भूमिका स्पष्ट करने की आवश्यकता
कर्मचारियों के लिए संघों की आवश्यकता क्यों पड़ी और क्यों कर्मचारी संघों का जन्म हुआ यह बतलाना लंबी चर्चा होगी और कर्मचारी संघों की आवश्यकता क्यों है या पड़ी इससे अंजान शायद ही कोई है ऐसा मानकर यह सवाल जायज है कि कर्मचारी संघों को अपनी भूमिका के बारे में सोचना चाहिए, कर्मचारी संघ आखिर क्यों अपनी भूमिका से विपरीत कार्य कर रहे हैं,कर्मचारियों के हित रक्षा की बजाए क्यों ऐसे संघ उनके शोषक समूह का साथ दे रहे हैं,कोषालयों में क्या कब कैसे सबकुछ होता है यह बताने की जरूरत नहीं,विभिन्न कार्यालयों में लिपिक संवर्गीय कर्मचारियों से किस तरह शोषित है अन्य कर्मचारी समूह यह भी ज्ञात तथ्य है,ऐसे में कर्मचारी संघों को अपनी भूमिका स्पष्ट करनी चाहिए कि वह शोषक समूह के साथ है कि शोषित समूह के साथ।
कार्यालयीन समय में ढाबों पर कर्मचारी, शराबखोरी के आरोप भी
सूत्रों का कहना है कि कोषालय के कुछ कर्मचारी कार्यालयीन समय में ढाबों में देखे जाते हैं, यहां तक कि दिन के समय शराब पीने और नशे में संवेदनशील काम करने के आरोप भी सामने आए हैं। यह स्थिति कोषालय जैसे महत्वपूर्ण कार्यालय के लिए चिंताजनक है। बताया जाता है कि जिला कार्यालय में भी कर्मचारी दिन में शराब का सेवन करके पहुंच जाते हैं, कई कर्मचारी ऐसा करने वाले माने जाते हैं।
शिक्षक ‘नेता’ पहले…‘शिक्षक’ बाद में…
जिले में कई शिक्षक नेता स्कूल समय पर स्कूलों में मौजूद नहीं रहते। अक्सर वे जिला मुख्यालय में बैठकों और संगठनात्मक गतिविधियों में व्यस्त नजर आते हैं। इसका सीधा असर बच्चों की पढ़ाई पर पड़ता है, लेकिन प्रशासन की नजर अब तक इन पर नहीं गई है।
पत्रकार दृष्टिकोण
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ अपने सूत्रों के भरोसे खड़ा रहता है,जैसे पाठक अखबार पर भरोसा करता है, वैसे ही पत्रकार अपने स्रोत पर करता है। यदि खबरें तथ्यों पर आधारित हैं तो उन्हें ‘ग़लत’ ठहराना अनुचित है, अब सवाल प्रशासन के सामने है,क्या वह कर्मचारी संगठन के दबाव में झुकेगा या फिर नियमों के अनुसार जवाबदेही तय करेगा?
कोषालय में बढ़ता विवाद
आपरेटर को बिल पासिंग की जिम्मेदारी देने पर उठे सवाल- कोषालय कार्यालय में कार्य-विभाजन और आचरण को लेकर विवाद गहराता जा रहा है। कार्यालय में पर्याप्त लिपिक स्टाफ मौजूद होने के बावजूद बिलों के पासिंग का कार्य ऑपरेटर भगवानी ठाकुर को दिए जाने पर कर्मचारियों के एक समूह ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह निर्णय नियमों और स्थापित प्रक्रिया के विपरीत है, ऐसे में मामले की निष्पक्ष जांच आवश्यक है, सूत्र बताते हैं कि कुछ माह पूर्व भी भगवानी ठाकुर के कार्य और व्यवहार संबंधी शिकायत कलेक्टर स्तर तक पहुंची थी, उस समय कलेक्टर द्वारा फटकार लगाए जाने की बात सामने आई थी, इसके बावजूद हाल के दिनों में प्राकृतिक आपदा से संबंधित बिलों के समय पर पास नहीं होने को लेकर भी सवाल उठे हैं, कार्यालयीन वातावरण को लेकर भी कर्मचारियों ने चिंता व्यक्त की है। आरोप है कि कार्यालयीन समय में भगवानी ठाकुर कुछ कर्मचारियों के साथ कार्यालय परिसर से बाहर पास के ढाबों में समय व्यतीत करता है, कर्मचारियों की मांग है कि इस विषय में परिसर व आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की जांच कराई जाए।
कर्मचारियों की अनसुनी क्यों? कोषालय में कार्य-विभाजन की आड़ में मनमानी का मुद्दा गंभीर
वहीं कार्यालय में कार्यरत कुछ महिला कर्मचारियों ने असुरक्षा की स्थिति होने की बात भी कही है,आरोप यह भी है कि एक महिला कर्मचारी के साथ पूर्व में दुर्व्यवहार और मारपीट की घटना हुई थी, जिसमें स्थानीय लोगों के हस्तक्षेप की बात बताई गई है, कार्यालय से बाहर कुछ कर्मचारियों द्वारा शाम के समय शराब भट्ठी जाने की चर्चाएं भी सामने आई हैं। यदि यह तथ्य है तो शराब भट्ठी में लगेसीसीटीवी कैमरों की जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है, बताया जा रहा है कि भगवानी ठाकुर ने दो-तीन लिपिक कर्मचारियों के साथ मिलकर गुटबाजी का वातावरण खड़ा किया है, जिससे कार्यालय का कामकाज प्रभावित हो रहा है, कर्मचारियों ने यह भी कहा कि अपने ऊपर लगे आरोपों से बचने के लिए भगवानी ठाकुर ने फेडरेशन का सहारा लिया, जहां कुछ पदाधिकारियों ने बिना तथ्य जांचे समर्थन किया।
खबर प्रकाशन के बाद संगठन का हंगामा…कलेक्टर से मिले कर्मचारी
कोषालय की खबर प्रकाशित होने के बाद कुछ कर्मचारी फेडरेशन के बैनर तले कलेक्टर से मिलने पहुंचे,सवाल यह भी उठ रहा है कि कार्यालयीन और शिक्षण समय में सरकारी कर्मचारी काम छोड़कर कलेक्टर कार्यालय क्यों पहुंचे? क्या यह भी अनुशासनहीनता नहीं मानी जानी चाहिए? वैसे अपनी बात रखना अधिकारियों के समक्ष संगठन का कर्तव्य है लेकिन संगठन भी आखिर क्यों नहीं समीक्षा करता कि कौन सही है और खबर कितनी गलत है,संगठन कर्मचारियों के लिए उनकी सुविधा के लिए होते हैं और संगठनों को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी भी कर्मचारी की वजह से कोई कर्मचारी परेशान न हो यह किसी से उगाही न हो,वहीं यदि वस्तुस्थिति की बात की जाए तो कर्मचारी से कर्मचारी ही वसूली करने के मामले में बदनाम पाया जाता है और वह ऐसा केवल उन सुविधाओं के नाम पर वसूली करता है जो कर्मचारियों का ही हक अधिकार होता है, अवकाश स्वीकृति,लंबित वेतन सहित अन्य विभिन्न स्वत्व भुगतान के लिए कार्यालय से लेकर कोषालय तक की वसूली जग जाहिर है और उसके बावजूद कर्मचारी संगठन इन वसूलियों के खिलाफ आवाज नहीं उठाते वरन वह तब लामबंद होते हैं जब कोई कर्मचारियों अधिकारियों की वसूली से पीडि़त कर्मचारी उच्च अधिकारी से शिकायत करता है या उसकी आवाज लोकतंत्र के चौथे स्तंभ तक पहुंचती है,जब आवाज उठती है तब कर्मचारी संघ जागृत होते हैं और वह बीच बचाव का हल निकालने भीड़ जाते हैं,जो कोरिया जिले में हाल फिलहाल देखा जा रहा है।
कर्मचारी संगठन की भूमिका न्याय में सहायता की होनी चाहिए…न कि तथ्य-रहित समर्थन की?
सबसे गंभीर पहलू कार्यालयीन वातावरण और महिला कर्मचारियों की सुरक्षा से जुड़े आरोप हैं, अगर कार्यस्थल ऐसा हो जाए कि कर्मचारी स्वयं को असुरक्षित महसूस करें, तो यह केवल प्रबंधन की विफलता नहीं, बल्कि प्रशासनिक संवेदनशीलता का पतन है। ऐसी स्थिति में सीसीटीवी फुटेज की जांच, व्यवहार समीक्षा और कार्यस्थल सुरक्षा ऑडिट तुरंत होना चाहिए, चुप्पी यहाँ समाधान नहीं—चेतावनी का समय निकल चुका है। इसके अलावा कर्मचारियों में गुटबाजी और दबाव-राजनीति की बातें भी सामने आई हैं। अपने ऊपर लगे आरोपों से बचने के लिए फेडरेशन या किसी अन्य समूह के नाम का इस्तेमाल करना न केवल अनुचित है, बल्कि इससे कार्यालय का वातावरण और अधिक विषाक्त होता है, किसी भी कर्मचारी संगठन की भूमिका न्याय में सहायता की होनी चाहिए, न कि तथ्य-रहित समर्थन की। यदि जवाब फिर टालमटोल हुआ, तो कल को ये विवाद केवल कार्यालय तक सीमित नहीं रहेंगे — यह व्यवस्था के भरोसे पर चोट करेंगे।


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