गरियाबद , 04 अक्टूबर 2022। गरियाबद शहर से 12 किलोमीटर दूर हरी- भरी पहाडि़यो पर स्थित है निरई माता का मदिर। यह मदिर अपनी तरह का अनोखा मदिर है। माता का मदिर होने के बावजूद यहा न माताओ की एट्री है न बहनो की। इसके अलावा भी यहा बहुत कुछ ऐसा है जिसे सुनकर एकबारगी आप हैरान हुए बिना नही रह सकते। तो जानते है निरई माता मदिर के बारे मे…
जिला मुख्यालय गरियाबद से 12 किमी दूर सोढूल, पैरी नदी के तट पर बसे ग्राम पचायत मोहेरा के अतर्गत ग्राम निरई की पहाड़ी पर विराजमान है मा निरई माता। यह मदिर साल मे सिर्फ एक बार सुबह 4 बजे से 9 बजे तक खोला जाता है। इन पाच घटो के दौरान हजारो देवी भक्त माता के दर्शन करने पहुचते है। पूजा करने के बाद गाव के पुरोहित मदिर के कपाट को फिर एक साल के लिए बद कर देते है। यानी फिर आपको अगले ही वर्ष यहा आने की अनुमति मिलेगी।
और अनुमति मिलेगी भी तो सिफऱ् पुरुषो को
निरई माता मदिर मे औरतो को प्रवेश और पूजा-पाठ की अनुमति है ही नही। यहा सिर्फ पुरुष ही पूजा-पाठ की रीतियो को निभाते है। महिलाओ के लिए इस मदिर का प्रसाद खाना भी वर्जित है। कहते है कि महिलाए अगर मदिर का प्रसाद खा ले तो उनके साथ कुछ न कुछ अनहोनी हो जाती है।
माता को श्रृगार प्रसाधन खुश नही कर पाते
नवरात्रि के दौरान तमाम देवी मदिरो मे सिदूर, सुहाग, श्रृगार, कुमकुम, गुलाल आदि चढ़ाया जाता है, लेकिन निरई माता के मदिर मे भक्त केवल नारियल और अगरबत्ती लेकर ही जाते है क्योकि माता इतने मे ही प्रसन्न हो जाती है। मान्यता है कि निराई माता के दरबार मे भक्त के भय और पीड़ा का नाश होता है। यही कारण है कि हर साल 5 घटे के लिए खुलने वाले इस मदिर मे दूर-दूर से लोग अपनी मनोकामना लेकर पहुचते है।
चढ़ाई जाती है बकरो की बलि
निरई माता के मदिर मे बकरो की बलि भी चढ़ाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि देवी को बकरे की बलि चढ़ाने से वह प्रसन्न होकर अपने भक्त की मनोकामना जरूर पूरी करती है। क्योकि मदिर साल मे एक बार ही खुलता है इसलिए मन्नत लेकर माता के दरबार मे पहुचे कुछ भक्त बकरो की बलि देकर माता को प्रसन्न करते है, तो वही कई अन्य मुराद पूरी हो जाने के बाद बकरे की बलि चढ़ाते है।
स्वतः हो जाती है जोत प्रज्ज्वलित
इस देवी मदिर की खासियत यह है कि यहा हर साल चैत्र नवरात्र के दौरान स्वतः ही ज्योति प्रज्जवलित होती है। इस दैविय चमत्कार की वजह से लोग देवी के प्रति अपार श्रद्धा रखते है। कहा जाता है कि हर चैत्र नवरात्रि के दौरान देवी स्थल पहाडि़यो मे अपने आप से ज्योति प्रज्वल्लित होती है। ज्योति कैसे प्रज्वल्लित होती है, यह आज तक पहेली है। ग्रामीणो की माने तो यह निरई देवी का ही चमत्कार है कि बिना तेल के ज्योति नौ दिनो तक जलती रहती है।
विश्वास ऐसा कि पहाड़ी पर मनोकामना जोत जलाते है ग्रामीण
ग्रामीण बताते है कि माता निरई को लोग सिर्फ विश्वास से ही पूजते है। इसके पीछे 200 साल पुरानी मान्यता है। आज से दो सौ वर्ष पूर्व मोहेरा ग्राम के मालगुजार जयराम गिरी गोस्वामी ने निरई माता की पूजा करने बहुरसिग ध्रुव के पूर्वजो को छ: एकड़ जमीन दान मे दी थी। जमीन मे कृषि कर आमदनी से माता की पूजा पाठ जात्रा आदि सपन्न हो रहा है।लोग पहाड़ी पर जोत जलाकर अपनी आस्था का प्रदर्शन करते है। उनका अटल विश्वास है कि निरई माता उन्हे हर विपçा से बचाएगी,उनकी हर मनोकामना पूरी करेगी।
माता को सख्त नापसद है मास और मदिरा का सेवन
ऐसा कहा जाता है कि अगर कोई व्यक्ति मास, मदिरा का सेवन करके मदिर आने का प्रयास भी करता है, तो जगलो मे रहने वाली मधुमक्खिया उस पर कोप बनकर टूट पड़ती है क्योकि माता को यह सब बिल्कुल पसद नही है।
अब यदि आप इस अनोखे मदिर के बारे मे पढ़ने के बाद साक्षात इसे देखना चाहते है तो आपको चैत्र नवरात्र का इतज़ार करना होगा, क्योकि चैत्र नवरात्र के प्रथम रविवार को ही यहा भक्तो को प्रवेश की अनुमति है। ग्राम पुरोहित के पूजा करने के बाद पट फिर सालभर के लिए बद हो जाता है। यानी फिर अगले साल ही आपको दर्शन का सुख मिल सकता है। एक ही दिन दर्शन की सुविधा होने के कारण यहा श्रद्धालुओ की भारी भीड़ होती है। इसलिए अव्यवस्था से बचने धमतरी और गरियाबद पुलिस के जवानो का तैनात किया जाता है। सभी रोड मे पुलिस की चाक-चौबद व्यवस्था रहती है। ताकि दर्शन का लाभ भी मिले और अव्यवस्था के चलते अनहोनी भी न हो।
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