- टेस्टिंग के बाद 33 केवी लाइन ठप्प,चोरों ने खंभे खाली किए,विभागीय लापरवाही का हिसाब कौन देगा?
- बिजली लाइन बनी,चालू नहीं हुई,सरकारी तार चोरी हुआ तो आनन-फानन में जागा विभाग…
- पहले लाइन को ठंडे बस्ते में डाला,फिर चोरों ने तार उड़ाया,अब दोबारा खर्च कर रहा विभाग…
- एसईसीएल को हैंडओवर से पहले ही तीन किलोमीटर तार चोरी,12 किलोमीटर की परियोजना पर गंभीर सवाल…
-ओंकार पाण्डेय-
विश्रामपुर/सूरजपुर,04 नवम्बर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी परियोजनाओं में लापरवाही और जवाबदेही का सवाल अक्सर तब सामने आता है,जब सरकारी धन खर्च होने के बाद भी उसका अपेक्षित उपयोग नहीं हो पाता, छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी मर्यादित की कार्यप्रणाली से जुड़ा विश्रामपुर का एक मामला भी कुछ ऐसा ही सवाल खड़ा कर रहा है,एसईसीएल विश्रामपुर से गायत्री खदान तक लगभग 12 किलोमीटर लंबी 33 केवी विद्युत लाइन बिछाई गई। लाइन का निर्माण पूरा हुआ, दो से तीन दिनों तक टेस्टिंग के लिए बिजली आपूर्ति भी चालू की गई, लेकिन इसके बाद न जाने ऐसा क्या हुआ कि पूरी परियोजना की रफ्तार थम गई,लाइन बंद पड़ी रही और बताया जा रहा है कि उसे एसईसीएल को हैंडओवर तक नहीं किया गया। हैरानी की बात यह है कि जिस विद्युत लाइन को तैयार करने में विभाग ने संसाधन, श्रम और सरकारी धन खर्च किया,उसकी सुरक्षा और उपयोगिता को लेकर अपेक्षित गंभीरता दिखाई गई या नहीं,यह अब बड़ा सवाल बन गया है,बंद पड़ी इसी लाइन के खंभों से चोरों ने कथित तौर पर करीब तीन किलोमीटर तार पार कर दिया। जब चोरी की जानकारी सामने आई तो विभाग में हलचल मची और आनन-फानन में प्रभावित हिस्से में दोबारा नया तार खिंचवाने का काम शुरू कराया गया,अब सवाल यह नहीं है कि चोरी के बाद तार दोबारा क्यों बिछाया गया, बल्कि सवाल यह है कि आखिर तैयार लाइन को चालू क्यों नहीं किया गया? दो-तीन दिन की टेस्टिंग के बाद आपूर्ति बंद करने की नौबत क्यों आई? और जब लाइन उपयोग में नहीं थी तो उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी थी?
12 किलोमीटर लाइन तैयार, लेकिन उपयोग के नाम पर सन्नाटा-जानकारी के अनुसार एसईसीएल विश्रामपुर से गायत्री खदान तक लगभग 12 किलोमीटर लंबी 33 केवी लाइन बिछाने का काम पूरा कर लिया गया था, निर्माण के बाद दो-तीन दिनों तक लाइन को परीक्षण के लिए चालू भी किया गया,इससे यह संकेत मिलता है कि परियोजना कम से कम परीक्षण के स्तर तक पहुंच चुकी थी। लेकिन इसके बाद नियमित आपूर्ति शुरू नहीं हो सकी,यदि लाइन में कोई तकनीकी खामी थी तो उसका निराकरण क्यों नहीं किया गया? यदि एसईसीएल को हस्तांतरण की प्रक्रिया अधूरी थी तो उसे पूरा करने के लिए क्या प्रयास किए गए? यदि कोई प्रशासनिक या वित्तीय अड़चन थी तो उसे दूर करने की जिम्मेदारी किसकी थी? इन सवालों पर अब तक स्पष्ट जानकारी सामने नहीं आई है, एक तरफ बिजली व्यवस्था को मजबूत करने के लिए नई लाइनें बिछाने की बात होती है,दूसरी तरफ तैयार लाइन का लंबे समय तक उपयोग में नहीं आना विभागीय कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है, आखिर परियोजना पूरी होने के बाद भी उसका उद्देश्य अधूरा क्यों रह गया?
चोरी के बाद आनन-फानन में नया तार,पहले सुरक्षा क्यों नहीं?-बताया जा रहा है कि चोरी की जानकारी सामने आने के बाद विभाग ने युद्ध स्तर पर प्रभावित हिस्से में नया तार खिंचवाने का काम कराया,यहां भी सवाल उठता है कि जब लाइन पहले से तैयार थी और लंबे समय तक बंद पड़ी रही, तब उसकी सुरक्षा को लेकर विभाग ने पहले गंभीरता क्यों नहीं दिखाई? यदि चोरी हुए हिस्से में नया तार बिछाना जरूरी था तो इसका खर्च कितना आया? क्या इस अतिरिक्त खर्च का आकलन किया गया? क्या चोरी की घटना के लिए जिम्मेदारी तय की गई? क्या इस संबंध में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई गई? इन सभी तथ्यों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए,आखिर एक ही परियोजना में पहले तार बिछाने का खर्च,फिर चोरी के कारण नुकसान और उसके बाद दोबारा तार खींचने का खर्च क्यों उठाना पड़ा? यदि समय रहते निगरानी होती तो क्या इस नुकसान से बचा नहीं जा सकता था?
कमीशन के खेल की चर्चा,जांच में सामने आनी चाहिए सच्चाई-परियोजना के लंबे समय तक लंबित रहने को लेकर स्थानीय स्तर पर कमीशन के खेल की चर्चाएं भी सामने आ रही हैं,हालांकि,इस संबंध में अभी कोई दस्तावेजी प्रमाण या आधिकारिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है,इसलिए इस चर्चा को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता,लेकिन जिस तरह तैयार लाइन परीक्षण के बाद बंद पड़ी रही और हस्तांतरण की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ी,उससे परियोजना की पूरी कार्यवाही की जांच की मांग उठना स्वाभाविक है,विभाग को स्पष्ट करना चाहिए कि परियोजना के निर्माण से लेकर परीक्षण और हस्तांतरण तक किन अधिकारियों की जिम्मेदारी थी। किस स्तर पर प्रक्रिया रुकी? क्या कोई भुगतान,तकनीकी स्वीकृति, सुरक्षा परीक्षण या अन्य औपचारिकता लंबित थी? यदि सब कुछ नियमा नुसार था तो लाइन चालू करने में इतनी देरी क्यों हुई? किसी भी प्रकार की अनियमितता की आशंका को केवल चर्चा कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। उसका जवाब रिकॉर्ड, आदेश और तकनीकी दस्तावेजों से दिया जाना चाहिए।
सवालों से बचने के बजाय जवाब दे विभाग-यह मामला केवल तीन किलोमीटर तार चोरी होने तक सीमित नहीं है,यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल है, जिसमें एक परियोजना तैयार होने के बाद भी उसका उपयोग नहीं हो सका और सरकारी संपत्ति की सुरक्षा भी सुनिश्चित नहीं की जा सकी, टेस्टिंग के बाद लाइन बंद क्यों हुई,हस्तांतरण क्यों नहीं हुआ,तार की निगरानी किसके जिम्मे थी और चोरी के बाद ही विभाग सक्रिय क्यों हुआ—इन सवालों का जवाब जरूरी है, 12 किलोमीटर लाइन बिछाने के बाद दो-तीन दिन टेस्टिंग,फिर आपूर्ति बंद,एसईसीएल को हैंडओवर नहीं और इसी बीच तीन किलोमीटर तार चोरी। इसके बाद आनन-फानन में दोबारा तार बिछाने की कवायद,यह पूरी कहानी विभागीय कार्यप्रणाली की समीक्षा और निष्पक्ष जांच की मांग करती है,आखिर सरकारी संपत्ति की सुरक्षा और परियोजना की जवाबदेही तय करने के लिए क्या किसी बड़े नुकसान का इंतजार किया जाएगा? विभाग को अब केवल नया तार खींचने की जानकारी नहीं, बल्कि पुरानी लापरवाही का पूरा हिसाब भी देना चाहिए।
चोरों ने तीन किलोमीटर तार पार किया,निगरानी व्यवस्था कहां थी?
इस पूरे मामले का सबसे चौंकाने वाला पहलू करीब तीन किलोमीटर तार की चोरी है,बताया जा रहा है कि चोरों ने लाइन के खंभों से तार उतारकर चोरी कर लिया, लगभग 12 किलोमीटर लंबी लाइन में से इतनी बड़ी दूरी का तार गायब हो जाना अपने आप में सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़ा करता है, क्या लाइन की नियमित निगरानी की जा रही थी? क्या संबंधित क्षेत्र में विभाग का कोई कर्मचारी निरीक्षण करता था? क्या तार चोरी होने की जानकारी तत्काल मिली या काफी समय बाद इसका पता चला? यदि लाइन बंद थी तो क्या विभाग ने उसे असुरक्षित छोड़ दिया था? इन सवालों का जवाब संबंधित अधिकारियों को देना चाहिए, सरकारी संपत्ति की सुरक्षा केवल कागजों में जिम्मेदारी तय कर देने से पूरी नहीं होती,जमीन पर निगरानी और जवाबदेही भी जरूरी है। तीन किलोमीटर तार की चोरी कोई मामूली घटना नहीं है,यह पता लगाना आवश्यक है कि चोरी किस अवधि में हुई, कितनी संपत्ति का नुकसान हुआ और चोरों तक पहुंचने के लिए क्या कार्रवाई की गई।
बिजली कंपनी और एसईसीएल दोनों की जवाबदेही तय हो…
इस प्रकरण में छत्तीसगढ़ राज्य विद्युत वितरण कंपनी और एसईसीएल दोनों की भूमिका स्पष्ट होना जरूरी है। बिजली कंपनी को बताना चाहिए कि लाइन का निर्माण कब पूरा हुआ,टेस्टिंग किसकी निगरानी में हुई,आपूर्ति बंद करने का कारण क्या था और हैंडओवर की प्रक्रिया कहां अटकी, वहीं एसईसीएल को भी स्पष्ट करना चाहिए कि उसे लाइन कब और किन शर्तों पर हस्तांतरित की जानी थी तथा हस्तांतरण नहीं होने की वजह क्या रही,इसके अलावा चोरी हुए तार की मात्रा, उसकी अनुमानित कीमत,पुलिस में की गई शिकायत,बरामदगी के प्रयास और दोबारा तार बिछाने में हुए खर्च का पूरा विवरण सामने आना चाहिए, यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी की लापरवाही सामने आती है तो नियमानुसार जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
चोरी के बाद नदी,तालाब और जंगल पार कर फिर बिछाई गई केबल
करीब 12 किलोमीटर लंबी 33 केवी लाइन में से लगभग 3 किलोमीटर केबल चोरी होने की घटना के बाद विभाग में हड़कंप मचा,बताया जा रहा है कि चोरी का मामला सामने आने के बाद क्षतिग्रस्त लाइन को दोबारा जोड़ने के लिए युद्धस्तर पर काम शुरू किया गया,केबल को फिर से बिछाने और जोड़ने के लिए नदी,तालाब और जंगल जैसे कठिन रास्तों से होकर करना पड़ा,मौके की तस्वीरों में श्रमिकों को नदी के किनारे और पानी के बीच केबल खींचते तथा उसे जोड़ने की मशक्कत करते देखा जा सकता है,यह पूरा घटनाक्रम कई सवाल खड़े करता है, जिस लाइन का निर्माण पूरा होने के बाद दो-तीन दिन तक टेस्टिंग की गई थी,वह आखिर उसके बाद बंद क्यों पड़ी रही? टेस्टिंग के बाद लाइन को एसईसीएल को हैंडओवर क्यों नहीं किया गया? यदि लाइन चालू हालत में नहीं थी,तो उसकी सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? करीब तीन किलोमीटर केबल खंभों से चोरी होने तक विभाग को इसकी जानकारी क्यों नहीं हुई? चोरी के बाद जिस तेजी से विभाग ने नदी,तालाब और जंगल पार कर केबल को दोबारा जोड़ने का काम किया,वही तत्परता यदि पहले लाइन की सुरक्षा और नियमित निगरानी में दिखाई गई होती तो क्या इतनी बड़ी चोरी रोकी जा सकती थी? अब जरूरत केवल केबल जोड़कर लाइन बहाल करने की नहीं, बल्कि चोरी की पूरी घटना,विभागीय लापरवाही और लंबे समय तक लाइन बंद रहने के कारणों की निष्पक्ष जांच की भी है।
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