Breaking News

रायपुर@संघर्ष को बचाने में आखिर इतना ‘संघर्ष’ क्यों…संघर्ष को बचाने में पूरा विभाग क्यों ‘संघर्षरत’

Share

  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर बड़े सवाल
  • संसद का खाद्य कानून,लेकिन
  • छत्तीसगढ़ में नियंत्रण किसके हाथ?
  • संसद ने बनाया खाद्य सुरक्षा का कानून, छत्तीसगढ़ में अधिकारों की कड़ी कितनी साफ?
  • एक कर्मचारी के लिए पूरा विभाग क्यों ‘संघर्षरत’? नियमों से ज्यादा मजबूत है संघर्ष की फाइल?
  • संघर्ष की फाइल में नियमों का ‘संघर्ष’,आखिर किसे बचाने में जुटा खाद्य एवं औषधि प्रशासन?
  • नियम टूटे या नियमों की नई व्याख्या हुई?
  • संघर्ष कुमार मिश्रा की सेवा यात्रा पर बड़े सवाल
  • संघर्ष कुमार मिश्रा की फाइल बनी पहेली,प्रशिक्षण से पद तक,हर कड़ी के पीछे कौन-सा नियम?
  • एक नाम,कई आदेश और वर्षों का
  • ‘संघर्ष’,खाद्य एवं औषधि प्रशासन से मांगा हिसाब
  • कानून अपनी जगह,संघर्ष अपनी जगह! एक कर्मचारी की सेवा फाइल ने खड़े किए पूरे तंत्र पर सवाल


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,20 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। खाद्य एवं औषधि प्रशासन में इन दिनों एक नाम ऐसा है, जिसके सेवा अभिलेखों की पड़ताल करते-करते सवाल केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रह जाते,बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यशैली तक पहुंच जाते हैं,नाम है संघर्ष कुमार मिश्रा,सवाल यह नहीं कि संघर्ष कुमार मिश्रा ने नौकरी में प्रगति क्यों की,सरकारी सेवा में पदोन्नति और जिम्मेदारी मिलना सामान्य प्रक्रिया है,असली सवाल यह है कि उनकी सेवा यात्रा में जो-जो वैधानिक सीढि़यां इस्तेमाल हुईं,क्या हर सीढ़ी के नीचे नियमों की मजबूत जमीन थी? उपलब्ध दस्तावेजों में वर्ष 2004 में तीन माह के प्रशिक्षण से लेकर वर्ष 2007 में खाद्य निरीक्षक और फिर वर्ष 2011 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में सामने आती स्थिति दिखाई देती है,दस्तावेजों में उनका मूल पद प्रयोगशाला तकनीशियन दर्ज है और 23 अगस्त 2004 से 23 नवंबर 2004 तक प्रशिक्षण का उल्लेख मिलता है, इसके बाद वर्ष 2007 की राजपत्र अधिसूचना में उन्हें खाद्य मिलावट निवारण कानून के तहत खाद्य निरीक्षक की शक्तियों के प्रयोग के लिए नियुक्त किए जाने का उल्लेख है,जबकि वर्ष 2011 की अधिसूचना में उनका नाम खाद्य सुरक्षा अधिकारी की सूची में दिखाई देता है,यानी कागजों पर कहानी कुछ यूं बनती है—प्रयोगशाला तकनीशियन ? खाद्य निरीक्षक ? खाद्य सुरक्षा अधिकारी, अब सवाल यह है कि इस पूरी कहानी में नियम कहां है और अपवाद कहां से शुरू होता है?
तीन माह का प्रशिक्षण और सवालों के तीन दर्जन दरवाजे-पुराने खाद्य निरीक्षक संबंधी नियमों में निर्धारित प्रशिक्षण का महत्व था,उपलब्ध अभिलेखों में भी यह सवाल दर्ज है कि यदि खाद्य निरीक्षक के रूप में नियुक्ति तीन माह के प्रशिक्षण की पात्रता से जुड़ी थी तो यह देखना आवश्यक है कि प्रशिक्षण कहां हुआ,किसके नियंत्रण में हुआ,प्रशिक्षण कराने वाली संस्था को किस सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति थी और क्या उसे खाद्य निरीक्षक नियुक्ति के लिए वैधानिक रूप से मान्य माना गया था,संघर्ष कुमार मिश्रा के मामले में उपलब्ध दस्तावेज वर्ष 2004 के तीन माह के प्रशिक्षण की पुष्टि करते हैं, लेकिन प्रमाणपत्र होना और उस प्रमाणपत्र का वैधानिक रूप से पात्रता सिद्ध करना…दो अलग बातें हैं,यही वह बारीक अंतर है जिसे फाइलों में अक्सर एक लाइन में निपटा दिया जाता है,लेकिन जांच में वही एक लाइन पूरी कहानी बदल सकती है,इसलिए सवाल सीधा है प्रशिक्षण हुआ,यह मान लिया जाए,लेकिन प्रशिक्षण की वैधानिक स्वीकृति किस दस्तावेज से सिद्ध होती है? अगर स्वीकृति का आदेश है तो उसे सामने रखा जा सकता है,अगर संस्था पहले से स्वीकृत थी तो उसका आदेश दिखाइए,अगर किसी विशेष प्रावधान के तहत प्रशिक्षण को समकक्ष माना गया था तो वह प्रावधान बताइए,और अगर उस समय लागू किसी अपवाद के तहत प्रशिक्षण मान्य था तो वह अपवाद किस आधार पर लागू किया गया,यह भी स्पष्ट होना चाहिए, क्योंकि उपलब्ध दस्तावेज खुद यह संकेत देते हैं कि पुराने नियमों में कुछ विशेष परिस्थितियों में पुराने प्रशिक्षणों को समकक्ष मानने के अपवाद मौजूद थे, इसलिए बिना मूल अभिलेख देखे प्रशिक्षण को अवैध कहना उचित नहीं होगा, लेकिन उसकी वैधानिक मान्यता की जांच किए बिना उसे स्वतः वैध मान लेना भी उतना ही बड़ा सवाल है।
फिर आया वर्ष 2007…और फाइल ने नया मोड़ ले लिया-वर्ष 2007 की राजपत्र अधिसूचना इस मामले की अगली महत्वपूर्ण कड़ी है,उपलब्ध दस्तावेज में संघर्ष कुमार मिश्रा का नाम प्रयोगशाला तकनीशियन,राज्य खाद्य प्रयोगशाला,रायपुर के रूप में दर्ज होने और खाद्य मिलावट निवारण अधिनियम के तहत खाद्य निरीक्षक की शक्तियों के प्रयोग के लिए नियुक्त किए जाने का उल्लेख मिलता है,यहीं से असली प्रशासनिक पहेली शुरू होती है, यदि मूल पद प्रयोगशाला तकनीशियन था,तो खाद्य निरीक्षक की जिम्मेदारी देने से पहले विभाग ने कौन-कौन से पात्रता अभिलेख देखे? क्या तीन माह के प्रशिक्षण का मूल रिकॉर्ड जांचा गया? क्या प्रशिक्षण संस्था की स्वीकृति जांची गई? क्या नियुक्ति से पहले पात्रता संबंधी कोई परीक्षण किया गया? क्या उस समय की स्थापना शाखा ने इस पर विधिवत टिप्पणी की? और यदि सब कुछ नियम के अनुसार था,तो वह पूरी नोटशीट आज कहां है? सरकारी फाइलों की खूबी यही होती है कि वे बोलती कम हैं, लेकिन बोलती हैं तो तारीख,आदेश और हस्ताक्षर के साथ बोलती हैं, इस मामले में भी जवाब बयान से नहीं, फाइल से निकलना चाहिए।
और अब आता है सबसे बड़ा सवाल…विभाग इतना ‘संघर्षशील’ क्यों है?-किसी कर्मचारी की सेवा स्थिति पर सवाल उठे तो सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया क्या होनी चाहिए? फाइल निकले, नियम निकले,मूल नियुक्ति आदेश निकले,प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र निकले,स्वीकृति आदेश निकले, अधिसूचना निकले, फिर पात्रता की जांच हो,लेकिन यदि किसी मामले में सवाल उठने के बाद भी विभाग का पहला स्वभाव दस्तावेज खोलने के बजाय व्यक्ति की सेवा स्थिति को बचाने का दिखाई दे,तो स्वाभाविक रूप से जनता पूछेगी आखिर संघर्ष में ऐसा क्या है कि पूरा विभाग उसके लिए संघर्ष करने को तैयार दिखाई देता है? क्या वह विभागीय प्रक्रिया का सामान्य मामला है? क्या किसी पुराने आदेश को बचाना विभाग की प्रशासनिक मजबूरी है? क्या किसी पुराने निर्णय की जिम्मेदारी आज के अधिकारियों पर आने का डर है? या फिर एक कर्मचारी की सेवा स्थिति पर सवाल उठने का अर्थ उन तमाम अधिकारियों के निर्णयों पर सवाल उठना है, जिन्होंने अलग-अलग समय में फाइल आगे बढ़ाई? कहीं ऐसा तो नहीं कि एक व्यक्ति की फाइल खोलते ही कई अधिकारियों की फाइलें खुलने लगें? यही वह सवाल है,जिसका जवाब विभाग को देना चाहिए।
कानून बदला,विभाग बदला,लेकिन फाइल की सुविधा नहीं बदली?-खाद्य सुरक्षा व्यवस्था को मजबूत करने के लिए देश में नया कानून आया, पुराने खाद्य मिलावट कानून की जगह खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम ने व्यापक वैधानिक ढांचा तैयार किया,खाद्य सुरक्षा आयुक्त,अभिहित अधिकारी और खाद्य सुरक्षा अधिकारी जैसे पदों और उनकी शक्तियों की व्यवस्था की गई,लेकिन सवाल यह है कि नई व्यवस्था लागू होने के बाद पुरानी सेवा व्यवस्थाओं को नई व्यवस्था में समायोजित करते समय क्या हर कर्मचारी की पात्रता का वास्तविक परीक्षण हुआ? अगर हुआ तो रिकॉर्ड कहां है? अगर नहीं हुआ तो क्यों नहीं हुआ? और यदि उस समय सब कुछ सही पाया गया था तो आज वही रिकॉर्ड सार्वजनिक जांच से क्यों बचना चाहिए?
खाद्य सुरक्षा और औषधि प्रशासन…एक ही छत के नीचे कितनी जिम्मेदारियां?-इस पूरे प्रकरण का एक व्यापक प्रशासनिक पहलू भी है,खाद्य सुरक्षा और औषधि नियंत्रण दोनों सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं,लेकिन इनके लिए केंद्रीय स्तर पर अलग-अलग वैधानिक ढांचे और संस्थागत व्यवस्थाएं हैं, छत्तीसगढ़ में भी खाद्य सुरक्षा और खाद्य एवं औषधि प्रशासन की प्रशासनिक संरचना समय-समय पर अलग-अलग पदनामों और अतिरिक्त/प्रत्यायोजित शक्तियों के साथ दिखाई देती रही है,इसलिए यह कहना उचित नहीं होगा कि खाद्य सुरक्षा आयुक्त का पद कभी था ही नहीं। उपलब्ध केंद्रीय अभिलेखों में वर्ष 2019 के छत्तीसगढ़ संबंधी विवरण में स्वास्थ्य सचिव को खाद्य सुरक्षा आयुक्त तथा तत्कालीन नियंत्रक को धारा 30(3) के तहत कुछ शक्तियां प्रत्यायोजित किए जाने का उल्लेख मिलता है। वर्तमान केंद्रीय सूची में भी खाद्य सुरक्षा आयुक्त और खाद्य एवं औषधि प्रशासन के नियंत्रक के पद अलग-अलग दर्ज हैं,यानी असली सवाल पद के अस्तित्व का नहीं,उस समय किस अधिकारी के पास कौन-सी शक्ति थी,इसका है,और इसका जवाब केवल प्रत्यायोजन आदेश दे सकता है।
संघर्ष को बचाना है या व्यवस्था को बचाना है?-व्यंग्य यहीं सबसे ज्यादा चुभता है,सरकारी कार्यालय में आम आदमी यदि किसी प्रमाणपत्र में एक छोटी-सी कमी छोड़ दे तो उससे कहा जाता है…‘नियम देखिए।’ किसी गरीब दुकानदार के लाइसेंस में कागज कम हो तो कहा जाता है— ‘प्रक्रिया पूरी कीजिए।’ किसी कर्मचारी की सेवा पुस्तिका में एक प्रविष्टि गलत हो तो कहा जाता है— ‘अभिलेख दुरुस्त कराइए।’ लेकिन जब सवाल किसी लंबे समय से चली आ रही सरकारी सेवा व्यवस्था पर उठता है तो अचानक फाइलों की भाषा बदल जाती है—कहीं पुराना आदेश, कहीं संक्रमण प्रावधान, कहीं अतिरिक्त प्रभार, कहीं प्रत्यायोजित शक्ति और कहीं वर्षों पुरानी प्रक्रिया का हवाला, तब जनता पूछने लगती है नियम सबके लिए समान हैं या कुछ फाइलों के लिए नियमों की अलग व्याख्या भी उपलब्ध है? और सबसे बड़ा सवाल—क्या विभाग संघर्ष कुमार मिश्रा को बचाने के लिए संघर्ष कर रहा है, या उन पुराने फैसलों को बचाने के लिए जिनमें संघर्ष कुमार मिश्रा की सेवा यात्रा आगे बढ़ती गई? क्योंकि यदि व्यक्ति को बचाना उद्देश्य नहीं है और केवल नियम को बचाना उद्देश्य है, तो फिर नियम और मूल अभिलेख सामने रखने में संकोच कैसा?
अब विभाग से सिर्फ पांच जवाब चाहिए,पूरे मामले को किसी आरोप या निष्कर्ष पर खत्म करने के बजाय पांच दस्तावेज ही काफी होंगे…
– पहलाः- वर्ष 2004 के तीन माह के प्रशिक्षण की संस्था और उसकी वैधानिक स्वीकृति का मूल आदेश।
– दूसराः- वर्ष 2007 में खाद्य निरीक्षक के रूप में नियुक्ति/शक्तियां दिए जाने से पहले पात्रता परीक्षण की फाइल और नोटशीट।
– तीसराः- वर्ष 2011 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में अधिसूचित किए जाने का पूरा आधार और संक्रमण प्रावधानों के अनुपालन का रिकॉर्ड।
– चौथाः- वर्ष 2013 के बाद उनकी सेवा स्थिति के संबंध में सभी न्यायिक आदेश और उनके आधार पर विभाग द्वारा की गई कार्रवाई।
– पांचवांः- जिस अवधि में खाद्य सुरक्षा संबंधी आदेश उनके संबंध में जारी हुए, उस समय संबंधित अधिकारी के पास खाद्य सुरक्षा आयुक्त की शक्ति होने का मूल प्रत्यायोजन आदेश।
संघर्ष मिश्रा ही संघर्ष कर रहे थे,या पूरी व्यवस्था भी संघर्ष कर रही थी-इन पांच दस्तावेजों के सामने आते ही यह भी साफ हो जाएगा कि संघर्ष कुमार मिश्रा की सेवा यात्रा नियम की सीधी सड़क थी या विभागीय व्याख्याओं से बनी ऐसी सड़क, जिसमें हर मोड़ पर किसी न किसी आदेश ने रास्ता आसान किया,और तब शायद यह भी पता चल जाएगा कि इतने वर्षों से संघर्ष कुमार मिश्रा ही संघर्ष कर रहे थे,या उनके लिए पूरी व्यवस्था भी संघर्ष कर रही थी,क्योंकि अंततः सवाल किसी एक व्यक्ति को बचाने या हटाने का नहीं है—सवाल यह है कि सरकारी कानून, नियम और अधिसूचनाएं फाइल में लिखे शब्द हैं या वास्तव में प्रशासनिक निर्णयों की सीमा भी तय करती हैं।
अब सबसे बड़ा सवाल—क्या पूरी वैधानिक कड़ी कभी एक साथ जांची गई?- एक तरफ संसद का खाद्य सुरक्षा कानून है, दूसरी तरफ राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था, बीच में खाद्य सुरक्षा आयुक्त, खाद्य एवं औषधि प्रशासन के नियंत्रक,खाद्य सुरक्षा अधिकारी और पुराने खाद्य निरीक्षकों की संक्रमणकालीन व्यवस्था है,ऐसे में किसी एक अधिकारी की सेवा-स्थिति को सही या गलत ठहराने से पहले पूरी वैधानिक कड़ी को देखना जरूरी है, संघर्ष कुमार मिश्रा के मामले में वर्ष 2004 के तीन माह के प्रशिक्षण से लेकर वर्ष 2007 की खाद्य निरीक्षक अधिसूचना,वर्ष 2011 की खाद्य सुरक्षा अधिकारी संबंधी स्थिति और वर्ष 2012-13 के न्यायालयीन रिकॉर्ड तक दस्तावेजों की यह कड़ी अब कई सवाल खड़े करती है,उपलब्ध रिकॉर्ड से इन सवालों को उठाया जा सकता है,लेकिन अंतिम निष्कर्ष तभी निकलेगा जब विभाग उस समय के मूल प्रशिक्षण अनुमोदन, नियुक्ति फाइल,अधिसूचनाएं,शक्तियों के प्रत्यायोजन के आदेश और न्यायालयीन अनुपालन रिकॉर्ड सामने रखे, यही दस्तावेज तय करेंगे कि यह केवल एक प्रशासनिक सेवा-क्रम था या उस सेवा-क्रम के पीछे कानून में निर्धारित हर अनिवार्य प्रक्रिया भी पूरी की गई थी।
20 साल की सेवा पर उठता बड़ा सवाल- आपके दिए विवरण के अनुसार,प्रयोगशाला तकनीशियन के पद पर लगभग दो वर्ष रहने के बाद वर्ष 2006 से खाद्य निरीक्षक और वर्ष 2011 से खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में सेवा जारी है, यानी वर्ष 2006 से वर्तमान तक लगभग 20 वर्ष खाद्य निरीक्षक/खाद्य सुरक्षा अधिकारी की भूमिका में रहने का दावा इस सेवा-क्रम का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
खाद्य निरीक्षक से खाद्य सुरक्षा
अधिकारी-क्या पुरानी कड़ी स्वतः नई हो गई?

वर्ष 2006 में खाद्य सुरक्षा एवं मानक अधिनियम बना और बाद में पुराने खाद्य कानूनों की जगह नई व्यवस्था लागू हुई,पुराने खाद्य निरीक्षकों को नई व्यवस्था में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्य करने की संक्रमण व्यवस्था भी थी,लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हर पुराने पदधारी की स्थिति बिना किसी जांच के स्वतः अंतिम हो गई,यहीं संघर्ष कुमार मिश्रा का वर्ष 2011 का रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाता है। उपलब्ध दस्तावेजों में वर्ष 2011 की अधिसूचना में उनका नाम खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में दिखाई देता है। इस तरह दस्तावेजी क्रम प्रयोगशाला तकनीशियन से खाद्य निरीक्षक और फिर खाद्य सुरक्षा अधिकारी तक पहुंचता है,अब सवाल यह है कि वर्ष 2011 में खाद्य सुरक्षा अधिकारी की अधिसूचना जारी करते समय विभाग ने पुराने खाद्य निरीक्षक पद की पात्रता को किस रिकॉर्ड से सत्यापित किया? क्या पुरानी नियुक्ति फाइल सामने रखी गई? क्या प्रशिक्षण प्रमाणपत्र की जांच हुई? क्या संक्रमण संबंधी प्रावधानों की शर्तें पूरी होने की पुष्टि हुई? या फिर विभागीय फाइल ने यह मान लिया कि एक बार कोई व्यक्ति खाद्य निरीक्षक बन गया तो आगे की कड़ी अपने आप मजबूत हो गई? अगर ऐसा नहीं हुआ और पूरा परीक्षण हुआ था,तो फिर उस परीक्षण की नोटशीट सार्वजनिक जांच के लिए सामने आनी चाहिए।
हाईकोर्ट रिकॉर्ड ने भी मूल पद की कहानी याद दिलाई
यह मामला केवल विभागीय फाइलों तक सीमित नहीं है,संघर्ष कुमार मिश्रा से संबंधित डब्ल्यूपीएस 5204/2012 के रिकॉर्ड में भी उनका मूल पद प्रयोगशाला तकनीशियन बताया गया है और उस समय उनके खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में कार्य करने का उल्लेख मिलता है,उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार 26 अप्रैल 2013 के उच्च न्यायालय आदेश में याचिकाकर्ता की स्थिति को अगली सुनवाई तक परिवर्तित नहीं करने संबंधी निर्देश का उल्लेख है,इसी से जुड़ी एक आपत्ति में यह दावा किया गया है कि 26 अप्रैल 2013 के आदेश के बाद उसकी निरंतरता से संबंधित कोई अन्य आदेश उपलब्ध नहीं है और इस आधार पर मूल पद पर स्थिति बहाल माने जाने की बात कही गई है, लेकिन यह एक पक्ष द्वारा उठाया गया कानूनी तर्क है,अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं,इसकी पुष्टि पूरी न्यायिक कार्यवाही और बाद के आदेशों से ही हो सकती है,यानी यहां भी सवाल वही है—विभाग की सेवा पुस्तिका में आखिर कौन-सी स्थिति दर्ज रही और किस आदेश के आधार पर?
जिस अधिकारी ने आदेश दिया, उसके पास उस समय शक्ति थी या नहीं?
यदि वर्ष 2019-20 के आसपास किसी अधिकारी ने संघर्ष कुमार मिश्रा को खाद्य सुरक्षा संबंधी क्षेत्रीय कार्य सौंपा था, तो यह देखना आवश्यक है कि उस समय वह अधिकारी खाद्य सुरक्षा आयुक्त की शक्ति से अधिकृत था या नहीं, क्या उनके पास विधिवत प्रत्यायोजित शक्ति थी? क्या आदेश में उसका उल्लेख था? क्या संबंधित आदेश खाद्य सुरक्षा कानून के तहत जारी हुआ था? और यदि शक्ति किसी दूसरे अधिकारी के पास थी तो आदेश जारी करने वाले अधिकारी को वह अधिकार किस आदेश से मिला? यहां किसी अधिकारी को दोषी घोषित करना उद्देश्य नहीं है, अधिकार की वैधानिक कड़ी का दस्तावेजी परीक्षण ही असली मुद्दा है।
एक नाम की फाइल,लेकिन सवाल पूरे तंत्र का…

इस पूरे मामले को केवल संघर्ष कुमार मिश्रा की व्यक्तिगत सेवा यात्रा मानना शायद अधूरा होगा,क्योंकि यदि प्रशिक्षण सही था—तो दस्तावेज सामने आएं,यदि नियुक्ति सही थी—तो नियुक्ति फाइल सामने आए,यदि खाद्य निरीक्षक के रूप में शक्तियां सही ढंग से दी गई थीं—तो अधिसूचना और पात्रता रिकॉर्ड सामने आए,यदि खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में संक्रमण पूरी तरह नियमसम्मत था—तो संबंधित अधिसूचना और सत्यापन रिकॉर्ड सामने आए,यदि बाद में किसी अधिकारी ने खाद्य सुरक्षा संबंधी आदेश जारी किया—तो उसके अधिकार का स्रोत सामने आए,फिर विवाद खत्म, लेकिन यदि इन सवालों के जवाब में हर बार नई फाइल,नया तर्क और नई व्याख्या खोजनी पड़े,तो सवाल और बड़ा होगा कि आखिर मूल रिकॉर्ड में ऐसा क्या है जिसे स्पष्ट करने में इतनी प्रशासनिक मशक्कत लग रही है?


Share

Check Also

अम्बिकापुर@नशा मुक्ति को लेकर विद्या दीदी ने योग आयोग अध्यक्ष से की मुलाकात

Share -संवाददाता-अम्बिकापुर,20 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। ब्रह्माकुमारी संस्था की सरगुजा संभाग संचालिका राजयोगिनी ब्रह्माकुमारी विद्या दीदी …

Leave a Reply