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संपादकीय@ सड़कें गड्ढों में नहीं,व्यवस्था की जवाबदेही में फंसी हैं…

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सरगुजा की सड़कें इन दिनों केवल राहगीरों की परीक्षा नहीं ले रहीं,बल्कि व्यवस्था की कार्यशैली पर भी सवाल खड़े कर रही हैं। सड़क पर गड्ढा होना सामान्य बात हो सकती है,लेकिन एक ही सड़क का बार-बार टूटना,बारिश आते ही सड़क का गड्ढों में बदल जाना और मरम्मत के नाम पर कुछ दिनों के लिए खानापूर्ति कर देना सामान्य नहीं कहा जा सकता। यह सीधे तौर पर निर्माण की गुणवत्ता,रखरखाव की व्यवस्था और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया पर सवाल है।
अंबिकापुर की एमजी रोड,खरसिया रोड की बदहाली हो या राष्ट्रीय राजमार्ग के कई हिस्सों की हालत,पिछले कुछ सप्ताह की खबरें बताती हैं कि समस्या केवल एक सड़क या एक विभाग तक सीमित नहीं है। शहर के भीतर भी सड़कें परेशान कर रही हैं और शहर से बाहर जाने वाले प्रमुख मार्ग भी। अगस्त में सामाजिक कार्यकर्ताओं ने गड्ढों में भरे पानी के बीच प्रदर्शन किया। कहीं लोग सड़क पर बैठ गए,कहीं अनोखे तरीके से विरोध किया गया। सीतापुर क्षेत्र में एनएच-43 की खराब सड़क को लेकर चक्काजाम तक की स्थिति बनी। सितंबर की शुरुआत में इसी मार्ग पर गहरे गड्ढे में एंबुलेंस फंसने की खबर ने समस्या की गंभीरता और बढ़ा दी।
सवाल यह है कि आखिर सड़कें इतनी खराब होने के बाद ही व्यवस्था क्यों जागती है? जून में लोक निर्माण विभाग के सचिव ने अंबिकापुर में समीक्षा के दौरान बारिश से पहले सड़क मरम्मत और गड्ढा भराई को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए थे। गुणवत्ता और समय-सीमा पर भी जोर दिया गया था। इसके बावजूद बारिश के दौरान वही सड़कें लोगों के लिए परेशानी का कारण बनीं। इसका अर्थ यह नहीं कि अधिकारी काम नहीं कर रहे, बल्कि सवाल यह है कि निर्देशों का असर जमीन पर स्थायी क्यों नहीं दिखता?
और यही वह बिंदु है जहां जिम्मेदारी तय होनी चाहिए…
सड़क खराब होने पर सबसे पहले संबंधित विभाग सामने आता है। लेकिन सड़क की हालत के लिए केवल विभागीय अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना भी पर्याप्त नहीं होगा। निर्माण एजेंसी कौन थी? ठेका किस शर्त पर दिया गया था? सड़क की डिजाइन और ड्रेनेज व्यवस्था कैसी थी? गुणवत्ता परीक्षण किस स्तर पर हुआ? रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी थी? गड्ढे बनने के बाद शिकायत मिलने पर कितने समय में मरम्मत की जानी थी? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने चाहिए। यदि किसी सड़क की उम्र कई वर्ष निर्धारित है और वह उससे पहले ही उखड़ जाती है तो केवल नई मरम्मत कर देना समाधान नहीं है। यह भी देखना होगा कि पुरानी सड़क क्यों विफल हुई। कहीं घटिया सामग्री तो नहीं लगी? कहीं जल निकासी की व्यवस्था की अनदेखी तो नहीं हुई? कहीं सड़क निर्माण के बाद दूसरी एजेंसियों द्वारा बार-बार सड़क खोदने और उसे ठीक ढंग से बहाल नहीं करने की समस्या तो नहीं है?
सरगुजा में सड़क सुधार को केवल गड्ढा भराई अभियान बनाकर नहीं छोड़ा जा सकता। गड्ढे में गिट्टी डालकर रोलर चला देना तत्काल राहत हो सकती है, स्थायी समाधान नहीं। हाल में एनएच पर मशीनें लगाकर गड्ढे भरने का काम शुरू हुआ, जो स्वागत योग्य है, लेकिन सवाल यह है कि अगले मानसून में फिर वही स्थिति न बने, इसकी गारंटी कौन देगा?
सड़क केवल आवागमन का माध्यम नहीं है। यह अस्पताल तक पहुंचने वाले मरीज का रास्ता है,स्कूल जाने वाले बच्चे का रास्ता है, किसान की उपज बाजार तक पहुंचाने का रास्ता है और व्यापार की जीवनरेखा है। जब सड़क खराब होती है तो केवल वाहन नहीं टूटते, लोगों का समय,पैसा और भरोसा भी टूटता है। एंबुलेंस का गड्ढे में फंसना इस समस्या को और गंभीर बना देता है।
इसलिए अब सरगुजा को केवल सड़क मरम्मत नहीं, जवाबदेही की मरम्मत चाहिए
प्रशासन को जिले की प्रमुख सड़कों का तकनीकी ऑडिट कराना चाहिए। सड़कवार यह सार्वजनिक किया जाना चाहिए कि किस सड़क का निर्माण कब हुआ,कितनी लागत आई, ठेकेदार कौन था,रखरखाव की जिम्मेदारी किसकी है और उसकी निर्धारित आयु कितनी है। जहां सड़क समय से पहले खराब हुई है,वहां केवल सरकारी पैसे से दोबारा निर्माण करने के बजाय जिम्मेदार एजेंसी से जवाब मांगा जाना चाहिए। गुणवत्ता में गंभीर कमी मिलने पर अनुबंध की शर्तों के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए।
जनता को भी यह जानने का अधिकार है कि सड़क के लिए स्वीकृत राशि कहां खर्च हुई और परिणाम क्या निकला।
राजनीतिक दल सड़क की बदहाली को मुद्दा बनाएं,सामाजिक संगठन प्रदर्शन करें और मीडिया लगातार सवाल उठाए—यह लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन सड़क का समाधान तभी होगा जब आंदोलन के बाद मशीनें सड़क पर आने के साथ-साथ व्यवस्था में स्थायी निगरानी भी आए। सरगुजा को ऐसी सड़कें चाहिए जिनकी खबर उद्घाटन के दिन बने और मरम्मत के दिन नहीं। ऐसी सड़कें चाहिए जिनकी गुणवत्ता बारिश के बाद साबित हो,बारिश के दौरान नहीं परखी जाए। गड्ढे भरना जरूरी है,लेकिन उससे भी जरूरी है वह व्यवस्था सुधारना जिसके कारण गड्ढे बार-बार पैदा होते हैं। अब सवाल सड़क पर पड़े गड्ढों का नहीं,उन गड्ढों के पीछे छिपी जवाबदेही का है।


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