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खड़गवां/कोरिया@ बैकुंठपुर और खड़गवां परियोजना में व्यवस्था पर गंभीर सवाल

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कहीं सहायिका के भरोसे केंद्र,कहीं समय से पहले बंद होने की शिकायत
कार्यकर्ताओं की उपस्थिति और पोषण आहार वितरण के रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच की मांग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/कोरिया,10 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
बच्चों के पोषण,स्वास्थ्य और प्रारंभिक शिक्षा की जिम्मेदारी संभालने वाली आंगनबाड़ी व्यवस्था को लेकर बैकुंठपुर और खड़गवां परियोजना में गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों से सामने आ रही शिकायतों के मुताबिक कई आंगनबाड़ी केंद्रों में रजिस्टर पर बच्चों की संख्या 18 से 20 तक दर्ज है, जबकि केंद्र में वास्तविक रूप से पहुंचने वाले बच्चों की संख्या कई बार महज 2 से 6 तक ही रहने का दावा किया जा रहा है। यदि यह स्थिति जांच में सही पाई जाती है तो यह केवल बच्चों की कम उपस्थिति का मामला नहीं होगा, बल्कि आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी,उपस्थिति पंजी,पोषण आहार वितरण और विभागीय निरीक्षण व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़े करेगा, बैकुंठपुर परियोजना के बचरा पोड़ी क्षेत्र से लेकर खड़गवां परियोजना के विभिन्न आंगनबाड़ी केंद्रों तक ऐसी शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है,स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ केंद्र नियमित समय तक संचालित नहीं होते और निर्धारित समय से पहले बंद कर दिए जाने की स्थिति भी देखने को मिलती है,हालांकि इन आरोपों की विभागीय पुष्टि होना अभी बाकी है।
रजिस्टर में बच्चे ज्यादा, केंद्र में उपस्थिति कम-आंगनबाड़ी केंद्रों में बच्चों का पंजीयन इसलिए किया जाता है ताकि उन्हें नियमित रूप से पूरक पोषण आहार,प्रारंभिक शिक्षा,स्वास्थ्य संबंधी सेवाएं और अन्य योजनाओं का लाभ मिल सके। लेकिन यदि रजिस्टर में दर्ज बच्चों और केंद्र में उपस्थित बच्चों की संख्या में लगातार बड़ा अंतर बना हुआ है तो यह जांच का विषय है, स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कुछ केंद्रों में 18-20 बच्चे दर्ज हैं, लेकिन निरीक्षण या सामान्य दिनों में केंद्र में केवल 2-6 बच्चे ही दिखाई देते हैं, ऐसे में कई सवाल सामने आते हैं की क्या रजिस्टर में दर्ज सभी बच्चे वास्तव में केंद्र से जुड़े हुए हैं? क्या वे नियमित रूप से केंद्र आते हैं? यदि नहीं आते तो उनकी अनुपस्थिति का कारण क्या है? क्या उपस्थिति पंजी में वास्तविक उपस्थिति दर्ज की जा रही है? क्या पोषण आहार का वितरण वास्तविक उपस्थिति के अनुरूप हो रहा है? क्या टेक-होम राशन एवं अन्य सामग्री के वितरण का भौतिक सत्यापन किया जाता है? इन सवालों का जवाब केवल कार्यालय में रखे रिकॉर्ड से नहीं, बल्कि अचानक मौके पर पहुंचकर बच्चों और अभिभावकों का सत्यापन करने से ही मिल सकता है।
सहायिका के भरोसे केंद्र संचालन का आरोप
कुछ केंद्रों को लेकर स्थानीय स्तर पर यह आरोप भी लगाया जा रहा है कि वहां कई बार केंद्र का संचालन सिर्फ सहायिका के भरोसे रह जाता है, वहीं संबंधित कार्यकर्ताओं की नियमित उपस्थिति को लेकर भी ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं, स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ कार्यकर्ताओं द्वारा केंद्र में अपनी उपस्थिति की फोटो संबंधित ग्रुप में भेजने के बाद अन्य स्थानों पर जाने की शिकायतें भी सामने आती रही हैं,हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र एवं आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,इसलिए इनकी वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी,लेकिन यदि किसी केंद्र में कार्यकर्ता की वास्तविक उपस्थिति और रिकॉर्ड में दर्ज उपस्थिति में अंतर पाया जाता है तो यह विभागीय जांच का गंभीर विषय होगा, आंगनबाड़ी कार्यकर्ता केवल उपस्थिति दर्ज कराने के लिए नहीं,बल्कि बच्चों की देखभाल, प्रारंभिक शिक्षा,पोषण संबंधी गतिविधियों और विभागीय योजनाओं के क्रियान्वयन की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। इसलिए उनकी वास्तविक उपस्थिति का सत्यापन जरूरी है।
मुख्यालय के मुख्य मार्ग पर ही सवाल तो दूरस्थ गांवों का क्या?
इस पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह बताई जा रही है कि ऐसी शिकायतें केवल अत्यंत दूरस्थ गांवों तक सीमित नहीं हैं, परियोजना मुख्यालय के आसपास और मुख्य मार्ग से जुड़े केंद्रों की व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं,यदि मुख्यालय के आसपास स्थित केंद्रों में ही बच्चों की उपस्थिति, कार्यकर्ताओं की मौजूदगी और केंद्र संचालन को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं तो दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिति की भी गंभीरता से जांच की आवश्यकता है,दूरस्थ क्षेत्रों में विभागीय अधिकारियों का नियमित निरीक्षण अपेक्षाकृत कठिन हो सकता है,ऐसे में वहां अचानक निरीक्षण और ग्राम स्तर पर सत्यापन और भी महत्वपूर्ण हो जाता है।
‘विरोध किया तो फंसा देंगे ग्रामीणों में भय का आरोप
मामले का एक और गंभीर पहलू स्थानीय ग्रामीणों द्वारा लगाए जा रहे कथित आरोप हैं, सूत्रों के अनुसार कुछ ग्रामीणों ने जब आंगनबाड़ी केंद्रों की व्यवस्था को लेकर सवाल उठाए तो उन्हें कथित तौर पर झूठे मामलों में फंसाने की धमकी दिए जाने की बात सामने आई है,इन आरोपों की भी फिलहाल कोई स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,ऐसे में प्रशासन के लिए यह जरूरी हो जाता है कि यदि ऐसी शिकायतें वास्तव में प्राप्त हुई हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच कराई जाए,किसी भी सरकारी व्यवस्था में नागरिकों को अपनी शिकायत रखने और अनियमितता की जानकारी संबंधित अधिकारियों तक पहुंचाने का अधिकार होना चाहिए,यदि शिकायतकर्ता भय के कारण सामने नहीं आते हैं तो जमीनी स्थिति की वास्तविक जानकारी अधिकारियों तक पहुंचना मुश्किल हो सकता है।
सुपरवाइजर की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल
आंगनबाड़ी केंद्रों की निगरानी में सेक्टर सुपरवाइजर की भूमिका महत्वपूर्ण होती है,उन्हें केंद्रों का निरीक्षण कर कार्यकर्ताओं की उपस्थिति,बच्चों की संख्या, पोषण आहार, रिकॉर्ड और केंद्र संचालन की स्थिति की जानकारी लेना होता है, ऐसे में यदि किसी केंद्र में लंबे समय से बच्चों की संख्या बेहद कम है, केंद्र समय से पहले बंद होने की शिकायत है या कार्यकर्ता की अनुपस्थिति को लेकर सवाल हैं, तो यह जानना जरूरी होगा कि संबंधित सुपरवाइजर के निरीक्षण में क्या स्थिति सामने आई, स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों द्वारा सुपरवाइजरों की कार्रवाई को लेकर पक्षपात अथवा‘मुंह देखकर कार्रवाई’ किए जाने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं,इन आरोपों की भी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन इन्हें दूर करने का सबसे बेहतर तरीका पारदर्शी निरीक्षण और कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक करना हो सकता है।
पोषण आहार के रिकॉर्ड का हो मिलान
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण जांच बच्चों की संख्या और पोषण आहार वितरण के रिकॉर्ड का मिलान करके की जा सकती है, यदि किसी केंद्र में 20 बच्चे पंजीकृत हैं और नियमित रूप से 2-6 बच्चे ही आते हैं तो विभाग को यह देखना चाहिए कि प्रतिदिन कितने बच्चों की उपस्थिति दर्ज की गई? कितने बच्चों के लिए पोषण आहार तैयार या वितरित किया गया? टेक-होम राशन कितने लाभार्थियों को दिया गया? संबंधित अभिभावकों को वास्तव में राशन मिला या नहीं? पिछले छह महीने अथवा एक वर्ष की उपस्थिति का पैटर्न क्या रहा? क्या रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति में कोई अंतर है? इन बिंदुओं पर रिकॉर्ड का ऑडिट और भौतिक सत्यापन होने पर काफी हद तक वास्तविक तस्वीर सामने आ सकती है।
अचानक निरीक्षण ही खोलेगा ‘कागजी बच्चों’ का राज
यदि विभाग वास्तव में स्थिति स्पष्ट करना चाहता है तो नियमित पूर्व निर्धारित निरीक्षण के बजाय अचानक निरीक्षण सबसे प्रभावी तरीका हो सकता है,अधिकारी किसी भी केंद्र में बिना पूर्व सूचना पहुंचकर वहां मौजूद बच्चों की संख्या दर्ज करें,बच्चों के अभिभावकों से संपर्क करें,उपस्थिति रजिस्टर से मिलान करें और कार्यकर्ता-सहायिका की वास्तविक मौजूदगी देखें। साथ ही पोषण आहार एवं अन्य सामग्री के रिकॉर्ड की भी जांच की जाए,जरूरत पड़ने पर पिछले कई महीनों के रिकॉर्ड का भी परीक्षण किया जा सकता है। इससे यह पता चल सकेगा कि कम उपस्थिति कोई अस्थायी स्थिति है या लंबे समय से चली आ रही व्यवस्था।
जिम्मेदारी तय करने की जरूरत
आंगनबाड़ी केंद्रों की व्यवस्था में कार्यकर्ता से लेकर सहायिका,सुपरवाइजर और परियोजना अधिकारी तक सभी की अलग-अलग जिम्मेदारियां निर्धारित हैं,यदि किसी जांच में अनियमितता सामने आती है तो केवल निचले स्तर के कर्मचारी पर कार्रवाई करने के बजाय यह भी देखा जाना चाहिए कि निगरानी की जिम्मेदारी निभाने वाले अधिकारियों ने समय रहते स्थिति क्यों नहीं पकड़ी, यदि रिकॉर्ड सही है तो विभाग को यह स्पष्ट करना चाहिए कि केंद्रों में बच्चों की वास्तविक उपस्थिति इतनी कम क्यों है, यदि रिकॉर्ड और वास्तविकता में अंतर है तो इसके लिए जिम्मेदार व्यक्ति या व्यवस्था की पहचान होनी चाहिए।
अब विभाग के सामने कई सवाल
बैकुंठपुर और खड़गवां परियोजना से जुड़ी शिकायतों के बाद महिला एवं बाल विकास विभाग के सामने कई सवाल खड़े हैं, क्या विभाग सभी केंद्रों का विशेष निरीक्षण कराएगा? क्या रजिस्टर में दर्ज बच्चों का घर-घर सत्यापन होगा? क्या उपस्थिति और पोषण आहार वितरण के रिकॉर्ड का मिलान किया जाएगा? क्या कार्यकर्ताओं की वास्तविक उपस्थिति की जांच होगी? और यदि आरोप गलत हैं तो विभाग ग्रामीणों की शिकायतों का समाधान किस तरह करेगा? आखिर जब रजिस्टर में 18-20 बच्चे दर्ज हैं और केंद्र में 2-6 बच्चे ही दिखाई देने की शिकायत है, तो बाकी बच्चे कहां हैं? यह सवाल किसी एक आंगनबाड़ी केंद्र का नहीं, बल्कि पूरी निगरानी व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा है। अब देखना होगा कि विभाग इन शिकायतों को महज आरोप मानकर छोड़ देता है या फिर मौके पर जांच कर वास्तविक स्थिति सामनेकहीं दो बच्चों में चल रहा केंद्र! कायतों में यह भी बात सामने आ रही है कि कुछ आंगनबाड़ी केंद्रों में लंबे समय से बच्चों की संख्या बेहद कम बताई जा रही है,कहीं-कहीं तो महज दो बच्चों की मौजूदगी में केंद्र संचालित होने की चर्चा है,यदि किसी केंद्र में लगातार इतनी कम उपस्थिति रहती है तो विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों को इसकी वजह पता करनी चाहिए,क्या संबंधित गांव के बच्चे स्कूल जाने लगे हैं? क्या अभिभावक बच्चों को आंगनबाड़ी भेजना नहीं चाहते? क्या केंद्र की सेवाओं से ग्रामीण संतुष्ट नहीं हैं? या फिर केंद्र में कार्यकर्ता की नियमित उपस्थिति नहीं होने के कारण बच्चों की संख्या कम हुई है? इन सभी पहलुओं की जांच आवश्यक है,क्योंकि बच्चों की कम उपस्थिति को केवल बच्चों की अनुपस्थिति मानकर छोड़ देना भी उचित नहीं होगा। यदि लगातार कई वर्षों से किसी केंद्र में कम बच्चे पहुंच रहे हैं तो परियोजना अधिकारी और सेक्टर सुपरवाइजर की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठेंगे।
समय से पहले बंद हो रहे केंद्र?
ग्रामीणों की शिकायतों में एक और महत्वपूर्ण आरोप आंगनबाड़ी केंद्रों के निर्धारित समय से पहले बंद होने का है,यदि केंद्र समय से पहले बंद होते हैं तो इसका सीधा असर बच्चों की सेवाओं पर पड़ सकता है,विशेष रूप से उन परिवारों के बच्चों पर, जिनके लिए आंगनबाड़ी ही पोषण और प्रारंभिक शिक्षा का प्रमुख केंद्र है,इस स्थिति में यह भी जांच की जरूरत है कि संबंधित केंद्रों के खुलने और बंद होने का वास्तविक समय क्या है और क्या निरीक्षण के दौरान अधिकारियों द्वारा इसका सत्यापन किया जाता है,यदि विभागीय रिकॉर्ड में केंद्र पूरे समय संचालित दिखाए जा रहे हों,जबकि मौके पर स्थिति अलग हो,तो यह रिकॉर्ड और वास्तविकता के बीच अंतर का मामला बन सकता है।


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