
- विकास कॉरिडोर या ‘कमीशन का गलियारा’? 7.18 करोड़ की सड़क में पहली बारिश ने खोल दी पोल
- पहले पाइप डालो,फिर सड़क बनाओ… अब सड़क धंसी तो फिर पाइप को कंक्रीट करो!
- GSB-WMM चढ़ा दिया,पाइप का बेस भूल गए? बारिश में धंसी 7.18 करोड़ की सड़क
- ठेकेदार की ‘शॉर्टकट टेक्नोलॉजी’ या विभाग की मेहरबानी? पाइप दबा तो सड़क में बना गड्ढा
- एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन,अबरीवर्क का नंबर! गंगोटी-शिवपुर सड़क में गुणवत्ता का खेल?
- कल्याण गए, हेमंत आए…क्या अबसड़क का होगा सचमुच कल्याण?
- 5 महीने का काम 14 महीने में भी अधूरा, जो बना वह भी बैठ गया अब किसकी जिम्मेदारी?
- 7.18 करोड़ की गंगोटी-शिवपुर सड़क में निर्माण की ‘नई तकनीक’ पर सवाल,पहले कंक्रीट के बिना पाइप डालने का आरोप,अब विभाग कह रहा…उखाड़कर स्थायी बनाएंगे।
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,08 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सरकारी सड़क निर्माण में तकनीक लगातार विकसित हो रही है,पहले सड़क बनती थी,फिर उसकी गुणवत्ता देखी जाती थी,लेकिन गंगोटी-शिवपुर नवापारा मार्ग पर शायद ‘नई निर्माण तकनीक’ का प्रयोग हो रहा है—पहले पाइप डालो, उसके ऊपर मिट्टी डालो, फिर GSB और WMM कर दो, बरसात का इंतजार करो और जब सड़क बैठ जाए तो कह दो कि अब इसे उखाड़कर पाइप को कंक्रीट से स्थायी बनाया जाएगा, यानी सड़क निर्माण का नया फार्मूला कुछ यूं नजर आ रहा है पहले निर्माण, फिर समस्या, फिर खुदाई और अंत में दोबारा निर्माण, और इस पूरी प्रक्रिया में जनता के हिस्से में क्या आया? कीचड़, गड्ढे, धंसती सड़क और सवाल।
नाम ‘कल्याण’,सड़क का हुआ कैसा कल्याण?- गंगोटी-शिवपुर नवापारा सड़क की देखरेख जिस अवधि में प्रभारी एसडीओ कल्याण के जिम्मे थी, उसी दौरान सड़क निर्माण की गति और गुणवत्ता को लेकर सवाल उठते रहे,अब नाम में ही ‘कल्याण’ हो तो जनता को भी उम्मीद रहती है कि सड़क का भी कल्याण होगा,लेकिन मौके की तस्वीरें देखकर तो लगता है कि सड़क का कल्याण कुछ इस तरह हुआ कि सड़क पांच महीने में बननी थी, समय निकल गया,काम अधूरा रहा,गुणवत्ता पर सवाल उठे, और बरसात आई तो सड़क के नीचे का सच भी बाहर आ गया,अब इसे संयोग कहें,निर्माण की कमी कहें या तकनीकी चूक—इसका फैसला जांच करेगी। लेकिन इतना जरूर है कि सड़क का ‘कल्याण’ फिलहाल जनता की परेशानी के रूप में दिखाई दे रहा है।
ह्यूम पाइप की ‘कमाल की तकनीक’- वर्क ऑर्डर में 600 मिमी व्यास के RCC NP–3/ प्रेस्ट्रेस्ड पाइप कलवर्ट की 110 मीटर मात्रा दर्ज है,पाइप कलवर्ट से संबंधित बेडिंग और अन्य कार्यों का भी प्रावधान है,लेकिन मौके की तस्वीर और उपलब्ध जानकारी के अनुसार विवाद उस पाइप को लगाने के तरीके को लेकर है,आरोप है कि पाइप को पहले सीधे बिछाया गया,उसके आसपास अपेक्षित संरचनात्मक कार्य नहीं किया गया और उसके ऊपर मिट्टी,GSB तथा WMM की परतें डाल दी गईं, फिर बारिश हुई, पानी आया, मिट्टी बैठी,पाइप दबा और सड़क भी बैठ गई, अब इसे देखकर आम आदमी भी पूछ रहा है भाई,यह कौन-सी तकनीक है? पहले पाइप डालो,फिर सड़क बना दो,फिर सड़क धंसने दो,फिर सड़क उखाड़ो,फिर पाइप को कंक्रीट करो,और फिर सड़क दोबारा बनाओ, सरकारी निर्माण की यह ‘रीवर्क टेक्नोलॉजी’ अगर सचमुच तकनीकी प्रक्रिया का हिस्सा है तो इसका पूरा नाम और मैनुअल भी जनता को दिखाया जाना चाहिए!
पहले अस्थायी,फिर स्थायी—तो पैसा किसका?- अब विभागीय स्तर से यह बात सामने आने की जानकारी है कि पाइप को पहले इस तरह लगाया गया था और अब संबंधित हिस्से को उखाड़कर उसे कंक्रीट कर स्थायी रूप दिया जाएगा,बस,यहीं से कहानी में नया अध्याय जुड़ता है, अगर पहले से पता था कि पाइप को स्थायी रूप से कंक्रीट करना है तो— उसके ऊपर GSB और WMM क्यों किया गया? अगर वह अस्थायी व्यवस्था थी तो उस पर सड़क की परतें क्यों डाली गईं? और यदि वह स्थायी व्यवस्था थी तो अब उसे उखाड़ने की जरूरत क्यों पड़ रही है? और सबसे महत्वपूर्ण एक ही जगह पर काम दोबारा हुआ तो उसका खर्च कौन उठाएगा? जनता का? ठेकेदार का? या फिर सरकारी रिकॉर्ड में इसे किसी दूसरी मद में समायोजित कर दिया जाएगा? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह परियोजना करोड़ों रुपये की है।
‘पहले बनाओ, फिर सुधारो’ मॉडल कितना महंगा पड़ेगा?- सड़क निर्माण में यदि किसी तकनीकी गलती को अगली लेयर डालने से पहले पकड़ लिया जाए तो सुधार अपेक्षाकृत आसान होता है,लेकिन जब उसके ऊपर सड़क की परतें बिछ जाएं और बाद में उसे उखाड़ना पड़े तो पहले का काम भी प्रभावित होता है और दोबारा निर्माण की जरूरत भी पैदा होती है, यानी जनता के लिए सड़क बनाने का उद्देश्य था एक बार खर्च करो और मजबूत सड़क बनाओ, लेकिन यदि प्रक्रिया यह बन जाए—बनाओ ? धंसाओ ? उखाड़ो ? फिर बनाओ तो सवाल केवल गुणवत्ता का नहीं, कार्य प्रबंधन और सरकारी धन की दक्षता का भी है।
GSB-WMM भी हो गया,लेकिन पाइप का बेस नहीं?- यही इस मामले का सबसे दिलचस्प पहलू है, सड़क में GSB और WMM जैसी परतों का काम आगे बढ़ चुका था,लेकिन जिस स्थान पर पानी निकासी के लिए पाइप डाला गया,वहां यदि पाइप की बेडिंग, बैकफिलिंग और कम्पेक्शन पर्याप्त नहीं था,तो ऊपर की मजबूत परतें भी कितनी देर टिकतीं? आखिर सड़क की मजबूती केवल ऊपर दिखाई देने वाली गिट्टी से तय नहीं होती, नीचे क्या है, कैसे है और कितना मजबूत है—सड़क की असली जिंदगी वहीं तय होती है, और बरसात ने शायद इसी ‘नीचे’ की कहानी जनता को दिखा दी।
18.18 प्रतिशत कम दर का ठेका-अब हर लेयर की जांच जरूरी-इस काम की स्वीकृति SOR से 18.18 प्रतिशत कम दर पर हुई है,कार्यादेश में निविदा राशि ?718.42 लाख और अनुबंध राशि करीब ?587.81 लाख दर्ज है,कम दर पर ठेका मिलना अपने आप में कोई अनियमितता नहीं है,लेकिन जब उसी सड़क पर समय-सीमा का सवाल हो, निर्माण की गति पर सवाल हो,गुणवत्ता पर सवाल हो,पाइप के आसपास धंसाव सामने आए, और फिर उसी हिस्से को उखाड़कर दोबारा बनाने की बात सामने आए,तो अब विभाग को तकनीकी दस्तावेजों के साथ जवाब देना चाहिए।
60 महीने की गारंटी है तो क्या 60 महीने गड्ढे भी रहेंगे?- कार्यादेश में 60 माह की परफॉर्मेंस गारंटी का प्रावधान है,यह सुनकर जनता शायद यही पूछे साहब,सड़क आज खराब हुई है, तो क्या हमें 60 महीने गारंटी की फाइल लेकर चलना होगा? गारंटी का मतलब यह नहीं कि सड़क निर्माण के दौरान गुणवत्ता से समझौता किया जा सकता है,गारंटी तो खराबी आने पर सुधार की व्यवस्था है,लेकिन यदि निर्माणाधीन सड़क ही पहली बरसात में धंसने लगे तो प्राथमिक सवाल यह होना चाहिए कि निर्माण की प्रक्रिया में कमी कहां हुई?
अब कल्याण के बाद हेमंत एक्का की परीक्षा-अब इस सड़क की जिम्मेदारी हेमंत एक्का के एसडीओ के रूप में मिलने की जानकारी है,यानी सड़क को नया अधिकारी मिल गया,अब देखना यह है कि अधिकारी बदलने से सड़क की किस्मत भी बदलती है या सिर्फ फाइल पर नाम बदलता है,नई व्यवस्था के सामने चुनौती साफ है पाइप की तकनीकी जांच हो,धंसे हिस्से की जांच हो,सड़क की बेस और सब-बेस की गुणवत्ता जांची जाए,कम्पेक्शन टेस्ट की रिपोर्ट सामने आए,एस्टीमेट और ड्राइंग से मौके का मिलान हो,पुराने कार्य की माप और भुगतान की जांच हो,ठेकेदार को दिए गए एक्सटेंशन और नोटिस का रिकॉर्ड सार्वजनिक हो,और सबसे जरूरी—जो काम गलत हुआ है, उसे किसकी जिम्मेदारी पर दोबारा कराया जाएगा,यह स्पष्ट हो।
एक्सटेंशन का असली ‘कल्याण’ कौन करेगा?– अब सड़क से जुड़ा एक और बड़ा रहस्य विभागीय फाइलों में छिपा है अब तक कितनी बार एक्सटेंशन दिया गया? कितने दिनों का? किस आधार पर? किस अधिकारी ने स्वीकृत किया?
ठेकेदार को कितने नोटिस दिए गए? नोटिस के बाद क्या कार्रवाई हुई? विलंब पर आर्थिक दंड लगाया गया या नहीं? अगली पूर्णता तिथि क्या है? जनता के लिए यह जानकारी इसलिए जरूरी है क्योंकि पांच महीने की निर्धारित अवधि वाली परियोजना अब उससे कई गुना अधिक समय ले रही है।
चाय-नाश्ते की चर्चा या सड़क की गुणवत्ता की चर्चा?- क्षेत्र में अधिकारी और ठेकेदार के बीच कथित नजदीकी को लेकर भी चर्चाएं हैं, चाय-नाश्ते की चर्चा हो या कमीशन की चर्चा—इनमें से किसी को भी बिना प्रमाण तथ्य नहीं कहा जा सकता, लेकिन सरकारी सड़क में यदि गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं तो अधिकारी और ठेकेदार की बैठक में सबसे पहले चर्चा किसकी होनी चाहिए? चाय की या सड़क की? नाश्ते की या गुणवत्ता परीक्षण की? कमीशन की अफवाहों की या माप पुस्तिका की? जवाब स्पष्ट है—सड़क की गुणवत्ता की, यदि विभागीय रिकॉर्ड मजबूत है तो अफवाहों को जवाब देना भी आसान होगा।
अब ‘कमीशन कॉरिडोर’ शब्द क्यों चर्चा में है?– लोगों में अब इस सड़क को लेकर तरह-तरह की बातें हैं,कोई इसे विकास का कॉरिडोर कह रहा है तो कोई व्यंग्य में कमीशन का गलियारा,लेकिन पत्रकारिता की दृष्टि से किसी कमीशन लेन-देन को प्रमाण के बिना तथ्य बताना उचित नहीं होगा,हाँ,यह जरूर पूछा जा सकता है कि यदि काम समय पर नहीं हुआ तो कार्रवाई क्यों नहीं? यदि गुणवत्ता पर सवाल उठे तो जांच क्यों नहीं? यदि पाइप का काम दोबारा करना पड़ा तो पहली बार इसे किसने पास किया? यदि एक्सटेंशन मिला तो उसका आधार क्या था? यही सवाल इस पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं।
सड़क का ‘कल्याण’ अब जांच से ही होगा-गंगोटी-शिवपुर नवापारा सड़क का मामला अब उस मुकाम पर पहुंच गया है जहां केवल ठेकेदार को दोषी बताकर या केवल विभाग को कटघरे में खड़ा करके कहानी खत्म नहीं की जा सकती,तकनीकी जांच जरूरी है, क्योंकि तस्वीरें सवाल जरूर खड़े करती हैं, लेकिन अंतिम दोष तय करने के लिए इंजीनियरिंग जांच जरूरी है,पाइप के नीचे क्या था? बेडिंग कितनी थी? बैकफिल किस सामग्री से हुआ? कम्पेक्शन कितना हुआ? पानी की निकासी की डिजाइन क्या थी? GSB और WMM की मोटाई कितनी है? धंसाव का वास्तविक कारण क्या है? और क्या मौजूदा निर्माण एस्टीमेट व स्वीकृत ड्राइंग के अनुरूप है? इन सवालों के जवाब मिलते ही पता चलेगा कि गलती ठेकेदार की थी,निगरानी की थी, डिजाइन की थी या बारिश और जल निकासी की परिस्थितियों से समस्या पैदा हुई।
अब जनता को ‘सड़क’ चाहिए, ‘कहानी’ नहीं- 7.18 करोड़ रुपये की परियोजना का उद्देश्य कोई प्रयोगशाला में नई निर्माण तकनीक आजमाना नहीं था,उद्देश्य था गंगोटी से शिवपुर नवापारा तक मजबूत और सुरक्षित सड़क देना,लेकिन आज तस्वीर यह है सड़क अधूरी है,आवागमन परेशान है, बारिश में पानी भरा है,कुछ हिस्सों में धंसाव सामने आया है,पाइप को लेकर सवाल हैं,समय-सीमा को लेकर सवाल है, एक्सटेंशन को लेकर सवाल है,और सबसे ऊपर—गुणवत्ता की निगरानी को लेकर सवाल है, अब नए प्रभारी अधिकारी हेमंत एक्का के सामने यही परीक्षा है कि वे फाइल में दर्ज सड़क देखते हैं या जमीन पर बनी सड़क,क्योंकि कागज पर सड़क कितनी भी मजबूत क्यों न हो,जनता आखिरकार उसी सड़क पर चलती है जो जमीन पर बनी होती है,और फिलहाल जमीन की तस्वीर यही पूछ रही है 5 महीने में बननी थी सड़क,14 महीने बाद भी अधूरी है, जो बना, वह पहली बारिश में बैठ गया—अब सड़क बनेगी या फिर एक्सटेंशन का ही कल्याण होता \
5 महीने का काम,14 महीने की कहानी
लोक निर्माण विभाग के कार्यादेश के अनुसार गंगोटी से शिवपुर नवापारा तक 5.10 किलोमीटर सड़क का निर्माण किया जाना है, कार्यादेश 30 जून 2025 को जारी हुआ था और कार्य अवधि 5 माह, वर्षा ऋतु सहित निर्धारित की गई थी,ठेका मे. जवाहरलाल गुप्ता को दिया गया। परियोजना की अनुमानित लागत 718.42 लाख यानी करीब 7.18 करोड़ रुपये है,अब कैलेंडर देखिए,पांच महीने कहां थे और सड़क कहां है? समय-सीमा निकल गई,लेकिन सड़क अभी भी अधूरी है,मौके पर कई हिस्सों में आवागमन की स्थिति खराब है और बारिश ने निर्माणाधीन सड़क की कमजोरियों को और उजागर कर दिया है,ऐसे में जनता का सीधा सवाल है क्या पांच महीने की परियोजना को एक्सटेंशन की ऐसी खुराक दी जा रही है कि सड़क पूरी होने से पहले ही उसकी उम्र बढ़ती रहे?
पहले खबर में अंदेशा था,अब सड़क में गड्ढा है-
निर्माण के दौरान ही सड़क की गुणवत्ता और एस्टीमेट के अनुरूप काम होने पर सवाल उठाए गए थे,तब सवाल था कि यदि सड़क के नीचे पानी की निकासी की व्यवस्था तकनीकी तरीके से नहीं की गई तो बरसात में सड़क बैठ सकती है, अब तस्वीर सामने है,सड़क के नीचे से मिट्टी हटती दिखाई दे रही है,पाइप का हिस्सा दिखाई दे रहा है। ऊपर सड़क की परत है,लेकिन नीचे खाली जगह और धंसाव जैसी स्थिति नजर आ रही है,यानी जिस बात का अंदेशा था,उसकी जमीनी तस्वीर सामने आ गई है, हालांकि केवल तस्वीर के आधार पर निर्माण दोष का अंतिम निष्कर्ष निकालना तकनीकी रूप से उचित नहीं होगा, इसके लिए विभाग को मौके की जांच, सड़क की कटिंग और पाइप के आसपास की संरचना की तकनीकी जांच करनी होगी, लेकिन सवाल यह जरूर है अगर सब कुछ तकनीकी मानकों के अनुसार था तो सड़क के नीचे यह स्थिति बनी कैसे?
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