दरिमा बीएमओ पर सूचना अधिकार कानून की अनदेखी का आरोप,स्वास्थ्य योजनाओं के खर्च का हिसाब मांगने पर शिकायतों के जरिए दबाव बनाने का भी दावा
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,08 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दरिमा के विकासखंड चिकित्सा अधिकारी (बीएमओ) कार्यालय पर सूचना का अधिकार अधिनियम,2005 के तहत मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने में कथित तौर पर लापरवाही बरतने का गंभीर मामला सामने आया है। छत्तीसगढ़ प्रदेश स्वास्थ्य कर्मचारी संघ के प्रांताध्यक्ष अनिल पाण्डेय ने स्वास्थ्य विभाग की योजनाओं में वित्तीय अनियमितता की आशंका को लेकर मई 2026 में आरटीआई के तहत जानकारी मांगी थी। उनका आरोप है कि निर्धारित प्रक्रिया के तहत शुल्क जमा करने के बावजूद अब तक मांगी गई जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है।
राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राशि के खर्च का मांगा था पूरा ब्यौरा : पाण्डेय द्वारा वित्तीय वर्ष 2024-25 एवं 2025-26 के दौरान राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के तहत स्वीकृत आरओपी के अनुसार सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र दरिमा को उपलब्ध कराई गई राशि तथा उसके खर्च से संबंधित दस्तावेज मांगे गए थे। आरटीआई आवेदन में विशेष रूप से राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की स्वीकृत राशि के मदवार खर्च का विवरण,जीवन दीप समिति का बैंक स्टेटमेंट,आरओपी के विरुद्ध खर्च की गई राशि के संबंध में अपनाई गई प्रक्रिया तथा भुगतान से संबंधित समस्त दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी गई थीं। आवेदक का कहना है कि ये जानकारियां सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के उपयोग और स्वास्थ्य योजनाओं के संचालन से जुड़ी हैं,इसलिए इनका सार्वजनिक महत्व है।
जानकारी मांगने के बाद अधिकारियों से शिकायत का आरोप : आवेदक का आरोप है कि आरटीआई आवेदन प्रस्तुत किए जाने के बाद बीएमओ डॉ. राहुल कुशवाहा द्वारा कलेक्टर सरगुजा सहित स्वास्थ्य विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों को उनके तथा संगठन के पदाधिकारियों के संबंध में शिकायतें की गईं। पाण्डेय का दावा है कि इन शिकायतों के जरिए उन पर दबाव बनाने का प्रयास किया गया,ताकि वे मांगी गई जानकारी के मामले में आगे कार्रवाई न करें। हालांकि,आवेदक के अनुसार वे दबाव में नहीं आए और आरटीआई अधिनियम के तहत जानकारी प्राप्त करने की प्रक्रिया जारी रखी।
पहले 52 हजार का चालान, अवलोकन के बाद 28 हजार जमाः आवेदक के मुताबिक, सूचना उपलब्ध कराने की निर्धारित समय-सीमा समाप्त होने के कुछ दिन पहले बीएमओ कार्यालय की ओर से पत्र जारी कर करीब 52 हजार का चालान जमा करने की जानकारी दी गई। इतनी बड़ी राशि की मांग पर आवेदक ने संपूर्ण दस्तावेजों का पहले अवलोकन करने का आग्रह किया। बताया गया कि कार्यालय द्वारा निर्धारित समय पर दस्तावेजों के अवलोकन का अवसर दिया गया। अवलोकन के दौरान आवेदक ने आवश्यक दस्तावेज चिन्हित कर उनकी प्रमाणित प्रतियां उपलब्ध कराने का आग्रह किया। इसके बाद कथित रूप से 28 हजार की राशि नियमानुसार जमा कराई गई।
राशि जमा होने के बाद भी जानकारी नहीं मिलने का आरोप : आवेदक का कहना है कि निर्धारित शुल्क जमा करने के बावजूद संबंधित दस्तावेज अब तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। उनका आरोप है कि आरटीआई अधिनियम में निर्धारित समय-सीमा के अतिरिक्त लगभग 15 दिन और बीत जाने के बाद भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई। यही वजह है कि अब अनिल पाण्डेय ने प्रथम अपीलीय अधिकारी एवं मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी, सरगुजा के समक्ष प्रथम अपील प्रस्तुत की है। अपील में मांगी गई जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ सूचना देने में कथित विलंब एवं आरटीआई अधिनियम के प्रावधानों की अनदेखी के लिए जिम्मेदार अधिकारी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की मांग की गई है।
सवाल सार्वजनिक धन के हिसाब का है : पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राशि सरकारी स्वीकृति और आरओपी के अनुसार खर्च की गई है,तो उसके मदवार खर्च, भुगतान प्रक्रिया,बैंक स्टेटमेंट और संबंधित दस्तावेज उपलब्ध कराने में इतनी देरी क्यों हो रही है आरटीआई के माध्यम से मांगी गई जानकारी किसी निजी विषय से नहीं,बल्कि सरकारी धन और स्वास्थ्य योजनाओं के संचालन से जुड़ी है। ऐसे में यदि आवेदक के आरोप सही हैं तो मामला केवल एक आरटीआई आवेदन में देरी का नहीं, बल्कि पारदर्शिता और जवाबदेही की व्यवस्था पर भी सवाल खड़ा करता है। अब निगाहें प्रथम अपीलीय अधिकारी की कार्रवाई पर टिकी हैं। क्या अपीलीय अधिकारी समय-सीमा के भीतर आवेदक को पूरी जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश देंगे? क्या सूचना देने में हुई कथित देरी की जिम्मेदारी तय होगी? और सबसे अहम—राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की राशि के खर्च से जुड़े दस्तावेज सार्वजनिक जांच के लिए सामने आएंगे या नहीं? इन सवालों के जवाब से ही पूरे मामले की वास्तविक तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
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