
- शिवप्रसादनगर में हमाली से 1.16 करोड़ की डेबिट तक सवाल ही सवाल सोनपुर के 1,074 और कुर्रीडीह के 474 किसानों के लिए हमाली राशि जारी,शिवप्रसादनगर में मजदूरी,वेतन और नकद भुगतान का हिसाब सवालों में—पूर्व सत्यापन में 5,552 क्विंटल धान कम मिलने के बाद भी मदवार जांच का इंतजार
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,08 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। धान खरीदी केंद्रों में किसानों और हमाल मजदूरों से जुड़ी हमाली राशि अब शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र के वित्तीय हिसाब-किताब पर एक नया सवाल खड़ा कर रही है,जिले के सोनपुर (बंजा) और कुर्रीडीह धान खरीदी केंद्रों से संबंधित दस्तावेज सामने आए हैं,जिनमें किसानों से जुड़ी हमाली राशि के भुगतान की प्रक्रिया स्पष्ट रूप से दर्ज है,दूसरी ओर शिवप्रसादनगर के किसानों को हमाली की राशि नहीं मिलने की बात सामने आने के साथ ही समिति के बैंक खाते से हुई बड़ी निकासी और मजदूरी भुगतान की प्रविष्टियां भी सवालों के घेरे में आ गई हैं। मामला इसलिए गंभीर है क्योंकि यहां सवाल केवल कुछ हजार या लाख रुपये की हमाली का नहीं,बल्कि धान खरीदी,मजदूरी,वेतन, नकद भुगतान,बैंक ट्रांसफर और स्टॉक के पूरे वित्तीय हिसाब का है, उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट के अनुसार 12 नवंबर 2025 से 21 जुलाई 2026 तक दर्ज डेबिट प्रविष्टियों का कुल योग करीब 1.16 करोड़ बताया जा रहा है,वहीं पूर्व में उपलब्ध कराए गए आंकड़ों में 82.51 लाख से अधिक की डेबिट को लेकर सवाल उठाए गए थे। इन दोनों आंकड़ों को एक ही अवधि या एक ही मद का आंकड़ा मानना उचित नहीं होगा। लेकिन दोनों ही स्थितियां एक सवाल जरूर खड़ा करती हैं—आखिर समिति के खाते से निकली रकम का मदवार हिसाब क्या है?
सोनपुर में 1,074 किसानों के लिए 4.64 लाख-आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर से संबंधित उपलब्ध दस्तावेज में खरीफ वर्ष 2025-26 के लिए सोनपुर (बंजा) और उपार्जन केंद्र कुर्रीडीह में धान बेचने वाले किसानों की हमाली राशि के भुगतान का उल्लेख है, दस्तावेज के अनुसार सोनपुर (बंजा) के 1,074 किसान, कुल धान 66,392.80 क्विंटल,हमाली दर 7 प्रति क्विंटल कुल राशि 4,64,749.60 किसानो के खाते जमा हुई, वहीं कुर्रीडीह में 474 किसान की कुल धान 32,361.60 क्विंटल की हमाली राशी 7 प्रति क्विंटल की दर से कुल राशि 2,26,531.20 अर्थात दोनों केंद्रों के लिए कुल 6,91,280.80 की हमाली राशि का भुगतान किया गया है,यही दस्तावेज अब शिवप्रसादनगर के किसानों के सवाल को और मजबूत करता है…जब अन्य केंद्रों में हमाली राशि के भुगतान की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, तो शिवप्रसादनगर में किसानों की राशि कहां है?
मजदूरों को भुगतान हुआ या किसानों की राशि उनके खाते में जानी थी?- यही वह बिंदु है जहां पूरे मामले की सबसे महत्वपूर्ण जांच की जरूरत है,यदि संबंधित व्यवस्था के तहत हमाली की राशि किसानों को उनके खातों में दी जानी थी, तो शिवप्रसादनगर के किसानों को भुगतान क्यों नहीं हुआ? और यदि समिति ने हमाल मजदूरों को भुगतान किया,तो…कितने मजदूर थे? किसे कितना भुगतान किया गया? किस तारीख को किया गया? किस दर से किया गया? भुगतान नकद हुआ या बैंक से? मजदूरों की उपस्थिति कहां दर्ज है? इन सवालों का जवाब मजदूरी रजिस्टर,भुगतान पंजी,वाउचर और बैंक रिकॉर्ड से आसानी से निकाला जा सकता है,छत्तीसगढ़ की धान खरीदी व्यवस्था में समितियों द्वारा व्यय की मदवार जानकारी दर्ज करने का प्रावधान है और किसानों के भुगतान के बाद उपलब्ध राशि के अन्य मदों में उपयोग तथा वास्तविक व्यय के आधार पर समायोजन की व्यवस्था भी नीति में दी गई है,इसलिए किसी भी समिति में खर्च का वास्तविक स्वरूप रिकॉर्ड से स्पष्ट होना चाहिए।
हमाली का सवाल उठा तो बैंक खाते की पुरानी कहानी भी सामने आ गई-शिवप्रसादनगर में हमाली भुगतान का सवाल उठते ही समिति के बैंक खाते की पूर्व में सामने आई प्रविष्टियां भी महत्वपूर्ण हो गई हैं,उपलब्ध स्टेटमेंट के अनुसार 12 नवंबर 2025 से 21 जुलाई 2026 तक करीब 1.16 करोड़ की डेबिट प्रविष्टियां दर्ज हैं, लेकिन यहां एक महत्वपूर्ण सावधानी जरूरी है,इस पूरी रकम को धान खरीदी का खर्च नहीं कहा जा सकता,खाते में वेतन,मजदूरी,नकद भुगतान,बैंक शुल्क, आंतरिक ट्रांसफर और अन्य मदों की प्रविष्टियां भी शामिल हो सकती हैं,इसलिए वास्तविक सवाल है 1.16 करोड़ में धान खरीदी का खर्च कितना था और बाकी रकम किस-किस मद में गई? यही हिसाब अब सार्वजनिक होना चाहिए।
मजदूरी के नाम पर 1.59 लाख और 1.90 लाख की प्रविष्टियां-बैंक स्टेटमेंट में फरवरी 2026 की कुछ प्रविष्टियां विशेष रूप से ध्यान खींचती हैं, 4 फरवरी 2026 को 1,59,600 — ‘धान खरीदी 2025-26 मजदूरी’ तथा 5 फरवरी को 1,90,000— ‘मजदूरी भुगतान 2025-26’ के नाम से डेबिट दर्ज होने की बात सामने आई है,अब सवाल यह नहीं है कि बैंक से पैसा निकला या नहीं,सवाल यह है कि…क्या यह राशि वास्तव में मजदूरों को दी गई यदि हां तो मजदूरों की सूची सामने आए,प्रत्येक मजदूर को भुगतान की राशि सामने आए,भुगतान की तारीख और माध्यम सामने आए,मजदूरों के हस्ताक्षर अथवा बैंक ट्रांजैक्शन का रिकॉर्ड सामने आए,और यदि यह भुगतान किसी अन्य व्यवस्था के तहत किया जाना था तो समिति के खाते से यह रकम क्यों निकाली गई—इसका भी जवाब होना चाहिए।
वेतन के नाम पर भी लाखों की निकासी-बैंक स्टेटमेंट में वेतन भुगतान से जुड़ी प्रविष्टियां भी दर्ज बताई गई हैं, 26 दिसंबर 2025 को 3.90 लाख—‘जुलाई से 25 नवंबर तक वेतन’ के नाम से भुगतान और 9 मार्च 2026 को 2.34 लाख—‘दिसंबर 2025 से फरवरी 2026 तक वेतन भुगतान’ की प्रविष्टि का उल्लेख है,अब सवाल है कि संबंधित अवधि में समिति में कितने कर्मचारी कार्यरत थे और उनका स्वीकृत वेतन कितना था? यह भी कोई कठिन गणित नहीं है, कर्मचारियों की संख्या म मासिक वेतन म अवधि = कुल वेतन, फिर बैंक से निकली रकम से उसका मिलान किया जाए,यदि रकम बराबर है तो स्थिति साफ, यदि अंतर है तो अंतर का कारण और उसका दस्तावेज सामने आना चाहिए। ‘SM SPNAGAR को भुगतान’ के नाम पर नकद निकासी- स्टेटमेंट में ‘SM SPNAGAR को भुगतान किया गया’ जैसे विवरण के साथ कई नकद चेक भुगतान दर्ज बताए गए हैं,फरवरी से जुलाई 2026 के बीच अलग-अलग तारीखों में 1.35 लाख, 94,360, 67,320, 1.17 लाख, 1.33 लाख,1.78 लाख, 93,280,99,076,3.90 लाख,2.96 लाख,2.70 लाख,2.88 लाख और 2.91 लाख जैसी विभिन्न राशियों की प्रविष्टियां सामने आती हैं, नकद भुगतान अपने आप में अनियमितता का प्रमाण नहीं है, लेकिन सवाल यह है कि इन भुगतानों के पीछे काम क्या था? क्या उसका बिल है? क्या वाउचर है? क्या कैशबुक में प्रविष्टि है? क्या समिति का प्रस्ताव है? क्या भुगतान प्राप्त करने वाले का हस्ताक्षर है? यदि दस्तावेज मौजूद हैं तो भुगतान का औचित्य जांचा जा सकता है। यदि दस्तावेज नहीं हैं तो इन भुगतानों की अलग से जांच जरूरी होगी।
ट्रांसफर की रकम को भी खर्च बताना उचित नहीं-स्टेटमेंट में ‘TRF AS PER TCS PRASTAVÓ’ जैसे विवरण के साथ कुछ रकम दूसरे खातों में ट्रांसफर होने की जानकारी भी सामने आई है, उदाहरण के लिए 1 जनवरी 2026 को 2,06,669 और 1,44,955 की प्रविष्टियों का उल्लेख है,ऐसी रकम को सीधे धान खरीदी का खर्च मानना उचित नहीं होगा,लेकिन यहां भी तीन सवाल जरूरी हैं— ट्रांसफर किस प्रस्ताव पर हुआ? किस खाते में हुआ? उसका अंतिम उपयोग किस मद में हुआ?
और फिर सामने आया 5,552 क्विंटल धान की कमी का मामला- शिवप्रसादनगर का मामला सिर्फ बैंक खाते की डेबिट तक सीमित नहीं है, पूर्व में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रशासनिक सत्यापन के दौरान शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र में 5,552 क्विंटल धान कम पाए जाने की बात सामने आई थी,रिपोर्ट में इसकी कीमत करीब 1.72 करोड़ बताई गई थी,यह तथ्य बैंक खाते की जांच से अलग है,लेकिन दोनों को एक साथ देखने की जरूरत इसलिए है क्योंकि एक तरफ स्टॉक का सवाल है,दूसरी तरफ खाते का सवाल है, और तीसरी तरफ किसानों तथा मजदूरों के भुगतान का सवाल है, इन तीनों रिकॉर्ड का आपस में मिलान होने पर ही पूरी तस्वीर सामने आएगी।
पूर्व में खबर छपी, सवाल उठे—फिर भी जिम्मेदारों से हिसाब कौन मांगेगा?- शिवप्रसादनगर को लेकर पहले भी खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं,बैंक खाते की प्रविष्टियों पर सवाल उठ चुके हैं,धान की कमी का मामला सामने आ चुका है, अब हमाली राशि किसानों के खातों में पहुंचने की प्रक्रिया का दस्तावेज सामने आने के बाद एक नया सवाल जुड़ गया है, अगर सोनपुर और कुर्रीडीह में हमाली राशि का भुगतान किया जा सकता है,तो शिवप्रसादनगर में किसानों की राशि क्यों अटकी है? यदि मजदूरों को भुगतान कर दिया गया है तो उसका प्रमाण कहां है? यदि मजदूरों को भुगतान नहीं हुआ तो खाते से मजदूरी मद में राशि क्यों निकली? और यदि राशि किसानों के लिए थी तो उनके खातों तक क्यों नहीं पहुंची?
27 लाख के खर्च से 1.16 करोड़ की डेबिट तक—असली हिसाब कौन बताएगा?- पूर्व में उपलब्ध सामग्री में 27 प्रति क्विंटल के आधार पर करीब एक लाख क्विंटल धान पर लगभग 27 लाख का गणित सामने रखा गया था,वहीं दूसरी ओर अब उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट के अनुसार संबंधित अवधि में करीब 1.16 करोड़ की कुल डेबिट प्रविष्टियां बताई जा रही हैं,इन दोनों आंकड़ों के बीच अंतर को सीधे अनियमितता कहना सही नहीं होगा, क्योंकि खाते में कई तरह के लेन-देन हो सकते हैं,लेकिन यही अंतर यह पूछने के लिए पर्याप्त है कि कुल डेबिट में धान खरीदी से जुड़े वास्तविक खर्च कितने हैं मजदूरी कितनी है? वेतन कितना है? परिवहन कितना है? नकद भुगतान कितना है? आंतरिक ट्रांसफर कितना है? और ऐसी कितनी राशि है जिसके पीछे अभी तक स्पष्ट दस्तावेज सामने नहीं आए हैं?
एक लाख क्विंटल धान और हमाली का करीब सात लाख का गणित…
शिवप्रसादनगर केंद्र को लेकर उपलब्ध सामग्री में करीब एक लाख क्विंटल धान खरीदी का आंकड़ा सामने आया है,यदि सोनपुर के दस्तावेज में दर्ज 7 प्रति क्विंटल की दर को केवल गणितीय आधार मानें तो एक लाख क्विंटल पर हमाली राशि लगभग 7 लाख बनती है, यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि सोनपुर के दस्तावेज में दर्ज 7 प्रति क्विंटल की दर को शिवप्रसादनगर पर लागू करने से पहले संबंधित वर्ष के स्वीकृत आदेश और स्थानीय व्यवस्था से सत्यापित किया जाना चाहिए, लेकिन यदि शिवप्रसादनगर में भी यही दर लागू थी तो सवाल और सीधा हो जाता है—करीब एक लाख क्विंटल धान की हमाली की राशि कितनी बनी और उसका भुगतान किसे किया गया?
किसान पूछ रहे हैं…हमारी हमाली राशि आखिर कहां है?
किसान के लिए सवाल बहुत सीधा है, उसने धान बेचा,उसके नाम से खरीदी दर्ज हुई, हमाली की राशि निर्धारित हुई, दूसरे केंद्रों में किसानों के लिए राशि जारी होने का दस्तावेज सामने आया,तो फिर शिवप्रसादनगर के किसान क्यों इंतजार करें? और यदि यह राशि मजदूरों को दी गई है तो मजदूर भी पूछ सकते हैं—हमने काम किया, हमारा मेहनताना कितना बना और हमें कितना मिला? इसलिए यह मामला केवल समिति और किसानों के बीच का नहीं रह गया है,यह किसान, मजदूर और सहकारी समिति—तीनों के वित्तीय हिसाब की पारदर्शिता से जुड़ा सवाल बन चुका है।
अब सबसे जरूरी सवाल-मदवार हिसाब सार्वजनिक होगा या नहीं?
यदि समिति का पूरा खर्च नियमों के अनुसार हुआ है तो दस्तावेज सामने रखने में परेशानी नहीं होनी चाहिए,मजदूरी है तो मजदूरों की सूची सामने आए,वेतन है तो कर्मचारीवार वेतन बिल सामने आए,नकद भुगतान है तो वाउचर सामने आए,ट्रांसफर है तो प्रस्ताव और उपयोगिता सामने आए, धान खरीदी का खर्च है तो स्वीकृत दर और मद सामने आए,हमाली राशि किसानों के लिए है तो किसानों के खातों में भुगतान का रिकॉर्ड सामने आए, इसके बाद सवाल अपने आप खत्म हो सकते हैं,लेकिन यदि बैंक स्टेटमेंट में बड़ी निकासी हो, दूसरी ओर किसानों की हमाली राशि लंबित हो और मजदूरी भुगतान की प्रविष्टियों का वास्तविक लाभार्थी स्पष्ट न हो,तो मदवार जांच से बचना भी सवालों को बढ़ाएगा।
धान की बोरी का हिसाब पक्का, अब रुपये-रुपये का हिसाब कौन करेगा?
किसान जब धान लेकर खरीदी केंद्र पहुंचता है तो उसकी बोरी तौली जाती है,कितने क्विंटल धान आया, कितने क्विंटल खरीदा गया, कितना उठाव हुआ—हर स्तर पर रिकॉर्ड बनाया जाता है, अब वही पारदर्शिता समिति के बैंक खाते में भी दिखनी चाहिए, एक लाख क्विंटल धान का हिसाब बोरी-बोरी में लिया गया,तो खाते से निकले एक-एक रुपये का हिसाब रुपये-रुपये में क्यों नहीं? हमाली किसानों को मिली या नहीं? मजदूरों को भुगतान हुआ या नहीं? वेतन में कितना गया? नकद भुगतान किस काम में हुआ? ट्रांसफर कहां हुआ? और 12 नवंबर से 21 जुलाई तक खाते से निकली करीब 1.16 करोड़ रुपये की पूरी रकम आखिर किस-किस मद में गई? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब समिति से ज्यादा संबंधित सहकारिता और प्रशासनिक अधिकारियों से अपेक्षित है।
अंतिम सवाल–पूर्व में खबर प्रकाशित होने के बाद भी क्या कोई अधिकारी शिवप्रसादनगर के जिम्मेदारों से पूछेगा—किसान की हमाली राशि कहां है, मजदूर का मेहनताना कहां है और समिति के खाते से निकले पैसे का पूरा हिसाब कहां है?
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