-संवाददाता-
सूरजपुर,05 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। सूरजपुर वन मंडल के वन परिक्षेत्र सूरजपुर अंतर्गत केतका सर्किल के जंगलों में साल के हरे-भरे और पुराने पेड़ों की कथित अवैध कटाई को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। सामने आई तस्वीरों में साल के बड़े पेड़ों के तनों पर कटाई के निशान दिखाई दे रहे हैं,वहीं जंगल के भीतर लकड़ी के बड़े-बड़े पटरेनुमा टुकड़े भी नजर आ रहे हैं,इन तस्वीरों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या जंगल के भीतर पेड़ों को काटने के बाद लकड़ी को मौके पर ही चीरकर उपयोगी आकार में तैयार किया जा रहा है? हालांकि तस्वीरों के आधार पर अवैध कटाई या किसी व्यक्ति की संलिप्तता को अंतिम रूप से प्रमाणित नहीं किया जा सकता,पूरे मामले की वास्तविक स्थिति वन विभाग के मौके पर निरीक्षण और जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, लेकिन यदि तस्वीरों में दिखाई दे रही स्थिति वास्तव में अवैध कटाई से जुड़ी है तो यह वन सुरक्षा और विभागीय निगरानी व्यवस्था के लिए गंभीर मामला हो सकता है। जंगल में कटे पेड़, मौके पर लकड़ी के टुकड़े- केतका सर्किल के जंगल से सामने आई तस्वीरों में एक बड़े साल के पेड़ के तने पर कटाई के स्पष्ट निशान दिखाई दे रहे हैं,आसपास लकड़ी के टुकड़े और पटरेनुमा सामग्री भी नजर आ रही है, यही दृश्य इस मामले को सामान्य पेड़ कटाई से आगे ले जाता है, सवाल यह है कि यदि पेड़ काटे गए हैं तो क्या लकड़ी को जंगल से बाहर ले जाने के बजाय मौके पर ही चीरने की कोशिश की गई? यदि ऐसा हुआ है तो इसके लिए इस्तेमाल किए गए औजार या उपकरण जंगल तक कैसे पहुंचे और तैयार लकड़ी को वहां से किस माध्यम से बाहर ले जाया गया? इन सवालों का जवाब केवल मौके की जांच से ही मिल सकता है।
पेड़ काटना ही नहीं,लकड़ी को ‘तैयार माल’ में बदलने का आरोप– स्थानीय स्तर पर कुछ लोगों और सूत्रों की ओर से दावा किया जा रहा है कि क्षेत्र में कथित रूप से लंबे समय से साल की लकड़ी की अवैध कटाई और उसके परिवहन का सिलसिला चल रहा है,आरोप है कि जंगल में पेड़ों को काटने के बाद लकड़ी को वहीं चीरकर सिल्ली,कंडी या चौखट जैसे उपयोगी आकार में तैयार किया जाता है और फिर उसे अलग-अलग रास्तों से बाहर ले जाया जाता है,इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है, यदि जांच में जंगल के भीतर ही लकड़ी की चिराई की पुष्टि होती है तो मामला और गंभीर हो सकता है, क्योंकि तब यह पता लगाना जरूरी होगा कि वहां किस तरह के उपकरण इस्तेमाल किए गए और कितने समय से यह गतिविधि चल रही थी।
वन विभाग की गश्त पर बड़ा सवाल- जंगलों की सुरक्षा के लिए वन विभाग द्वारा नियमित गश्त और निगरानी की व्यवस्था की जाती है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि यदि जंगल में बड़े और पुराने साल के पेड़ों की कटाई हुई है तो वन अमले को इसकी जानकारी कब हुई? अगर पेड़ हाल में काटे गए हैं तो कटाई के निशान और लकड़ी के अवशेष मौके पर मौजूद होने के बावजूद इसकी सूचना विभाग तक क्यों नहीं पहुंची? और यदि स्थानीय दावों के अनुसार यह गतिविधि लंबे समय से चल रही है तो फिर नियमित गश्त के दौरान वन अमले को इसकी भनक क्यों नहीं लगी? ये सवाल किसी कर्मचारी को दोषी ठहराने के लिए नहीं, बल्कि वन सुरक्षा व्यवस्था की प्रभावशीलता जांचने के लिए महत्वपूर्ण हैं।
कर्मचारियों की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल- स्थानीय स्तर पर कुछ वन कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी संदेह व्यक्त किया जा रहा है, हालांकि किसी कर्मचारी की मिलीभगत अथवा लापरवाही का निष्कर्ष केवल आरोपों के आधार पर नहीं निकाला जा सकता,यदि विभाग जांच करता है तो उसे यह भी देखना चाहिए कि संबंधित क्षेत्र में किस-किस कर्मचारी की ड्यूटी थी, गश्त का रिकॉर्ड क्या है, वन अपराधों से संबंधित पूर्व सूचना या शिकायतें मिली थीं या नहीं और यदि मिली थीं तो उन पर क्या कार्रवाई की गई,इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि मामला केवल कुछ लोगों द्वारा की गई कथित अवैध गतिविधि का है या निगरानी व्यवस्था में भी कहीं कमी रही।
कितने पेड़ कटे? कितनी लकड़ी निकली?– मामले की गंभीरता का अंदाजा तभी लगाया जा सकेगा जब वन विभाग मौके पर जाकर पेड़ों और लकड़ी का वास्तविक आकलन करे, जांच में यह देखा जाना चाहिए कि कितने साल के पेड़ कटे हैं? पेड़ों की अनुमानित संख्या कितनी है? कटे हुए पेड़ों की उम्र और आकार क्या था? मौके पर कितनी लकड़ी मिली? लकड़ी के कितने टुकड़े या सिल्ली तैयार की गई? कटाई के निशान कितने पुराने हैं? लकड़ी को काटने में कौन से उपकरण इस्तेमाल किए गए? क्या आसपास और भी कटे हुए पेड़ों के ठूंठ मौजूद हैं? क्या पहले भी इस क्षेत्र से वन अपराध की शिकायत मिली है? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही अवैध कटाई के वास्तविक दायरे का पता चल सकेगा।
साल के पेड़ों की कटाई सिर्फ लकड़ी का नुकसान नहीं- साल का पेड़ वन क्षेत्र की महत्वपूर्ण वन संपदा में शामिल है, किसी भी जंगल में बड़े और पुराने पेड़ों की अनधिकृत कटाई का प्रभाव केवल लकड़ी के नुकसान तक सीमित नहीं रहता, इसका असर वन क्षेत्र की संरचना और स्थानीय पारिस्थितिकी पर भी पड़ सकता है,इसीलिए जंगल में पेड़ कटने की सूचना या तस्वीर सामने आने पर विभाग के लिए जरूरी है कि वह मौके का निरीक्षण करे और यदि वन अपराध पाया जाए तो नियमानुसार कार्रवाई करे, सूरजपुर जिले में इससे पहले भी अवैध लकड़ी के मामलों में कार्रवाई सामने आती रही है, जून 2026 में वन विभाग ने प्रतापपुर क्षेत्र में एक ओमनी वैन से 9 नग अवैध साल चिरान जब्त करने की जानकारी दी थी,विभाग के अनुसार वाहन चालक मौके से फरार हो गया था और भारतीय वन अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई थी,इससे स्पष्ट है कि जिले में अवैध साल लकड़ी के परिवहन पर कार्रवाई के मामले सामने आते रहे हैं,ऐसे में केतका सर्किल से सामने आई तस्वीरों की भी गंभीरता से जांच अपेक्षित है।
अब कैमरे की तस्वीर से आगे विभागीय जांच जरूरी– केतका सर्किल के जंगल से सामने आई तस्वीरों ने सवाल जरूर खड़े किए हैं,लेकिन तस्वीरें अपने आप में पूरी कहानी नहीं बतातीं, असली सवाल अब यह है कि वन विभाग इन तस्वीरों को कितनी गंभीरता से लेता है,यदि विभाग मौके पर पहुंचकर कटे पेड़ों की संख्या, लकड़ी की मात्रा,कटाई के तरीके और वहां मौजूद साक्ष्यों का पंचनामा तैयार करता है तो स्थिति काफी हद तक स्पष्ट हो सकती है, जरूरत पड़ने पर आसपास के क्षेत्र में व्यापक तलाशी, गश्त रिकॉर्ड की जांच और पूर्व शिकायतों की समीक्षा भी की जा सकती है।
जंगल की रखवाली सिर्फ कागजों में नहीं,जमीन पर भी दिखनी चाहिए-वन संपदा सरकारी रिकॉर्ड की कोई निर्जीव संपत्ति नहीं है, जंगल में खड़ा हर पेड़ पर्यावरण और आने वाली पीढि़यों से जुड़ा है। इसलिए यदि केतका सर्किल में सामने आए कटाई के निशान वास्तव में अवैध कटाई की पुष्टि करते हैं तो जिम्मेदारों तक पहुंचना और कार्रवाई करना जरूरी होगा,और यदि जांच में आरोप गलत पाए जाते हैं, तब भी विभाग को तस्वीरों और संदेह की स्थिति को स्पष्ट करना चाहिए, अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि जंगल में पेड़ किसने काटे, बल्कि यह भी है कि कटते पेड़ों की आवाज वन विभाग की निगरानी व्यवस्था तक क्यों नहीं पहुंची?
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