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जहां जांच भी होती है,कमी भी मिलती है,कमी भी मिट जाती है और फिर बहाली की तैयारी भी हो जाती है!
धान गायब हो तो चिंता मत करिए…जांच कीजिए…अगली जांच में धान भी मिल जाएगा!
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,23 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
अगर सहकारिता विभाग की कार्यप्रणाली पर कोई प्रशिक्षण संस्थान खुल जाए तो उसका पहला पाठ शायद यही होगा—‘घबराइए मत,हर कमी की दूसरी जांच होती है।’और यदि दूसरी जांच भी हो जाए,तो पहली जांच को भूल जाइए। आखिर व्यवस्था का अपना गणित है, जिले के सहकारी तंत्र में वर्षों से कुछ नाम चर्चा में रहते हैं,भैयाथान शाखा के अंतर्गत संचालित कुछ समितियां और धान खरीदी केंद्र हर खरीदी सीजन में किसी न किसी वजह से सुर्खियों में आ जाते हैं,किसान बदलते हैं,मौसम बदलता है,लेकिन चर्चा के पात्र कम ही बदलते हैं।
2025 की धान खरीदी…जहां गणित भी शर्मिंदा हो जाए-कहा जाता है कि गणित कभी झूठ नहीं बोलता,लेकिन 2025 की धान खरीदी ने शायद गणित को भी सोचने पर मजबूर कर दिया,चर्चाएं हुईं कि कहीं रिकॉर्ड में धान ज्यादा था और गोदाम में कम,फिर जांच हुई,जांच में कमी मिली,इसके बाद फिर जांच हुई,और फिर वही कमी…पता नहीं कैसे…पूरी भी हो गई,यदि यह किसी जादूगर का शो होता तो दर्शक ताली बजाते,लेकिन यह सरकारी धान खरीदी थी,इसलिए जनता ने सवाल पूछे।
धान खुद चलकर आया या जवाब अभी बाकी है?-सबसे बड़ा सवाल यह नहीं है कि कमी मिली थी या नहीं,सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पहली जांच सही थी तो बाद में स्टॉक कैसे पूरा हो गया? क्या धान रातों-रात उग आया? क्या गोदामों में कोई चमत्कार हुआ? या फिर किसी ने कम दाम में धान खरीदकर सरकारी रिकॉर्ड से हिसाब बराबर कर दिया? इन सवालों के जवाब जनता आज भी तलाश रही है।
बड़े अधिकारी क्या केवल दर्शक थे?-जब पूरा मामला चर्चा में था,तब प्रशासनिक जिम्मेदारी वाले पदों पर संभागीय आयुक्त सुनील तिवारी,प्रभारी उप आयुक्त सहकारिता अनिल कुमार बनज,जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के सीईओ श्रीकांत चंद्राकर और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के अध्यक्ष रामकिशन सिंह कार्यरत थे,सवाल यह नहीं कि वे दोषी हैं,सवाल यह है कि जब शिकायतें थीं,जांच थी और कार्रवाई भी हुई,तब उनकी निगरानी में अंतिम परिणाम क्या निकला? यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ तो जनता को पूरा रिकॉर्ड दिखाया जाए।
टीमें आईं… रिपोर्ट बनी… फिर सब सामान्य!
तहसीलदार आए,एसडीएम आए,सहकारिता विभाग की टीमें आईं,निरीक्षण हुआ,रिपोर्ट बनी,और फिर धीरे-धीरे ऐसा सन्नाटा छा गया मानो कुछ हुआ ही न हो,यदि पहली रिपोर्ट गलत थी तो उसे बनाने वालों की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए थी,यदि पहली रिपोर्ट सही थी तो दूसरी रिपोर्ट के आधार क्या थे? यही वह प्रश्न हैं जिनका उत्तर सार्वजनिक होना चाहिए।
निलंबन भी हुआ… अब बहाली भी होगी?
उस समय कुछ समिति प्रबंधकों और धान खरीदी केंद्र प्रभारियों पर कार्रवाई हुई,अब चर्चा यह है कि वही लोग फिर से आगामी धान खरीदी में जिम्मेदारी संभाल सकते हैं,यदि ऐसा होता है तो जनता पूछ रही है—क्या निलंबन केवल औपचारिकता था? यदि दोषी थे तो बहाली क्यों? यदि दोषी नहीं थे तो निलंबन क्यों?
शिवप्रसादनगर : जहां सवाल अभी खत्म नहीं हुए…
शिवप्रसादनगर धान खरीदी केंद्र को लेकर भी वर्षों से चर्चाएं होती रही हैं, स्थानीय स्तर पर अनियमितताओं के आरोप लगाए गए,कुछ लोगों ने संपत्ति खरीद को लेकर भी प्रश्न उठाए,यदि शिकायतें निराधार थीं तो उन्हें स्पष्ट रूप से खारिज क्यों नहीं किया गया? यदि शिकायतें गंभीर थीं तो उनकी जांच का परिणाम सार्वजनिक क्यों नहीं हुआ? नाम भी चर्चा में,लेकिन जवाब कौन देगा? स्थानीय चर्चाओं में साधना,हदीस और सोहराब जैसे नाम बार-बार लिए जाते रहे हैं।
बैंक अध्यक्ष की पात्रता पर भी चर्चा…
जनचर्चा में जिला सहकारी केंद्रीय बैंक अंबिकापुर के अध्यक्ष रामकिशन सिंह की पात्रता को लेकर भी सवाल उठते रहे हैं,इन चर्चाओं पर किसी सक्षम प्राधिकारी का अंतिम सार्वजनिक निर्णय उपलब्ध नहीं है, ऐसे में पारदर्शिता के हित में यह स्पष्ट होना चाहिए कि यदि शिकायतें हुई थीं तो उनका निस्तारण किस प्रकार किया गया।
और अब नई बाजी…
सोनपुर समिति में बोर्ड की शक्तियों में बदलाव के बाद फिर चर्चा शुरू हो गई है,लोग कह रहे हैं—सहकारिता विभाग में फाइलें नहीं चलतीं,शतरंज की चालें चलती हैं,यह केवल जनचर्चा है,लेकिन यदि ऐसी धारणा बन रही है तो उसे दूर करना भी विभाग की जिम्मेदारी है।
अब जनता व किसान का सवाल….
जांच हुई तो रिपोर्ट कहां है?
कमी मिली थी तो दोषी कौन?
दोषी नहीं थे तो कार्रवाई क्यों?

कार्रवाई हुई थी तो बहाली किस आधार पर?
और यदि सब कुछ ठीक था,तो हर साल वही केंद्र और वही नाम चर्चा में क्यों आते हैं?
दैनिक घटती-घटना की मांग…
इन सभी प्रश्नों का समाधान केवल एक स्वतंत्र,निष्पक्ष और दस्तावेज़ आधारित जांच से ही संभव है,यदि शिकायतें निराधार हैं तो संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को सार्वजनिक रूप से क्लीन चिट मिले, यदि शिकायतों में तथ्य हैं,तो जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित न रहकर पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की भी जांच होनी चाहिए।


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