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- जामपारा समिति की फाइल खुली,प्रभाकर सिंह पर एफआईआर
- 13 पैक्स और 39 खातों की जांच में सामने आए संदिग्ध लेनदेन के संकेत,कृषि विभाग की रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई,हाईकोर्ट के आदेश से पहले जांच की रफ्तार पर लगी थी रोक…
- जामपारा समिति में फर्जी धान खरीदी का मामला, प्रभाकर सिंह सहित 11 पर एफआईआर, दस्तावेजों में वित्तीय लेनदेन और किसान पंजीयन पर गंभीर सवाल…
- जांच प्रतिवेदन के आधार पर बैकुण्ठपुर थाने में दर्ज हुआ अपराध,समिति के प्रबंधन से लेकर बैंक खातों और भुगतान प्रक्रिया तक उठे सवाल,हाईकोर्ट के आदेश के बाद आगे की कार्रवाई प्रभावित
- फर्जी पंजीयन,संदिग्ध खाते और करोड़ों का लेनदेन…जामपारा समिति पर जांच का शिकंजा
- जामपारा समिति में धान खरीदी का ‘खेल’! एफआईआर के बाद 11 और लोग जांच के दायरे में
- 20 साल की धान खरीदी पर उठे सवाल, फर्जी पंजीयन के मामले में प्रभाकर सिंह पर एफआईआर
-रवि सिंह-
बैकुण्ठपुर/कोरिया,23 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित जामपारा में धान खरीदी,किसान पंजीयन और समिति के वित्तीय संचालन को लेकर सामने आया विवाद अब आपराधिक प्रकरण तक पहुंच चुका है,उपलब्ध शासकीय दस्तावेजों के अनुसार जांच प्रतिवेदन के आधार पर समिति के तत्कालीन प्रबंधक प्रभाकर सिंह सहित 11 व्यक्तियों के विरुद्ध अपराध दर्ज कराया गया है,बैकुण्ठपुर थाने में 15 नवंबर 2024 को प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज किए जाने का उल्लेख विभागीय पत्र में है। मामला केवल धान खरीदी में कथित अनियमितता तक सीमित नहीं है,जांच से जुड़े दस्तावेजों में फर्जी किसान पंजीयन,समिति के खातों से होने वाले वित्तीय लेनदेन,कर्मचारियों के प्रभार में बदलाव, वेतन भुगतान और समिति की राशि के कथित दुरुपयोग जैसे कई बिंदु सामने आए हैं,एक अन्य दस्तावेज में भारतीय दंड संहिता की धारा 467, 468 और 471 के तहत अपराध घटित होना पाए जाने का उल्लेख भी किया गया है,हालांकि एफआईआर में नाम आने मात्र से किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता,आरोपों की अंतिम पुष्टि न्यायिक प्रक्रिया में ही होगी,लेकिन सरकारी दस्तावेजों में दर्ज कार्रवाई यह जरूर बताती है कि जामपारा समिति का मामला विभागीय शिकायत से आगे बढ़कर पुलिस जांच के स्तर तक पहुंच चुका है।
जांच रिपोर्ट के बाद एफआईआर तक पहुंचा मामला
कलेक्टर कोरिया को भेजे गए विभागीय पत्र में आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित जामपारा में धान खरीदी से संबंधित जांच का उल्लेख है,पत्र के अनुसार तत्कालीन समिति प्रबंधक प्रभाकर सिंह तथा जांच प्रतिवेदन में उल्लेखित कुल 11 व्यक्तियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई के लिए आपराधिक प्रकरण दर्ज कराने के निर्देश दिए गए थे,इसके बाद संबंधित निर्देशों के पालन में 15 नवंबर 2024 को थाना बैकुण्ठपुर में प्रभाकर सिंह एवं अन्य 11 व्यक्तियों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज किए जाने की जानकारी विभाग ने दी, यहां एक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि विभागीय स्तर पर पहले जांच हुई,उसके बाद मामला पुलिस तक पहुंचा,यानी कार्रवाई केवल किसी मौखिक शिकायत के आधार पर नहीं,बल्कि जांच प्रतिवेदन के संदर्भ में की गई बताई गई है, अब पुलिस के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि जिन आरोपों के आधार पर एफआईआर दर्ज हुई, उनमें प्रत्येक आरोपी की भूमिका क्या थी और कथित अनियमितता से उसका संबंध किस स्तर पर था।
समिति की राशि के इस्तेमाल पर भी उठे सवाल
जामपारा समिति के तत्कालीन प्रबंधक से संबंधित शिकायत में यह आरोप भी लगाया गया कि वित्तीय प्रभार से अलग किए जाने के बाद भी वेतन भुगतान किया गया, शिकायतकर्ता ने इसे समिति की राशि के दुरुपयोग से जोड़ते हुए जांच और राशि की वसूली की मांग की, दस्तावेज के अनुसार प्रभाकर सिंह को 8 जनवरी 2024 को समिति के वित्तीय प्रभार से अलग किया गया था, इसके बाद उन्हें धान खरीदी कार्य से हटाकर जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की बैकुण्ठपुर शाखा से संबद्ध किए जाने का उल्लेख मिलता है,इसके बाद भी समिति के खाते से वेतन भुगतान किए जाने का आरोप सामने आया,इस आरोप की वास्तविकता जांच के बाद ही स्पष्ट होगी, इसके लिए वेतन बिल,भुगतान आदेश,बैंक स्टेटमेंट,सेवा संबंधी आदेश और संबंधित अवधि के उपस्थिति रिकॉर्ड का मिलान आवश्यक होगा।
20 साल की व्यवस्था में निगरानी किसकी थी?
इस पूरे प्रकरण का सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल शायद यही है,यदि शिकायतों के अनुसार प्रभाकर सिंह लंबे समय तक समिति के प्रबंधकीय कामकाज और धान खरीदी से जुड़े रहे,तो इतने लंबे समय में समिति का ऑडिट कैसे हुआ? धान खरीदी के रिकॉर्ड का परीक्षण किसने किया? किसान पंजीयन की जांच किस स्तर पर हुई? समिति के बैंक खातों की निगरानी किसने की? वर्षवार स्टॉक और भुगतान का मिलान किसने किया? और यदि अब जांच में गड़बड़ी सामने आती है तो यह भी देखा जाना चाहिए कि संबंधित समय में निरीक्षण करने वाले अधिकारियों की रिपोर्ट में क्या दर्ज था,क्योंकि किसी समिति में यदि वर्षों तक एक ही तरह की कथित अनियमितता चलती रही तो केवल अंतिम स्तर के कर्मचारी को जिम्मेदार ठहराने से पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी,निगरानी तंत्र की भूमिका भी जांच का हिस्सा बननी चाहिए।
प्रभार बदला,लेकिन विवाद यहीं खत्म नहीं हुआ
8 जनवरी 2024 के आदेश में प्रभाकर सिंह को वित्तीय प्रभार से अलग किए जाने के साथ समिति के प्रबंधकीय कामकाज की जिम्मेदारी दूसरे व्यक्ति को दिए जाने का उल्लेख है,बाद में 16 नवंबर 2024 के संशोधित आदेश में समिति से जुड़े कर्मचारियों के कार्यस्थल और जिम्मेदारियों में बदलाव किया गया। दस्तावेज में प्रभाकर सिंह को एफआईआर दर्ज होने के कारण धान खरीदी प्रभारी के कार्य से अलग करने तथा अन्य कर्मचारियों को अलग-अलग समितियों या खरीदी केंद्रों में जिम्मेदारी देने की व्यवस्था दर्ज है,इससे स्पष्ट है कि विभाग ने विवाद सामने आने के बाद समिति के संचालन और कर्मचारियों के प्रभार में बदलाव किया,लेकिन यह बदलाव अपने आप में पूर्व की कथित अनियमितताओं का निष्कर्ष नहीं है। उन आरोपों की पुष्टि जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगी।
समिति के बैंक खातों में लाखों का लेनदेन,रिकॉर्ड संधारण पर भी सवाल…
सहायक पंजीयक सहकारी संस्थाएं,बैकुण्ठपुर से संबंधित एक आदेश में समिति के बैंक खातों के लेनदेन का उल्लेख किया गया है,इसमें बचत खातों,शेयरधारिता खातों,कैश क्रेडिट ऋण खातों तथा अन्य बैंक खातों में जमा और आहरण की रकम दर्ज है,दस्तावेज में समिति के रिकॉर्ड और ऋण संबंधी दस्तावेजों के संधारण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से नहीं रखे जाने से सदस्यों को ऋण वितरण,ऋण अदायगी और समिति द्वारा किए गए खर्च की वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होने की बात कही गई है,ऐसी स्थिति में जांच के लिए बैंक रिकॉर्ड महत्वपूर्ण हो जाता है,यदि किसी खाते से बड़ी रकम निकली है तो यह देखना होगा कि राशि किस उद्देश्य से निकाली गई,किसे भुगतान किया गया और संबंधित भुगतान का लेखा समिति के रिकॉर्ड में दर्ज है या नहीं।
प्रभाकर सिंह को लेकर पुलिस रिकॉर्ड में भी आपराधिक गतिविधियों का उल्लेख
जामपारा समिति से अलग एक पुलिस दस्तावेज में प्रभाकर सिंह के विरुद्ध पूर्व में दर्ज आपराधिक मामलों का उल्लेख किया गया है,पुलिस अधीक्षक कोरिया द्वारा जारी आदेश में उन्हें वर्ष 2004 से लगातार आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त बताए जाने का उल्लेख है,दस्तावेज में मारपीट,जान से मारने की धमकी तथा अन्य मामलों का जिक्र करते हुए उनके आचरण में सुधार नहीं होने की बात दर्ज की गई है,इसी आधार पर पुलिस रिकॉर्ड में उनके विरुद्ध निगरानी संबंधी कार्रवाई का उल्लेख है,यह दस्तावेज जामपारा समिति के धान खरीदी प्रकरण का प्रत्यक्ष साक्ष्य नहीं है,इसलिए दोनों मामलों को एक ही घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं होगा,लेकिन यह जरूर स्पष्ट करता है कि पुलिस रिकॉर्ड में प्रभाकर सिंह के विरुद्ध पहले से आपराधिक मामले दर्ज होने का उल्लेख मौजूद था।
सबसे बड़ा सवाल…इतने समय तक निगरानी किसकी थी?
इस मामले में एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक सवाल भी सामने आता है, यदि समिति के प्रबंधन और धान खरीदी व्यवस्था में लंबे समय तक एक ही व्यक्ति की महत्वपूर्ण भूमिका रही और बाद में फर्जी किसान पंजीयन जैसे गंभीर आरोप सामने आए,तो संबंधित अवधि में समिति का नियमित ऑडिट और निरीक्षण किस स्तर तक हुआ? समिति के रिकॉर्ड की जांच किसने की? किसान पंजीयन का सत्यापन किस स्तर पर हुआ? धान खरीदी के बाद स्टॉक का मिलान किसने किया? समिति के बैंक खातों की निगरानी कैसे हुई? यदि रिकॉर्ड में कोई अनियमितता थी तो वह पहले क्यों नहीं पकड़ी गई? इन सवालों का जवाब केवल प्रभाकर सिंह या एफआईआर में नामित लोगों की जांच से नहीं मिलेगा,इसके लिए उस पूरी प्रशासनिक और सहकारी निगरानी व्यवस्था को भी देखना होगा जिसके तहत समिति काम कर रही थी।
अब जांच के लिए इन रिकॉर्ड का मिलान जरूरी
जामपारा प्रकरण की वास्तविक तस्वीर सामने लाने के लिए जांच एजेंसी को कई दस्तावेजों का आपस में मिलान करना होगा,सबसे पहले किसान पंजीयन रिकॉर्ड और संबंधित किसानों की वास्तविक भूमि का सत्यापन जरूरी होगा, इसके बाद पंजीकृत रकबे और खरीदी गई धान की मात्रा का मिलान होना चाहिए,इसके साथ ही समिति के धान खरीदी रजिस्टर,स्टॉक रजिस्टर,परिवहन रिकॉर्ड और भुगतान विवरण की भी जांच आवश्यक होगी,वित्तीय हिस्से में समिति के बैंक खातों से हुए लेनदेन,नकद आहरण, बैंक ट्रांसफर,वेतन भुगतान और अन्य खर्चों का परीक्षण महत्वपूर्ण होगा,यदि इन रिकॉर्डों में कोई विसंगति मिलती है तो उसके आधार पर संबंधित व्यक्ति की भूमिका तय की जा सकती है।
सिर्फ एफआईआर नहीं,पूरी व्यवस्था की जांच जरूरी-जामपारा समिति का मामला अब पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज है,लेकिन इस प्रकरण की गंभीरता को देखते हुए जांच केवल एफआईआर में नामित व्यक्तियों तक सीमित रहने के बजाय पूरी प्रक्रिया की पड़ताल करना जरूरी है, यदि फर्जी किसान पंजीयन हुआ तो उसे स्वीकृत किसने किया? यदि धान खरीदी रिकॉर्ड में गड़बड़ी हुई तो सत्यापन किस स्तर पर हुआ? यदि समिति के खाते से राशि का गलत इस्तेमाल हुआ तो भुगतान किसकी अनुमति से हुआ? यदि वेतन भुगतान नियमों के विपरीत हुआ तो उसे स्वीकृत किसने किया? और यदि वर्षों तक समिति का संचालन इसी व्यवस्था में चलता रहा तो निरीक्षण और ऑडिट में यह सामने क्यों नहीं आया? इन सवालों के जवाब मिलने पर ही जामपारा प्रकरण की पूरी तस्वीर सामने आएगी।
फर्जी किसान पंजीयन बना जांच का सबसे अहम बिंदू
जामपारा समिति से जुड़े दस्तावेजों में फर्जी किसान पंजीयन का मुद्दा प्रमुखता से सामने आता है, धान खरीदी व्यवस्था में किसान का पंजीयन पूरी प्रक्रिया का आधार होता है,किसान की भूमि, पंजीकृत रकबा और खरीदी की पात्रता के आधार पर धान उपार्जन की प्रक्रिया आगे बढ़ती है,ऐसे में यदि किसी अपात्र व्यक्ति का किसान के रूप में पंजीयन हुआ या वास्तविक किसान की जानकारी के विपरीत खरीदी दर्ज की गई, तो इसका सीधा असर सरकारी धान खरीदी व्यवस्था पर पड़ता है,इसीलिए अब जांच में यह देखा जाना आवश्यक है कि जिन किसानों के नाम पर खरीदी दर्ज की गई, वे वास्तव में संबंधित भूमि के धारक थे या नहीं, उनके नाम पर कितना रकबा दर्ज था,उस आधार पर कितनी मात्रा में धान खरीदी की पात्रता बनती थी और वास्तव में कितनी मात्रा दर्ज की गई, यदि पंजीयन और खरीदी रिकॉर्ड में अंतर मिलता है तो यह मामले की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है।
13 पैक्स और 39 खातों से जुड़ी जानकारी भी जांच में…
एक अन्य शासकीय पत्र में समिति से संबंधित जांच के दौरान खातों और वित्तीय लेनदेन का उल्लेख किया गया है, दस्तावेज में कई खातों के संचालन तथा उनसे संबंधित राशि के लेनदेन को लेकर सवाल दर्ज हैं,जांच में यह भी उल्लेख किया गया है कि कुछ व्यक्तियों के समिति से जुड़े होने और उनके खातों में राशि के पहुंचने की स्थिति का परीक्षण किया गया,दस्तावेज में यह सवाल उठता है कि यदि कोई व्यक्ति समिति का सदस्य नहीं था तो उसके पक्ष में राशि का भुगतान किस आधार पर हुआ,यही बिंदु अब पुलिस जांच में महत्वपूर्ण हो सकता है,संबंधित खातों के बैंक स्टेटमेंट,भुगतान वाउचर,समिति की बैठक की कार्यवाही और राशि प्राप्त करने वाले व्यक्तियों के बयान से यह स्पष्ट किया जा सकता है कि भुगतान वैधानिक था या नहीं।
दस्तावेजों की जांच से तय होगी आरोपों की सच्चाई
फिलहाल उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर इतना स्पष्ट है कि जामपारा समिति से जुड़े मामले में विभागीय जांच हुई,उसके बाद प्रभाकर सिंह सहित 11 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई और वित्तीय तथा प्रशासनिक स्तर पर भी कई सवाल उठाए गए,लेकिन इन आरोपों को अंतिम सत्य मानना उचित नहीं होगा,मामले में पुलिस जांच, न्यायालयीन प्रक्रिया और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर ही वास्तविक जिम्मेदारी तय होगी, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच निष्पक्ष और दस्तावेज आधारित हो। किसान पंजीयन से लेकर बैंक खाते तक और धान खरीदी से लेकर भुगतान तक पूरी श्रृंखला की पड़ताल की जाए,जामपारा समिति की कहानी का असली सच एफआईआर में दर्ज आरोपों से नहीं,बल्कि उन दस्तावेजों के मिलान से सामने आएगा जिनके आधार पर किसान पंजीकृत हुए, धान खरीदा गया और समिति की राशि का लेनदेन हुआ,अब सवाल यह नहीं कि शिकायत हुई या एफआईआर दर्ज हुई। असली सवाल यह है कि फर्जी पंजीयन यदि हुआ तो किसने किया,धान खरीदी किस आधार पर हुई, राशि कहां गई और पूरी प्रक्रिया की निगरानी करने वाली व्यवस्था ने इसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा? इन सवालों के जवाब ही तय करेंगे कि जामपारा समिति में मामला केवल प्रशासनिक लापरवाही का था या इसके पीछे किसी बड़े वित्तीय और दस्तावेजी खेल की वास्तविकता भी सामने आती है।
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