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संपादकीय@ बस्तर : बंदूक की गूंज से विकास की दस्तक तक

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क्या अब स्थायी शांति का समय है?
छत्तीसगढ़ का बस्तर कभी देश में नक्सल हिंसा का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता था। दशकों तक यहां की पहचान घने जंगलों,आदिवासी संस्कृति और प्राकृतिक सौंदर्य से अधिक नक्सली घटनाओं, सुरक्षा अभियानों और हिंसा से जुड़ी रही। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में परिस्थितियां तेजी से बदलती दिखाई दे रही हैं। सुरक्षा बलों की लगातार कार्रवाई, नक्सलियों के खिलाफ सफल अभियान, आत्मसमर्पण की बढ़ती संख्या और दूरस्थ क्षेत्रों तक प्रशासन की पहुंच ने यह संकेत दिया है कि बस्तर एक नए दौर की ओर बढ़ रहा है। हालांकि,यह भी उतना ही सच है कि केवल सुरक्षा अभियानों की सफलता को अंतिम जीत नहीं माना जा सकता। स्थायी शांति तब स्थापित होगी,जब सुरक्षा के साथ विकास,विश्वास और सामाजिक न्याय भी समान गति से आगे बढ़ेंगे।
पिछले वर्षों में सुरक्षा बलों ने कई बड़े नक्सली नेताओं को गिरफ्तार किया, अनेक मुठभेड़ों में शीर्ष कैडर ढेर हुए और बड़ी संख्या में नक्सलियों ने मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया। सरकार का दावा है कि नक्सल संगठनों का प्रभाव क्षेत्र लगातार सिमट रहा है। जिन इलाकों में कभी प्रशासनिक अधिकारी जाने से बचते थे,वहां अब पुलिस कैंप स्थापित हो रहे हैं, सड़कें बन रही हैं और सरकारी योजनाओं का क्रियान्वयन शुरू हुआ है। यह बदलाव निश्चित रूप से सकारात्मक है और लंबे समय से हिंसा झेल रहे बस्तर के लिए उम्मीद की किरण भी है।
लेकिन यह भी याद रखना होगा कि नक्सलवाद केवल कानून-व्यवस्था की समस्या नहीं था। इसके पीछे वर्षों का पिछड़ापन, विकास का अभाव, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी,रोजगार के सीमित अवसर,संचार व्यवस्था की कमजोरी और शासन-प्रशासन से दूरी जैसे अनेक कारण रहे हैं। यदि इन मूल कारणों का समाधान नहीं किया गया तो केवल सुरक्षा बलों की मौजूदगी से स्थायी शांति स्थापित करना कठिन होगा।
आज बस्तर के गांवों में सड़कें पहुंच रही हैं। मोबाइल नेटवर्क का विस्तार हुआ है। बिजली,पेयजल, स्कूल,छात्रावास और स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बढ़ रही है। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना,जल जीवन मिशन,आयुष्मान भारत,वन धन विकास केंद्र,पीएम जनमन योजना और अन्य सरकारी योजनाओं का लाभ भी धीरे-धीरे दूरस्थ क्षेत्रों तक पहुंच रहा है। फिर भी यह स्वीकार करना होगा कि कई गांव आज भी बुनियादी सुविधाओं से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। जहां विकास आधा-अधूरा होगा,वहां असंतोष की संभावना बनी रहेगी।
बस्तर के भविष्य की सबसे बड़ी कुंजी वहां का युवा है। यदि युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,तकनीकी प्रशिक्षण,प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी,खेल सुविधाएं और स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होंगे तो हिंसा की विचारधारा स्वतः कमजोर पड़ेगी। आज भी अनेक युवा सेना,पुलिस,अर्धसैनिक बलों और अन्य सरकारी सेवाओं में चयनित होकर नई पहचान बना रहे हैं। यह सकारात्मक संकेत है,लेकिन इसे और व्यापक बनाने की आवश्यकता है। वन उपज आधारित उद्योग, खाद्य प्रसंस्करण,हस्तशिल्प,बांस उद्योग,लघु वनोपज,पर्यटन और कृषि आधारित उद्यमों में बड़े निवेश से स्थानीय रोजगार के नए अवसर तैयार किए जा सकते हैं।
बस्तर केवल संघर्ष की भूमि नहीं है। यह भारत की समृद्ध आदिवासी संस्कृति,लोककला,हस्तशिल्प,जैव विविधता और प्राकृतिक पर्यटन का अनमोल केंद्र है। चित्रकोट जलप्रपात,तीरथगढ़,कांगेर घाटी राष्ट्रीय उद्यान,कुटुमसर गुफाएं, दंतेश्वरी मंदिर और यहां की पारंपरिक संस्कृति विश्व स्तर पर पहचान बनाने की क्षमता रखते हैं। यदि पर्यटन को योजनाबद्ध तरीके से विकसित किया जाए, स्थानीय समुदायों को उसका लाभ मिले और आधारभूत सुविधाओं का विस्तार हो,तो बस्तर आर्थिक रूप से भी आत्मनिर्भर बन सकता है।
हालांकि विकास के नाम पर स्थानीय समाज की भावनाओं की अनदेखी भी नहीं होनी चाहिए। आदिवासी समुदाय की संस्कृति, परंपराएं,जल-जंगल-जमीन से जुड़ी उनकी जीवनशैली और संवैधानिक अधिकारों का सम्मान करना उतना ही आवश्यक है,जितना सड़क और पुल बनाना। विकास तभी सफल माना जाएगा, जब स्थानीय लोग स्वयं को उसका भागीदार महसूस करें, न कि केवल दर्शक।
सरकार के सामने एक और चुनौती है—सुरक्षा अभियानों में मिली सफलता को प्रशासनिक संवेदनशीलता में बदलना। गांवों में नियमित स्वास्थ्य सेवाएं, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा,पारदर्शी प्रशासन,समय पर राशन,वन अधिकारों का प्रभावी क्रियान्वयन और सरकारी योजनाओं का लाभ बिना भेदभाव के पहुंचे,तभी लोगों का भरोसा मजबूत होगा। विश्वास किसी भी सुरक्षा अभियान की सबसे बड़ी उपलब्धि होता है।
सुरक्षा बलों की भूमिका भी समय के साथ बदली है। अब केवल अभियान चलाना ही उनका उद्देश्य नहीं है। कई स्थानों पर पुलिस और केंद्रीय सुरक्षा बल चिकित्सा शिविर,खेल प्रतियोगिताएं,करियर मार्गदर्शन,महिला जागरूकता अभियान और शिक्षा सहायता जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के साथ सकारात्मक संबंध स्थापित कर रहे हैं। यह बदलाव स्वागतयोग्य है,क्योंकि लोकतंत्र में जनता का विश्वास जीतना किसी भी सैन्य सफलता से अधिक महत्वपूर्ण होता है।
अब बस्तर को केवल नक्सल मानचित्र पर नहीं, बल्कि विकास के मानचित्र पर स्थापित करने का समय है। आने वाले वर्षों में यदि सरकार सुरक्षा, शिक्षा,स्वास्थ्य,रोजगार,पर्यटन,उद्योग और जनविश्वास—इन सभी क्षेत्रों में समान गति से कार्य करती है,तो बस्तर देश के सामने परिवर्तन का एक सफल मॉडल बन सकता है।
नक्सलवाद के विरुद्ध सबसे बड़ी जीत किसी मुठभेड़ में नहीं, बल्कि उस दिन होगी जब बस्तर का हर बच्चा स्कूल जाएगा,हर गांव सड़क और इंटरनेट से जुड़ेगा,हर युवा सम्मानजनक रोजगार पाएगा और हर परिवार बिना भय के अपना भविष्य तय कर सकेगा। बंदूकें शांति का रास्ता खोल सकती हैं,लेकिन उस रास्ते को स्थायी मंजिल तक केवल विकास,न्याय और विश्वास ही पहुंचा सकते हैं।


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