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अम्बिकापुर@ 100 दिन जेल में रहा कर्मचारी…अब सवालों के घेरे में पूरी कार्रवाई

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1.07 करोड़ गबन मामले में जांच रिपोर्ट ही नहीं मिली,पीएमओ और आईजी के दखल से खुलने लगीं परतें
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,16 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
पशुपालन विभाग के बहुचर्चित 1.07 करोड़ रुपए के कथित गबन मामले ने अब नया मोड़ ले लिया है। जिस विभागीय जांच रिपोर्ट के आधार पर सहायक ग्रेड-दो प्रदीप कुमार अंबष्ट के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था, वही जांच रिपोर्ट पुलिस को कभी मिली ही नहीं। इतना ही नहीं, पुलिस ने न्यायालय में पेश चालान में स्पष्ट उल्लेख किया कि कथित गबन की विभागीय जांच होना ही नहीं पाई गई। इस खुलासे के बाद पूरे मामले में विभागीय कार्रवाई, पुलिस विवेचना और गिरफ्तारी की प्रक्रिया सवालों के घेरे में आ गई है। मामला 25 फरवरी 2026 का है, जब प्रभारी उप संचालक पशुपालन डॉ. आर.पी. शुक्ला ने कोतवाली थाने में आवेदन देकर पांच सदस्यीय जांच समिति की रिपोर्ट के आधार पर प्रदीप कुमार अंबष्ट पर 1.07 करोड़ रुपए के गबन का आरोप लगाया। पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर 2 मार्च को उन्हें गिरफ्तार कर लिया। न्यायालय के आदेश पर उन्हें जेल भेज दिया गया, जहां उन्होंने करीब 100 दिन बिताए। बाद में उन्हें जमानत मिली। लेकिन 29 मई को जब पुलिस ने न्यायालय में चालान पेश किया तो एक चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। चालान के साथ वह विभागीय जांच प्रतिवेदन संलग्न ही नहीं था,जिसके आधार पर अपराध दर्ज किया गया था। पुलिस ने अपने चालान में यह भी उल्लेख किया कि कथित गबन की जांच किया जाना नहीं पाया गया। विवेचना के दौरान पुलिस ने प्रभारी उप संचालक को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 94 के तहत नोटिस जारी कर जांच रिपोर्ट और संबंधित दस्तावेज मांगे,लेकिन विभाग की ओर से कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराया गया। पुलिस ने जांच समिति के सदस्यों के बयान भी दर्ज किए। सदस्यों ने बताया कि उन्हें आवश्यक अभिलेख उपलब्ध नहीं कराए गए थे,इसलिए उन्होंने कोई जांच नहीं की। इस बीच यह भी सामने आया कि प्रदीप कुमार अंबष्ट ने एफआईआर दर्ज होने से करीब ढाई महीने पहले,15 दिसंबर 2025 को विभाग के सचिव,संचालक, संभागायुक्त,कलेक्टर और पुलिस अधीक्षक को लिखित शिकायत देकर उन्हें झूठे मामले में फंसाए जाने की आशंका जताई थी। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि कार्यालयीन समय में सभी अभिलेख देखने के लिए उपलब्ध हैं, लेकिन नियमों के तहत कैशबुक कार्यालय से बाहर नहीं ले जाई जा सकती। प्रकरण में एक और सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रभारी उप संचालक ने 10 अक्टूबर 2025 को लेखा शाखा का प्रभार अपने पास ले लिया था। इसके बावजूद करीब चार महीने बाद एफआईआर दर्ज कराई गई। इस अवधि में यदि गबन के आरोप सही थे तो विभागीय जांच पूरी कर आवश्यक दस्तावेज जुटाए जा सकते थे,लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मामला अब प्रधानमंत्री कार्यालय तक पहुंच गया है। प्रदीप कुमार के स्वजन ने पीएमओ में शिकायत कर पूरे प्रकरण को सुनियोजित साजिश बताया। शिकायत पर पीएमओ ने सरगुजा कलेक्टर को जांच के निर्देश दिए हैं। वहीं सरगुजा रेंज के पुलिस महानिरीक्षक दीपक कुमार झा ने भी पुलिस अधीक्षक से पूछा है कि बिना विभागीय जांच रिपोर्ट और ठोस दस्तावेजों के अपराध दर्ज कर शासकीय कर्मचारी की तत्काल गिरफ्तारी क्यों की गई। उन्होंने विवेचना अधिकारी की भूमिका की भी जांच कराने के निर्देश दिए हैं। अब पीएमओ और आईजी के हस्तक्षेप के बाद पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की उम्मीद बढ़ गई है। यह मामला केवल कथित गबन तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि बिना पर्याप्त दस्तावेज और जांच के किसी शासकीय कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई किए जाने की प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।


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