
- सोनहत वन विभाग के ‘जल संरक्षण’ पर करोड़ों के खेल का आरोप
- रातों-रात मशीनों से खोदे गड्ढे,तालाब के नाम पर सरकारी राशि खर्च! सोनहत वन विभाग पर गंभीर सवाल
- तालाब या खानापूर्ति? सोनहत वन विभाग के निर्माण कार्यों में भ्रष्टाचार के आरोप, भौतिक सत्यापन की मांग…
- 15 जून के बाद भी चलता रहा मिट्टी का काम! सोनहत वन विभाग परनियमों की अनदेखी और करोड़ों के फर्जीवाड़े का आरोप…
- मजदूरों का हक छीना, मशीनों से कराया काम! सोनहत वन विभाग के तालाब निर्माण पर उठे बड़े सवाल…
- ’जल संरक्षण’ के नाम पर खेल? कागजों में तालाब, मौके पर सिर्फ गड्ढे; सोनहत वन विभाग जांच के घेरे में…
- सोनहत वन विभाग में तालाब निर्माण घोटाले की आशंका, ग्रामीण बोले—जांच हुई तो खुलेगी करोड़ों की पोल…
- तालाब कम, भ्रष्टाचार ज्यादा! वन विभाग के निर्माण कार्यों पर उठे सवाल, उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज
- सरकारी पैसे से ‘कागजी तालाब’! सोनहत वन विभाग पर नियमों की धज्जियां उड़ाने और मशीनों से काम कराने का आरोप…
- सोनहत में ‘तालाब कांड’ का आरोपः रात में चली जेसीबी,दिन में तैयार हुई फाइलें,अब भौतिक सत्यापन की मांग…
राजन पाण्डेय
सोनहत/कोरिया,16 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया जिले के सोनहत वन परिक्षेत्र में वन विभाग द्वारा कराए गए कथित तालाब निर्माण कार्य अब गंभीर विवादों में घिरते नजर आ रहे हैं,जल संरक्षण,वन्यजीवों के लिए पेयजल उपलब्ध कराने और पर्यावरण संरक्षण जैसे महत्वपूर्ण उद्देश्यों के नाम पर लाखों रुपये खर्च किए जाने का दावा किया गया है,लेकिन स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि धरातल पर वास्तविकता बिल्कुल अलग है,उनका कहना है कि जहां कागजों में तालाब तैयार दिखाए गए हैं,वहां मौके पर केवल उथले गड्ढे नजर आ रहे हैं,यदि पूरे मामले का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाए तो करोड़ों रुपये की योजनाओं में गंभीर अनियमितताएं सामने आ सकती हैं। सबसे बड़ा आरोप यह है कि विभाग ने मजदूरों से कार्य कराने के बजाय रात के अंधेरे में जेसीबी और ट्रैक्टर लगाकर तेजी से मिट्टी खुदवाई,ताकि बरसात शुरू होने से पहले निर्माण कार्य पूर्ण दिखाकर भुगतान की प्रक्रिया पूरी की जा सके। ग्रामीणों का कहना है कि यदि समय पर अच्छी बारिश हो जाती तो पानी भर जाने के कारण निर्माण की वास्तविक स्थिति कभी सामने ही नहीं आती,लेकिन इस बार अपेक्षित वर्षा नहीं होने से कथित तालाबों की वास्तविक तस्वीर उजागर हो गई।
तालाब कम,खानापूर्ति ज्यादा…
स्थानीय लोगों का कहना है कि सरकारी मापदंडों के अनुसार तालाब निर्माण में निश्चित गहराई, चौड़ाई,मजबूत पाल (मेड़),जल रोकने की व्यवस्था और तकनीकी मानकों का पालन अनिवार्य होता है,लेकिन जिन स्थानों पर तालाब बनाए जाने का दावा किया गया है,वहां न पर्याप्त गहराई दिखाई देती है, न मजबूत पाल और न ही ऐसा कोई ढांचा जिससे लंबे समय तक पानी का संरक्षण हो सके,ग्रामीणों का आरोप है कि कई स्थानों पर केवल मिट्टी हटाकर फोटो खिंचवा लिए गए और बाद में कागजों में इन्हें पूर्ण निर्माण दर्शा दिया गया,उनका कहना है कि यदि इन तथाकथित तालाबों का तकनीकी निरीक्षण कराया जाए तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि निर्माण निर्धारित मानकों के अनुरूप हुआ भी है या नहीं।
क्या मजदूरों का रोजगार छीनने के लिए चली मशीनें?
पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल रोजगार को लेकर उठ रहे हैं,आरोप है कि जिस कार्य को स्थानीय मजदूरों से कराया जा सकता था, उसे भारी मशीनों से कराया गया,ग्रामीणों का कहना है कि सोनहत क्षेत्र आदिवासी एवं ग्रामीण बाहुल्य इलाका है,जहां बड़ी संख्या में लोग मजदूरी पर निर्भर हैं,ऐसे समय में यदि विभाग श्रम आधारित कार्य कराता तो दर्जनों परिवारों को रोजगार मिलता,लेकिन इसके विपरीत जेसीबी और ट्रैक्टर लगाकर कुछ ही दिनों में कार्य पूरा दिखा दिया गया,स्थानीय लोगों का आरोप है कि मशीनों के उपयोग के पीछे केवल तेजी नहीं बल्कि भुगतान और कमीशन से जुड़ा खेल भी हो सकता है,हालांकि इन आरोपों की पुष्टि जांच के बाद ही संभव होगी।
वन्यजीवों के लिए बने तालाब या पहली बारिश में बह जाने वाले गड्ढे?-वन विभाग का दावा रहता है कि ऐसे तालाब वन्यजीवों के लिए पेयजल उपलब्ध कराने तथा जल संरक्षण के उद्देश्य से बनाए जाते हैं, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि वर्तमान स्थिति में बने ढांचे न तो वन्यजीवों की प्यास बुझा पाएंगे और न ही जल संरक्षण का उद्देश्य पूरा कर पाएंगे, उनका कहना है कि बिना मजबूत पाल और पर्याप्त गहराई वाले ये गड्ढे पहली तेज बारिश में ही क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
नए रेंजर के कार्यकाल पर भी सवाल
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि नए रेंजर की नियुक्ति के बाद लोगों को उम्मीद थी कि वन विभाग की कार्यप्रणाली में सुधार होगा,लेकिन अब उन्हीं के कार्यकाल में इस प्रकार के आरोप सामने आने से लोगों में निराशा है,ग्रामीणों का आरोप है कि अधीनस्थ कर्मचारियों के हौसले इतने बढ़ गए हैं कि वे किसी भी शिकायत को गंभीरता से नहीं लेते। हालांकि इन आरोपों पर विभाग की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है।
अब जांच ही बताएगी सच्चाई…
वन विभाग पर लगे ये आरोप गंभीर प्रकृति के हैं,यदि इनमें तथ्य हैं तो यह केवल निर्माण गुणवत्ता का मामला नहीं बल्कि सरकारी धन के उपयोग,तकनीकी स्वीकृति,कार्य निष्पादन, पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा विषय बन सकता है,अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कथित तालाबों का स्वतंत्र तकनीकी एवं भौतिक सत्यापन कराया जाएगा? क्या प्रत्येक निर्माण की स्वीकृत राशि और वास्तविक कार्य का मिलान होगा? क्या मशीनों के उपयोग और मजदूरों को काम न मिलने की जांच होगी? क्या 15 जून के बाद मिट्टी कार्य होने के आरोपों की जांच की जाएगी? यदि अनियमितता मिलती है तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों पर कार्रवाई होगी? इन सभी सवालों के जवाब अब जांच के बाद ही सामने आएंगे, फिलहाल ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों की मांग है कि पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति जनता के सामने लाई जाए, ताकि यदि कहीं सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है तो दोषियों को जवाबदेह ठहराया जा सके।
15 जून के बाद भी जारी रहा मिट्टी का कार्य?
ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया है कि शासन के स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अनुसार 15 जून के बाद सामान्यतः मिट्टी से जुड़े कार्य बंद कर दिए जाते हैं,क्योंकि मानसून शुरू हो जाता है,इसके बावजूद सोनहत क्षेत्र में कथित रूप से मशीनों से खुदाई का कार्य जारी रहा,यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल गुणवत्ता का नहीं बल्कि शासन के आदेशों की अवहेलना का भी गंभीर मामला माना जाएगा।
न सूचना पटल,न पारदर्शिता…
ग्रामीणों का कहना है कि जिन स्थानों पर निर्माण कराया गया वहां अधिकांश जगहों पर सूचना पटल तक नहीं लगाया गया,लोगों को यह तक जानकारी नहीं है कि कार्य किस योजना के अंतर्गत स्वीकृत हुआ,कितनी राशि मंजूर हुई और किस एजेंसी द्वारा कराया गया,स्थानीय वन समिति के सदस्यों का भी दावा है कि उन्हें निर्माण कार्यों की जानकारी नहीं दी गई,इससे कार्यों की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं।
जन सहयोग समिति ने खोला मोर्चा…
जिला पंचायत कोरिया जन सहयोग समिति के उपाध्यक्ष राजू साहू ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की है,उन्होंने कहा कि सभी कथित तालाबों का स्वतंत्र भौतिक सत्यापन कराया जाए और प्रत्येक निर्माण स्थल की लंबाई,चौड़ाई,गहराई, पाल,स्वीकृत लागत तथा भुगतान का पूरा विवरण सार्वजनिक किया जाए,उन्होंने कहा कि यदि जांच में अनियमितताएं सामने आती हैं तो जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
पुष्पेंद्र राजवाड़े ने लगाए गंभीर आरोप…
जन सहयोग समिति से जुड़े पुष्पेंद्र राजवाड़े ने आरोप लगाया कि यह पूरा मामला जल संरक्षण से अधिक मशीन आधारित निर्माण और सरकारी धन के दुरुपयोग का प्रतीत होता है, उन्होंने कहा कि जिस क्षेत्र में गरीब आदिवासी मजदूरी के लिए भटक रहे हों, वहां मशीनों से रातों-रात कार्य कराना कई सवाल खड़े करता है, उन्होंने आरोप लगाया कि 15 जून के बाद भी मिट्टी कार्य जारी रखना नियमों की अनदेखी है, राजवाड़े ने कहा कि यदि जल्द निष्पक्ष जांच नहीं हुई तो जन सहयोग समिति ग्रामीणों के साथ आंदोलन करेगी।
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