- 7 महीने में तीसरी फरारी…आखिर कब जागेगा बाल संरक्षण तंत्र?
- पहले 15, फिर 11 और अब 13 अपचारी बालक फरार,हर बार एक जैसा पैटर्न…लेकिन जिम्मेदारी अब तक तय नहीं
- सुधार गृह या ‘फरार गृह’? 7 महीने में तीसरी बार भागे अपचारी बालक…
- न्यायालय सुधार के लिए भेजता है,लेकिन सुरक्षा व्यवस्था बार-बार हो रही ध्वस्त
- एक ही समय,एक ही तरीका,तीन बार फरारी… फिर भी नहीं जागा विभाग
- बार-बार टूट रही खिड़कियां,बार-बार भाग रहे अपचारी बालक…आखिर जिम्मेदार कौन?
- 7 महीने में तीसरी बड़ी घटना,पहले की जांच रिपोर्ट भी अब तक सार्वजनिक नहीं
- न्यायालय भेजता है सुधारने, व्यवस्था बना रही ‘फरार’!
- तीन फरारी, एक जैसा पैटर्न…क्या बाल संरक्षण विभाग ने पहले दो मामलों से भी नहीं ली सीख?
- तीन फरारी कांड…फिर भी नहीं जागा बाल संरक्षण विभाग
- फरवरी में 15, जून में 11 और अब जुलाई में 13 अपचारी बालक फरार, जवाबदेही अब भी शून्य
- तीन फरारी कांड… फिर भी नहीं जागा सिस्टम! 7 महीने में 39 अपचारी बालक भागे, हर बार सुरक्षा हुई ध्वस्त… आखिर जवाबदेह कौन?
-संवादादता-
अंबिकापुर 14 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। किसी भी सभ्य समाज में बाल न्याय व्यवस्था का उद्देश्य दंड देना नहीं,बल्कि भटके हुए किशोरों को मुख्यधारा में वापस लाना होता है, इसी सोच के साथ किशोर न्याय (बालकों की देखरेख एवं संरक्षण) अधिनियम के तहत ऐसे नाबालिग,जो गंभीर अपराधों में संलिप्त पाए जाते हैं, उन्हें जेल नहीं बल्कि बाल संप्रेक्षण गृह अथवा प्लेस ऑफ सेफ्टी भेजा जाता है, ताकि वहां उनकी काउंसलिंग, शिक्षा, व्यवहार परिवर्तन और पुनर्वास के माध्यम से उन्हें अपराध की दुनिया से बाहर निकाला जा सके, लेकिन अंबिकापुर में पिछले सात महीनों के दौरान जो घटनाएं सामने आई हैं,उन्होंने इस पूरे उद्देश्य पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं, फरवरी 2026 में प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी बालक फरार हुए, 23 जून को बाल संप्रेक्षण गृह से 11 अपचारी बालक भाग निकले, और अब 14 जुलाई को एक बार फिर 13 अपचारी बालकों के फरार होने की घटना ने यह साबित कर दिया कि व्यवस्था ने पिछली घटनाओं से कोई सबक नहीं लिया, सबसे गंभीर तथ्य यह है कि इस बार फरार हुए बच्चों में कुछ ऐसे भी बताए जा रहे हैं, जो पहले भी फरारी की घटनाओं में शामिल रह चुके थे, यदि यह तथ्य जांच में सही पाया जाता है तो यह केवल सुरक्षा में सेंध नहीं बल्कि पुनर्वास व्यवस्था की विफलता का भी संकेत होगा।
अंबिकापुर की यह तीसरी घटना केवल 13 अपचारी बालकों के फरार होने की खबर नहीं है, बल्कि बाल संरक्षण व्यवस्था की विश्वसनीयता की एक गंभीर परीक्षा है, यदि एक ही प्रकार की घटना बार-बार होती है, एक ही समय में होती है, एक जैसे तरीके से होती है और पूर्व में उठाए गए सवालों के बावजूद दोहराई जाती है, तो यह संकेत देता है कि समस्या किसी एक कर्मचारी, एक भवन या एक दिन की नहीं, बल्कि व्यवस्था के कई स्तरों पर मौजूद कमियों की हो सकती है, इन कमियों का अंतिम निर्धारण निष्पक्ष विभागीय जांच से ही होगा, लेकिन यह अपेक्षा उचित है कि इस बार जांच केवल औपचारिकता बनकर न रह जाए, न्यायालय जिन किशोरों को सुधार की आशा के साथ इन संस्थानों में भेजता है, उनके लिए सुरक्षित, अनुशासित और पुनर्वास-केंद्रित वातावरण उपलब्ध कराना राज्य की जिम्मेदारी है, यदि यह जिम्मेदारी प्रभावी ढंग से नहीं निभाई गई, तो ऐसी घटनाएं न केवल बाल न्याय व्यवस्था बल्कि समाज के विश्वास को भी प्रभावित करती रहेंगी।
तीन घटनाएं…एक जैसा तरीका…फिर भी नहीं सुधरी व्यवस्था- यदि इन तीनों घटनाओं का विश्लेषण किया जाए तो एक समान पैटर्न सामने आता है, पहली घटना में सुरक्षा व्यवस्था को धता बताते हुए किशोर फरार हुए, दूसरी घटना में भी बच्चों ने सुरक्षा व्यवस्था की कमजोरी का फायदा उठाया। अब तीसरी बार भी प्रारंभिक जानकारी के अनुसार लाइब्रेरी की खिड़की तोड़कर अपचारी बालक भाग निकले, सबसे आश्चर्यजनक बात यह है कि तीनों घटनाओं का समय भी लगभग एक जैसा बताया जा रहा है—शाम 6 बजे से रात 9 बजे के बीच,यदि तीनों घटनाओं का समय, तरीका और परिस्थितियां लगभग समान हैं तो सबसे बड़ा प्रश्न यही उठता है कि आखिर विभाग ने पहली और दूसरी घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा क्यों नहीं की? क्या भागने के संभावित स्थानों की पहचान नहीं की गई? क्या सुरक्षा में मौजूद कमियों को दूर नहीं किया गया? यदि किया गया तो फिर वही स्थिति दोबारा कैसे बन गई?
क्या न्यायालय का भरोसा कमजोर पड़ रहा है?- जब कोई किशोर गंभीर अपराध में संलिप्त पाया जाता है तो न्यायालय उसे सीधे जेल नहीं भेजता, उसका कारण यह है कि कानून उसे सुधार का अवसर देता है, बाल संप्रेषण गृह में भेजने का उद्देश्य यह होता है कि वहां मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग हो, शिक्षा मिले, व्यवहार में परिवर्तन आए, परिवार से समन्वय हो, भविष्य में अपराध की पुनरावृत्ति न हो, लेकिन यदि वही किशोर बार-बार वहां से भाग रहे हैं, तो सवाल केवल सुरक्षा का नहीं बल्कि पूरे सुधार मॉडल का है, यदि कोई बच्चा एक बार भागता है, फिर वापस लाया जाता है और दोबारा उसी तरह भाग जाता है, तो इसका अर्थ है कि या तो उसे सुधार गृह की व्यवस्था पर भरोसा नहीं है या फिर वहां निगरानी और काउंसलिंग पर्याप्त प्रभावी नहीं है।क्या नियमित काउंसलिंग हो रही है?- बाल न्याय व्यवस्था में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका काउंसलिंग की होती है, किशोर अपराधियों के व्यवहार का अध्ययन,उनकी मानसिक स्थिति का मूल्यांकन और नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श उन्हें दोबारा अपराध की ओर जाने से रोकने के लिए आवश्यक माना जाता है, ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है की क्या सभी अपचारी बालकों की नियमित काउंसलिंग हो रही थी? क्या विशेषज्ञ मनोवैज्ञानिक उपलब्ध थे? क्या किसी ने यह महसूस किया कि बच्चे सामूहिक रूप से भागने की योजना बना रहे हैं? यदि ऐसे संकेत मिले थे तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
क्या सुरक्षा व्यवस्था केवल कागजों में मजबूत है?- सूत्रों का कहना है कि जिस भवन में अपचारी बालकों को रखा जाता है, वह काफी पुराना है, यदि बार-बार खिड़की तोड़कर बच्चे भाग रहे हैं तो यह माना जा सकता है कि भवन की संरचना सुरक्षा की दृष्टि से पर्याप्त मजबूत नहीं है, लाखों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि खिड़कियां और दरवाजे आसानी से टूट जाते हैं तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि सुरक्षा संबंधी कार्यों पर खर्च किए गए धन का उपयोग किस प्रकार हुआ, क्या भवन का सुरक्षा ऑडिट कराया गया था? क्या सुरक्षा मानकों के अनुरूप मरम्मत हुई थी? क्या विभाग ने किसी तकनीकी एजेंसी से निरीक्षण कराया?
क्या दो होमगार्ड इतने बड़े संस्थान के लिए पर्याप्त हैं?- स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पूरे परिसर की सुरक्षा सीमित कर्मचारियों और दो होमगार्ड के भरोसे चल रही है, यदि यहां हत्या, दुष्कर्म, लूट जैसे गंभीर अपराधों में निरुद्ध अपचारी बालक रहते हैं तो क्या इतनी सीमित सुरक्षा पर्याप्त कही जा सकती है? क्या प्रत्येक शिफ्ट में प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की तैनाती है? क्या किसी आपात स्थिति से निपटने की कार्ययोजना तैयार है?– पहले भी उठे थे सवाल, लेकिन जवाब नहीं मिला- यह पहली बार नहीं है जब इस व्यवस्था पर प्रश्न उठे हैं, 18 फरवरी की घटना के बाद सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठे, 25 जून को 11 अपचारी बालकों के फरार होने पर सीसीटीवी, सुरक्षा घेरा और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े हुए, 26 जून को जवाबदेही तय करने की मांग उठी, 30 जून को संविदा व्यवस्था, निगरानी की कमजोरी और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर विस्तृत रिपोर्ट प्रकाशित हुई, लेकिन अब जुलाई में फिर वही घटना दोहराई गई, इससे यह सवाल और मजबूत हो जाता है कि क्या विभाग ने किसी भी रिपोर्ट या जांच से कोई सीख नहीं ली?
क्या पहले फरार हुए सभी बच्चे वापस आ गए थे?- यह जानकारी भी सार्वजनिक होनी चाहिए कि फरवरी में भागे 15 बच्चों में से सभी वापस लाए गए थे या नहीं? जून में फरार हुए 11 बच्चों की पूरी बरामदगी हुई थी या नहीं? यदि कुछ अभी भी फरार थे तो सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी क्यों नहीं की गई? यदि पहले की घटनाओं के सभी अपचारी बालकों की बरामदगी नहीं हुई थी तो यह गंभीर प्रशासनिक चिंता का विषय है।
क्या हाउस फादर की चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया गया?- सूत्रों के अनुसार संस्थान में पदस्थ हाउस फादर ने बच्चों की गतिविधियों को लेकर समय-समय पर अपने वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी दी थी, यदि यह तथ्य सही है तो फिर सवाल उठता है क्या उन सूचनाओं पर कोई कार्रवाई हुई? क्या अतिरिक्त निगरानी बढ़ाई गई? क्या जोखिम वाले बच्चों को अलग निगरानी में रखा गया? यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक लापरवाही की श्रेणी में आ सकता है। हालांकि इसकी पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही हो सकेगी।
परीवीक्षा अधिकारी और निरीक्षण व्यवस्था पर भी प्रश्न- जानकारी यह भी सामने आई है कि हाल के दिनों में प्रविकक्षा अधिकारी समानुरी को वहां अतिरिक्त प्रभार दिया गया था और वरिष्ठ अधिकारी विक्रमांक सिंह भी लगातार निरीक्षण कर रहे थे, यदि निरीक्षण हो रहा था तो बच्चों की गतिविधियां किसी अधिकारी की नजर में क्यों नहीं आईं? क्या निरीक्षण केवल औपचारिक था? या फिर निरीक्षण के दौरान सुरक्षा संबंधी कमियों को गंभीरता से नहीं लिया गया? इन प्रश्नों का उत्तर विभागीय जांच में सामने आना चाहिए।
क्या संविदा व्यवस्था भी एक कारण है?- सार्वजनिक चर्चा में यह सवाल भी उठ रहा है कि इतने संवेदनशील संस्थानों में बड़ी संख्या में संविदा कर्मचारियों के भरोसे व्यवस्था चलाना कितना उचित है, कुछ लोगों का कहना है कि संवेदनशील संस्थानों में प्रशिक्षित नियमित कर्मचारियों की संख्या बढ़ाई जानी चाहिए, हालांकि यह एक सार्वजनिक मत है और इस पर अंतिम निष्कर्ष नीति-निर्माताओं और विभागीय समीक्षा के आधार पर ही निकाला जा सकता है।
बार-बार जांच, लेकिन कार्रवाई कहां?- हर बड़ी घटना के बाद जांच समिति बनती है, निरीक्षण होता है, रिपोर्ट तैयार होती है, लेकिन जनता आज भी यह जानना चाहती है पहली जांच रिपोर्ट में क्या पाया गया? दूसरी जांच में किन अधिकारियों की जिम्मेदारी तय हुई? क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई हुई? क्या किसी को निलंबित किया गया? यदि सात महीनों में तीन बार एक जैसी घटना हुई है तो केवल जांच पर्याप्त नहीं मानी जा सकती।
क्या सरकार अब व्यापक सुधार करेगी?- लगातार हो रही घटनाओं ने अब यह मांग तेज कर दी है कि प्रदेश के सभी बाल संप्रेषण गृहों का सुरक्षा ऑडिट कराया जाए, आधुनिक सुरक्षा प्रणाली विकसित की जाए, उच्च जोखिम वाले अपचारी बालकों के लिए अलग सुरक्षा प्रोटोकॉल बनाया जाए, नियमित मनोवैज्ञानिक काउंसलिंग अनिवार्य की जाए, पर्याप्त प्रशिक्षित सुरक्षा कर्मियों की नियुक्ति की जाए, प्रत्येक फरारी मामले में समयबद्ध जांच कर जिम्मेदारी तय की जाए, जांच रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
जनता के सवाल, जिनका जवाब जरूरी-
· सात महीने में तीसरी बार अपचारी बालक क्यों भागे?
· तीनों घटनाओं का समय लगभग एक जैसा क्यों रहा?
· बार-बार खिड़की ही कैसे टूट रही है?
· पहले फरार हुए सभी बच्चे वापस आ चुके हैं या नहीं?
· क्या नियमित काउंसलिंग प्रभावी ढंग से हो रही है?
· क्या सुरक्षा व्यवस्था का स्वतंत्र ऑडिट कराया गया?
· क्या किसी अधिकारी या कर्मचारी की जवाबदेही तय हुई?
· पूर्व की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं की गई?
· क्या विभाग अब स्थायी सुधार की दिशा में कदम उठाएगा?
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