सादरी भाषा में बातचीत ने सुलझाई पहचान की गुत्थी...
-संवाददाता-
सूरजपुर,10 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। कई बार एक अनजान भाषा भी किसी बिछड़े हुए इंसान को उसके अपनों से मिला देती है,सूरजपुर के सखी वन स्टॉप सेंटर ने संवेदनशीलता,धैर्य और सूझबूझ का ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत करते हुए एक महीने से परिवार से बिछड़ी मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला को उसके परिजनों से मिलाने में सफलता हासिल की। महिला की पहचान उसकी बोली के आधार पर की गई और अंततः वह अपने परिवार तक सुरक्षित पहुंच सकी।
पहचान बताने की स्थिति में नहीं थी महिला- जानकारी के अनुसार जयनगर थाना क्षेत्र के शिवसागरपुर में एक मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला मिली थी। महिला अपनी पहचान बताने की स्थिति में नहीं थी,वह न तो छत्तीसगढ़ी समझ पा रही थी, न हिंदी और न ही सरगुजिहा भाषा में कोई स्पष्ट जवाब दे पा रही थी,ऐसे में उसकी पहचान करना और उसके परिजनों तक पहुंचना सखी वन स्टॉप सेंटर की टीम के लिए बड़ी चुनौती बन गया।
सादरी भाषा बनी उम्मीद की किरण-महिला की काउंसलिंग के दौरान सखी वन स्टॉप सेंटर की टीम ने उसकी बातचीत पर बारीकी से ध्यान दिया, इसी दौरान टीम को एहसास हुआ कि महिला सादरी भाषा समझती और बोलती है, इसके बाद काउंसलर्स ने उसी भाषा में महिला से संवाद शुरू किया,धीरे-धीरे महिला सहज हुई और बातचीत के दौरान उसने अपने गांव का नाम बेलकोना,शंकरगढ़ (जिला बलरामपुर) बताया,यहीं से उसकी पहचान की गुत्थी सुलझनी शुरू हुई।
जनप्रतिनिधियों की मदद से मिला परिवार- महिला द्वारा बताए गए गांव के आधार पर सखी वन स्टॉप सेंटर की टीम ने शंकरगढ़ के उपसरपंच से संपर्क किया, उनकी सहायता से बेलकोना गांव के सरपंच तक जानकारी पहुंचाई गई, सत्यापन के बाद पता चला कि महिला पिछले लगभग एक महीने से लापता थी और उसके परिजन लगातार उसकी तलाश कर रहे थे, इसके बाद सखी वन स्टॉप सेंटर ने महिला के परिवार को सूचना दी कि वह सूरजपुर में सुरक्षित है।
एक महीने बाद भाई से मिलते ही छलक पड़े खुशी के आंसू- सूचना मिलने के बाद महिला का भाई तत्काल सूरजपुर पहुंचा,करीब एक महीने बाद जब भाई-बहन आमने-सामने आए तो दोनों की आंखें खुशी और भावुकता से भर उठीं। यह दृश्य वहां मौजूद सभी लोगों को भावुक कर गया, परिजनों ने बताया कि महिला अपने पति के साथ घर से निकली थी,जिसके बाद वह लापता हो गई थी। परिवार को लगा कि वह अपने पति के साथ ही होगी,लेकिन समय बीतने के बाद उसकी तलाश शुरू की गई,सखी वन स्टॉप सेंटर से फोन आने के बाद परिवार की उम्मीदें फिर से जाग उठीं।
संवेदनशीलता और धैर्य से लौटी एक परिवार की खुशियां-सखी वन स्टॉप सेंटर की इस पहल ने यह साबित कर दिया कि किसी भी चुनौतीपूर्ण परिस्थिति में संवेदनशीलता,धैर्य और सही संवाद कितना महत्वपूर्ण होता है।
यदि टीम केवल भाषा की कठिनाई को बाधा मानकर प्रयास छोड़ देती,तो संभवतः महिला अपने परिवार तक नहीं पहुंच पाती।
सखी वन स्टॉप सेंटर की पहल बनी मिसाल– इस पूरे घटनाक्रम ने यह संदेश दिया है कि मानवता की सेवा केवल औपचारिक जिम्मेदारी नहीं,बल्कि संवेदनशील प्रयासों से निभाई जाने वाली सामाजिक जिम्मेदारी भी है,सूरजपुर के सखी वन स्टॉप सेंटर ने यह सिद्ध कर दिया कि यदि नीयत और प्रयास सच्चे हों,तो भाषा की दीवार भी रिश्तों को जोड़ने का माध्यम बन सकती है,एक महीने से बिछड़े परिवार को मिलाने की यह पहल न केवल प्रशासनिक संवेदनशीलता का उदाहरण है, बल्कि समाज के लिए भी यह प्रेरणादायक संदेश है कि हर प्रयास किसी की जिंदगी में खुशियां वापस ला सकता है।
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