बिलासपुर,06 जुलाई 2026। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि,बिना किसी ठोस कारण के जांच और चार्जशीट में 6 साल से अधिक की देरी करना आरोपी को प्रताडि़त करने जैसा है। यह संविधान के आर्टिकल 21 के तहत मिलने वाले जल्द सुनवाई के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। इस टिप्पणी के साथ ही डिवीजन बेंच ने मीडिया कर्मी के खिलाफ दर्ज एफआईआर और चार्जशीट को निरस्त कर दिया है। बिलासपुर के सिरगिट्टी निवासी याचिकाकर्ता कैलाश यादव निजी चैनल में वीडियो जर्नलिस्ट का काम करता है। साल 2018 में पुलिसकर्मियों का आंदोलन चल रहा था। इस दौरान 20 जून 2018 को पुलिस अफसरों ने आंदोलनकारी पुलिसकर्मियों की पत्नी को महिला थाने में बैठा लिया था। उन्हें बिना वजह हिरासत में रखे जाने की खबर मिलने पर अपनी टीम के साथ पड़ताल करने के लिए देर रात महिला थाना पहुंचा था। आरोप है कि जब उन्होंने पुलिस से इस मामले में जानकारी मांगी,तो पुलिसकर्मियों ने सहयोग करने के बजाय उनके साथ मिसबिहेव किया। बाद में पुलिस ने उनके खिलाफ शासकीय कार्य में बाधा डालने (धारा 186, 353), मारपीट (धारा 323) और मिलीभगत (धारा 34) के तहत झूठा केस दर्ज कर दिया था। पुलिसिया कार्रवाई के खिलाफ कैलाश यादव ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई गई थी। इस मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि घटना 2018 की है, जबकि पुलिस ने चार्जशीट नवंबर 2024 में पेश की। इस 6 साल की लंबी देरी का पुलिस विभाग के पास कोई संतोषजनक जवाब नहीं था। सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसले में हाईकोर्ट ने कहा कि केस डायरी और चार्जशीट देखने से साफ है कि पूरा मामला सिर्फ पुलिसकर्मियों और उनके जुड़े हुए गवाहों के बयानों पर टिका है, मौके पर कोई भी स्वतंत्र गवाह मौजूद नहीं था। बयानों में काफी विरोध है और याचिकाकर्ता के खिलाफ किसी भी अपराध का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है। ऐसे में मामले को आगे बढ़ाना कानून का गलत इस्तेमाल माना जाएगा।
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