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अंबिकापुर@ पहले खबर को नजरअंदाज किया,फिर एफआईआर लिखी…अब पुलिस पूछ रही है…आरोपी गया कहां?

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  • दैनिक घटती-घटना ने पहले खोला राज…पुलिस छह दिन बाद जागी…तब तक सजायाफ्ता गैंगस्टर हाथ से निकल चुका था…
  • झारखंड पुलिस पकड़ लाई,अंबिकापुर में छूटा सजायाफ्ता गैंगस्टर…अब फरार आरोपी और संरक्षण देने वाले दोनों गायब
  • सजायाफ्ता गैंगस्टर को संरक्षण,पुलिस की देरी और छह दिन बाद एफआईआर…आखिर जिम्मेदार कौन?
  • छह दिन तक चुप रही पुलिस,फिर दर्ज हुई एफआईआर…लेकिन तब तक आरोपी भी फरार,मददगार भी फरार…
  • जब तक पुलिस जागी,खेल खत्म हो चुका था…वासेपुर का सजायाफ्ता गैंगस्टर और उसके कथित मददगार दोनों गायब…
  • खबर 1 जुलाई को, कार्रवाई 5 जुलाई को…क्या इसी देरी ने सजायाफ्ता गैंगस्टर को फरार होने का मौका दिया?
  • एफआईआर तो हुई,लेकिन बहुत देर से…अब सवाल,क्या पुलिस फरार गैंगस्टर और उसके नेटवर्क तक पहुंच पाएगी?
  • खबर को नजरअंदाज करने की कीमत? सजायाफ्ता गैंगस्टर भी फरार,उसे भगाने के आरोपित भी पुलिस की पकड़ से बाहर…
  • पुलिस के हाथ से निकला सजायाफ्ता गैंगस्टर,छह दिन बाद एफआईआर…अब पूरा नेटवर्क तलाशने की चुनौती…

दैनिक घटती-घटना विशेष पड़ताल
अंबिकापुर,06 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
29 जून 2026 को हुई एक घटना ने अब केवल एक फरार अपराधी या एक एफआईआर तक खुद को सीमित नहीं रखा है, यह मामला अब पुलिस की कार्यप्रणाली, सूचना तंत्र,अंतरराज्यीय समन्वय,मीडिया की भूमिका और कानून-व्यवस्था की जवाबदेही का बड़ा उदाहरण बन चुका है, जिस मामले की पहली जानकारी दैनिक घटती-घटना को मिली,उसी समाचार को 1 जुलाई 2026 के अंक में प्रमुखता से प्रकाशित किया गया,इसके बावजूद स्थानीय पुलिस ने कोई अपराध दर्ज नहीं किया, झारखंड पुलिस लगातार अपने स्तर पर आरोपी की तलाश और समन्वय का प्रयास करती रही,लेकिन अंबिकापुर पुलिस की ओर से तत्काल कोई ठोस कार्रवाई सामने नहीं आई,फिर 5 जुलाई 2026 को दैनिक घटती-घटना ने दूसरी बार पूरे मामले को प्रमुखता से प्रकाशित किया,तब तक कई अन्य मीडिया संस्थान भी इस समाचार को प्रकाशित कर चुके थे,इसके बाद थाना अंबिकापुर में अपराध क्रमांक 454/2026 दर्ज हुआ,जिसमें स्वयं पुलिस ने यह उल्लेख किया कि समाचार के सत्यापन के बाद अपराध पंजीबद्ध किया गया,यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न खड़ा होता है—यदि 1 जुलाई को प्रकाशित समाचार पर ही पुलिस कार्रवाई कर देती,तो क्या आजीवन कारावास प्राप्त फरार आरोपी साबिर आलम आज भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर नहीं होता?
अपराध दर्ज हुआ,लेकिन आरोपी भी फरार…
और आरोपी को भगाने के आरोपित भी फरार,अब क्या सिर्फ एफआईआर ही अंतिम कार्रवाई बनकर रह जाएगी?-वासेपुर के आजीवन कारावास प्राप्त फरार गैंगस्टर साबिर आलम को कथित रूप से संरक्षण देने और पुलिस कार्रवाई के दौरान फरार कराने के आरोप में अब अपराध तो दर्ज हो चुका है,लेकिन विडंबना यह है कि जिस सजायाफ्ता अपराधी की तलाश में पूरी कार्रवाई शुरू हुई थी,वह अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर है,इतना ही नहीं,जिस बैतूल खान के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई है, उसके भी फरार होने की चर्चा है और जिन अन्य लोगों की भूमिका की जांच की बात कही जा रही है,वे भी पुलिस की पहुंच से बाहर बताए जा रहे हैं,यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है कि क्या इतने गंभीर मामले में केवल अपराध दर्ज कर देना ही पर्याप्त माना जाएगा,या फिर पुलिस उन लोगों तक भी पहुंचेगी जिन पर एक सजायाफ्ता अपराधी को संरक्षण देने और पुलिस कार्रवाई में बाधा डालने के आरोप लगे हैं?
आखिर यह कोई साधारण मामला नहीं है, यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं,तो यह केवल एक फरार आरोपी का मामला नहीं,बल्कि न्यायालय से आजीवन कारावास प्राप्त अपराधी को कानून के शिकंजे से बाहर निकालने का मामला है, जनता के बीच अब यह चर्चा तेज है कि जिस पुलिस को इस मामले में एफआईआर दर्ज करने में ही छह दिन लग गए,क्या वही पुलिस अब फरार गैंगस्टर,उसे कथित रूप से भगाने वाले लोगों और पूरे नेटवर्क तक पहुंच पाएगी? या फिर समय बीतने के साथ साक्ष्य कमजोर पड़ेंगे, आरोपी और सहयोगी दूर निकल जाएंगे और अंततः यह मामला भी केवल कागजों में दर्ज एक अपराध बनकर रह जाएगा? अब पुलिस के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विवेचना पूरी करना नहीं,बल्कि यह साबित करना है कि कानून का हाथ वास्तव में उन लोगों तक भी पहुंचता है जो एक सजायाफ्ता अपराधी को संरक्षण देने या उसे फरार कराने के आरोपों के घेरे में हैं,यदि ऐसा नहीं हुआ, तो यह धारणा और मजबूत होगी कि कार्रवाई केवल एफआईआर तक सीमित रही,जबकि मुख्य आरोपी और उसके कथित सहयोगी कानून की पहुंच से बाहर निकल गए।
एफआईआर में नाम आया…अब जांच की जिम्मेदारी भी उतनी ही गंभीर
एफआईआर में बैतूल खान सहित अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध अपराध दर्ज किया गया है,अब पुलिस के सामने केवल एक आरोपी को पकड़ने का नहीं बल्कि पूरे नेटवर्क की जांच का दायित्व है,पुलिस सूत्रों के अनुसार पूछताछ और विवेचना में जिन लोगों के नाम सामने आने की बात कही जा रही है,उनमें जावेद आलम (बाबू),खुशवास आलम,इरशाद आलम, आसिफ आलम (असद),कमरान साबरी, ज़ीशान आलम,मोहम्मद सैदुल,समीर आलम,आमिर आलम,नौशाद आलम, दिलशाद आलम (शाद),समीउर रहमान, वसीउर रहमान तथा सोनू आलम सहित अन्य लोगों की भूमिका की भी जांच किए जाने की बात सूत्रों द्वारा कही जा रही है,इन सभी की भूमिका का अंतिम निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
पुलिस की चुप्पी ने क्या आरोपी को भागने का मौका दिया?
29 जून को घटना हुई, 1 जुलाई को दैनिक घटती-घटना ने खबर प्रकाशित कर दी,उसके बाद भी कोई एफआईआर नहीं,झारखंड पुलिस आती रही, सूचनाएं मिलती रहीं,मीडिया लगातार लिखता रहा, लेकिन स्थानीय पुलिस मौन रही,फिर 5 जुलाई को एक अन्य प्रतिष्ठित अखबार में समाचार प्रकाशित होने के बाद अचानक पुलिस सक्रिय हुई और उसी दिन अपराध दर्ज हो गया,अब सवाल उठना स्वाभाविक है क्या 1 जुलाई से 5 जुलाई तक पुलिस इंतजार कर रही थी? क्या पहले प्रकाशित समाचार पर्याप्त नहीं था? क्या झारखंड पुलिस के आवेदन पर्याप्त नहीं थे? यदि नहीं, तो आखिर 5 जुलाई को ऐसा क्या बदल गया कि उसी विषय पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो गई?
एफआईआर ने खुद स्वीकार किया,समाचार के बाद हुई कार्रवाई…
थाना अंबिकापुर में दर्ज एफआईआर के अनुसार पुलिस ने मोमिनपुरा निवासी बैतूल खान एवं अन्य अज्ञात सहयोगियों के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता की धारा 249 के तहत अपराध दर्ज किया है। एफआईआर में दर्ज कथन के अनुसार समाचार का सत्यापन करने पर यह तथ्य सामने आया कि झारखंड के धनबाद निवासी साबिर आलम, जिसे वर्ष 2001 के चर्चित दोहरे हत्याकांड में दोषसिद्ध बताते हुए आजीवन कारावास की सजा मिली तथा जिसे उच्च न्यायालय द्वारा भगोड़ा घोषित किया गया था,वर्ष 2013 से अंबिकापुर के मोमिनपुरा क्षेत्र में पहचान छिपाकर रह रहा था,एफआईआर में यह भी आरोप है कि उसे आश्रय देने में बैतूल खान की भूमिका सामने आई, यानी जिस तथ्य को दैनिक घटती-घटना लगातार प्रकाशित कर रहा था,वही बाद में एफआईआर का आधार भी बना।
खरसिया नाका का घटनाक्रम और पुलिस की पकड़ से आरोपी के निकलने का दावा
इस पूरे घटनाक्रम की शुरुआत उस समय हुई जब झारखंड पुलिस को सूचना मिली कि धनबाद के चर्चित वासेपुर दोहरे हत्याकांड का सजायाफ्ता और फरार आरोपी साबिर आलम अंबिकापुर में छिपा हुआ है,सूत्रों के अनुसार पुलिस ने कार्रवाई करते हुए उसे हिरासत में लिया था। दावा किया जाता है कि आरोपी को पुलिस वाहन तक भी पहुंचा दिया गया था,इसी दौरान घटनास्थल पर मौजूद कुछ लोगों ने पुलिस कार्रवाई का विरोध किया,स्थानीय स्तर पर यह आरोप सामने आया कि बस संचालक बैतूल खान और उसके सहयोगियों ने पुलिस वाहन को घेर लिया, विवाद और धक्का-मुक्की की स्थिति बनी तथा इसी दौरान आरोपी पुलिस की पकड़ से निकल गया,इन आरोपों की अंतिम पुष्टि अभी जांच का विषय है, लेकिन झारखंड पुलिस के अधिकारी ने यह पुष्टि अवश्य की कि कार्रवाई के दौरान आरोपी फरार हो गया और इसकी जानकारी तत्काल स्थानीय पुलिस को दे दी गई थी।
यदि पहली खबर पर कार्रवाई होती तो क्या फरार होता आरोपी?
यही वह प्रश्न है जो पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष बन गया है, यदि 1 जुलाई को प्रकाशित समाचार पर तत्काल कार्रवाई होती…यदि झारखंड पुलिस के आवेदन पर गंभीरता दिखाई जाती…यदि स्थानीय पुलिस समय रहते आरोपी की तलाश करती…तो क्या साबिर आलम पुलिस की गिरफ्त से निकल पाता? यह केवल पत्रकारिता का प्रश्न नहीं, बल्कि कानून-व्यवस्था का भी प्रश्न है।
एफआईआर में एक नाम,लेकिन चर्चा में कई अन्य लोग
एफआईआर में बैतूल खान एवं अन्य अज्ञात सहयोगियों का उल्लेख किया गया है,दूसरी ओर स्थानीय स्तर पर कई अन्य व्यक्तियों के नाम भी चर्चा में हैं,जिनके बारे में विभिन्न सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि उनसे पूछताछ हुई है या उनकी भूमिका की जांच की जा रही है। हालांकि पुलिस ने अभी तक उन व्यक्तियों के विरुद्ध कोई औपचारिक आरोप सार्वजनिक नहीं किया है, यही कारण है कि लोगों के बीच यह चर्चा है कि आखिर ‘अन्य अज्ञात’ कौन हैं? क्या जांच आगे बढ़ेगी? या मामला केवल एक नाम तक सीमित रह जाएगा?
क्या 13 वर्षों तक पहचान छिपाकर रहना संभव था?
एफआईआर के अनुसार साबिर आलम वर्ष 2013 से अंबिकापुर में पहचान छिपाकर रह रहा था, यदि यह तथ्य जांच में सही साबित होता है, तो यह केवल एक व्यक्ति की फरारी का मामला नहीं रह जाता,फिर सवाल उठता है क्या स्थानीय सत्यापन प्रणाली विफल रही? क्या किरायेदार सत्यापन नहीं हुआ? क्या स्थानीय खुफिया तंत्र को कोई जानकारी नहीं मिली? क्या पुलिस की नियमित निगरानी व्यवस्था निष्कि्रय थी? या फिर किसी स्तर पर उसे संरक्षण मिलता रहा?
जनता पूछ रही है-जवाब कौन देगा?
शहर में अब चर्चा किसी एक आरोपी की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की हो रही है,लोग पूछ रहे हैं क्या कोई भी बाहरी व्यक्ति वर्षों तक शहर में रह सकता है? क्या सूचना तंत्र केवल गरीब मजदूरों और किरायेदारों तक सीमित है? क्या प्रभावशाली लोगों की कभी जांच नहीं होती? क्या पुलिस केवल खबर प्रकाशित होने के बाद ही कार्रवाई करती है? क्या पहली खबर कम महत्वपूर्ण थी?
अब जांच केवल आरोपी की नहीं, पूरी व्यवस्था की होनी चाहिए
जांच को यह भी देखना होगा…आरोपी अंबिकापुर कैसे पहुंचा?
उसे रहने की सुविधा किसने दी?
स्थानीय स्तर पर उसके संपर्क कौन-कौन थे?
क्या किसी ने जानबूझकर उसे संरक्षण दिया?
क्या पुलिस कार्रवाई में बाधा पहुंचाई गई?
क्या पुलिस की देरी से आरोपी को भागने का अवसर मिला?

सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है…
इस पूरे प्रकरण में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि जिस समाचार को पहले दैनिक घटती-घटना ने प्रकाशित किया,उसी विषय पर बाद में पुलिस ने अपराध दर्ज किया, इससे यह बहस तेज हो गई है कि यदि शुरुआती सूचना पर ही पुलिस सक्रिय हो जाती,तो क्या आज यह मामला फरार आरोपी,पुलिस की चूक और एफआईआर दर्ज होने में छह दिन की देरी तक पहुंचता? अब यह केवल एक आपराधिक मामला नहीं,बल्कि पुलिस की जवाबदेही, अंतरराज्यीय समन्वय और कानून-व्यवस्था पर जनता के भरोसे की भी परीक्षा बन चुका है,आने वाले दिनों में जांच की दिशा ही तय करेगी कि यह मामला केवल एक एफआईआर तक सीमित रहता है या फिर उन सभी सवालों के जवाब भी सामने आते हैं,जो पिछले कई दिनों से पूरे सरगुजा संभाग में चर्चा का विषय बने हुए हैं।


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