पहले चेतावनी यात्रा,फिर 10 सितंबर से सत्याग्रह,मनोज साहू बोले…दस्तावेजों के साथ जनता के बीच रखेंगे कथित गड़बडि़यों का हिसाब
-राजन पाण्डेय-
सोनहत,30 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। सत्ता भाजपा की, सरकार भाजपा की और आंदोलन की चेतावनी देने वाला नेता भी भाजपा का…फिर आखिर सोनहत में ऐसी कौन-सी प्रशासनिक कहानी लिखी जा रही है कि अपनी ही सरकार के दौर में भाजपा नेता को अधिकारियों के खिलाफ सड़क पर उतरने और सत्याग्रह करने की घोषणा करनी पड़ रही है? सोनहत की राजनीति में इन दिनों यही सवाल सबसे अधिक चर्चा में है। भाजपा नेता मनोज साहू ने 10 सितंबर से सत्याग्रह शुरू करने का ऐलान किया है,इससे पहले क्षेत्र में चेतावनी यात्रा निकालने की तैयारी है,साहू का आरोप है कि सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से लेकर नियुक्तियों,पदस्थापनाओं,शिकायतों के निराकरण और जनप्रतिनिधियों की सुनवाई तक कई ऐसे मामले हैं जिन पर प्रशासन से जवाब मांगा जाना चाहिए,हालांकि ये तमाम आरोप फिलहाल मनोज साहू और आंदोलन से जुड़े पक्ष के दावे हैं। इनकी स्वतंत्र जांच और प्रशासन का विस्तृत पक्ष सामने आना जरूरी है। लेकिन सवाल यह भी है कि यदि शिकायतें लगातार उठ रही हैं तो उनका दस्तावेजी और बिंदुवार जवाब सामने क्यों नहीं आना चाहिए?
‘अपनी सरकार’ में सत्याग्रह की नौबत क्यों?-सोनहत के इस आंदोलन की सबसे दिलचस्प राजनीतिक तस्वीर यही है,सामान्यतः विपक्ष सत्ता और प्रशासन के खिलाफ धरना देता है,लेकिन यहां भाजपा नेता ही प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ सत्याग्रह की तैयारी कर रहे हैं,यानी राजनीतिक भाषा में कहें तो ‘सरकार से शिकायत नहीं,सरकार के अफसरों से हिसाब चाहिए,मनोज साहू की घोषणा को इसी वजह से केवल स्थानीय आंदोलन मानकर नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा,यदि सत्ताधारी दल से जुड़ा कोई नेता सार्वजनिक रूप से यह कहने लगे कि प्रशासन जनहित की शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं कर रहा, तो सवाल सिर्फ शिकायतकर्ता का नहीं रहता—प्रशासनिक जवाबदेही का भी बन जाता है।
योजनाएं जनता के लिए हैं या फाइलों के लिए?-साहू ने केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन पर सवाल उठाए हैं,उनका आरोप है कि पात्र हितग्राहियों को लाभ लेने के लिए कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं,अब यहां प्रशासन के सामने सीधा सवाल है—यदि योजनाओं का क्रियान्वयन नियम और पारदर्शिता के साथ हो रहा है तो आंकड़े सामने रखे जाएं,कितने आवेदन आए? कितने स्वीकृत हुए? कितने लंबित हैं? कितने निरस्त हुए और किस आधार पर? सरकारी योजनाओं में आंकड़े सबसे अच्छा जवाब होते हैं,क्योंकि भाषण में सब कुछ ‘सुचारू’ हो सकता है, लेकिन फाइल और लाभार्थियों की सूची बता देती है कि व्यवस्था वास्तव में कितनी सुचारू है।
क्या जनप्रतिनिधि भी ‘प्रतीक्षा सूची’ में हैं?-साहू ने जनप्रतिनिधियों और आम नागरिकों की सुनवाई को लेकर भी प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए हैं,लोकतंत्र में अधिकारी और निर्वाचित जनप्रतिनिधि व्यवस्था के दो महत्वपूर्ण हिस्से हैं। दोनों की भूमिकाएं अलग हैं,लेकिन उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान होना चाहिए,यदि किसी जनप्रतिनिधि की शिकायत नियमविरुद्ध है तो उसे अस्वीकार किया जा सकता है,लेकिन कारण बताया जाना चाहिए। यदि शिकायत सही है तो कार्रवाई होनी चाहिए,स्थिति तब विचित्र हो जाती है जब शिकायत कार्यालय में पहुंचती है, पत्र पर प्राप्ति हो जाती है और फिर मामला फाइलों की ऐसी यात्रा पर निकल जाता है जिसका अगला स्टेशन शिकायतकर्ता को ही पता नहीं चलता, सोनहत में अब सवाल यही है—शिकायतों का निराकरण हो रहा है या सिर्फ उनकी ‘प्राप्ति’ सुनिश्चित की जा रही है?
मनोज साहू का दावा…सत्याग्रह में खुलेंगी ‘फाइलें-मनोज साहू ने संकेत दिया है कि प्रस्तावित सत्याग्रह केवल नारे,भाषण और धरना-प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहेगा, उनका दावा है कि प्रशासनिक अनियमितताओं,कथित फर्जी नियुक्तियों और योजनाओं के क्रियान्वयन से जुड़े दस्तावेज जनता के सामने रखे जाएंगे, यदि ऐसा होता है तो आंदोलन का स्वरूप महत्वपूर्ण हो सकता है,क्योंकि राजनीति में आरोप लगाना आसान है,लेकिन दस्तावेज के साथ आरोप लगाने पर सामने वाले पक्ष से भी दस्तावेजी जवाब की अपेक्षा बढ़ जाती है, हालांकि साहू के सामने भी कसौटी उतनी ही कड़ी होगी,जिन मामलों को वे कथित भ्रष्टाचार या अनियमितता के रूप में उठा रहे हैं, उनमें तारीख,आदेश,संबंधित पद,नियम और प्रमाण स्पष्ट रूप से सामने रखने होंगे,केवल आरोपों से जांच का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
पहले चेतावनी यात्रा,फिर सत्याग्रह- 10 सितंबर के सत्याग्रह से पहले चेतावनी यात्रा निकालने की तैयारी इस आंदोलन को चरणबद्ध रणनीति का रूप देती दिखाई दे रही है,यात्रा के माध्यम से गांवों और स्थानीय लोगों के बीच जाकर शिकायतों को उठाने तथा प्रशासन को कार्रवाई का अवसर देने की बात कही जा रही है,इसका राजनीतिक संदेश भी साफ है—मामला अब कार्यालय के आवेदन और ज्ञापन से निकलकर जनता की चौपाल तक ले जाने की तैयारी है, यदि चेतावनी यात्रा में स्थानीय लोगों की भागीदारी बढ़ती है तो प्रशासन पर दबाव बढ़ सकता है, वहीं यदि प्रशासन आंदोलन से पहले प्रमुख शिकायतों पर तथ्यात्मक जवाब या कार्रवाई सामने रख देता है तो तस्वीर दूसरी हो सकती है।
शिकायत आई, जांच हुई…फिर रिपोर्ट कहां है?-पूर्व में की गई शिकायतों के निराकरण को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं, आंदोलनकारी पक्ष का आरोप है कि दस्तावेज और तथ्य देने के बावजूद कई मामलों में अपेक्षित कार्रवाई नहीं हुई, यहां प्रशासनिक व्यवस्था की पुरानी बीमारी जैसा एक सवाल सामने आता है—शिकायत की जांच और शिकायत का निपटारा क्या हमेशा एक ही चीज होती है? फाइल में निराकृत लिख देने और वास्तव में आरोपों की जांच कर जिम्मेदारी तय करने के बीच बड़ा अंतर है,यदि शिकायतों की जांच पहले हो चुकी है तो जांच रिपोर्ट सामने रखी जा सकती है। किस अधिकारी ने जांच की? किन दस्तावेजों को देखा गया? शिकायत सही मिली या गलत? यदि गलत मिली तो आधार क्या था? यदि सही मिली तो कार्रवाई क्या हुई? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक होने पर ही यह तय हो सकेगा कि आरोपों में तथ्य हैं या आंदोलन राजनीतिक दबाव बनाने का माध्यम भर है।
‘सिस्टम’ की परीक्षा भी,आंदोलन की भी–सोनहत के इस घटनाक्रम में केवल प्रशासन ही परीक्षा में नहीं है,आंदोलन करने वाले भाजपा नेता की विश्वसनीयता भी दांव पर होगी,यदि मनोज साहू अपने दावों के समर्थन में ठोस दस्तावेज सार्वजनिक करते हैं तो प्रशासन को उनका बिंदुवार उत्तर देना पड़ेगा,लेकिन यदि आरोपों के अनुरूप प्रमाण सामने नहीं आते तो सवाल आंदोलन की गंभीरता पर भी उठेंगे,यही लोकतांत्रिक जवाबदेही है…आरोप लगाने वाला प्रमाण दे और जिस पर आरोप है वह जवाब दे, फिलहाल साहू के आरोपों को अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता और प्रशासन को भी केवल मौन के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता। निष्पक्ष तस्वीर दोनों पक्षों के दस्तावेज सामने आने के बाद ही बनेगी।
10 सितंबर…सत्याग्रह या सोनहत की ‘प्रशासनिक ऑडिट’?-अब निगाह 10 सितंबर पर है, एक तरफ प्रशासन है, जिसके पास सरकारी रिकॉर्ड,आदेश,जांच रिपोर्ट और योजनाओं के आंकड़े हैं। दूसरी तरफ आंदोलन की घोषणा करने वाले मनोज साहू हैं,जो कथित अनियमितताओं के दस्तावेज जनता के सामने रखने का दावा कर रहे हैं,ऐसे में सत्याग्रह यदि घोषित रूप में होता है तो यह सिर्फ धरना नहीं रहेगा,यह सार्वजनिक मंच पर आरोप बनाम सरकारी रिकॉर्ड की लड़ाई भी बन सकता है, और सोनहत की राजनीति में सबसे बड़ा व्यंग्य शायद यही है…जब अपनी ही सरकार के नेता को अपनी ही सरकार की योजनाओं के क्रियान्वयन और अफसरों की कार्यप्रणाली पर सवाल लेकर सत्याग्रह की राह पकड़नी पड़े, तो सवाल आंदोलन से ज्यादा व्यवस्था से पूछे जाते हैं,अब प्रशासन के पास दो रास्ते दिखाई देते हैं—आरोपों को तथ्यहीन मानता है तो दस्तावेजों के साथ उनका खंडन करे,और यदि शिकायतों में तथ्य मिलते हैं तो जांच कर जिम्मेदारी तय करे, क्योंकि 10 सितंबर को केवल मनोज साहू सत्याग्रह पर नहीं बैठेंगे,उनके साथ एक सवाल भी प्रशासन के सामने बैठेगा—सोनहत में शासन की योजनाएं आखिर चल किसके हिसाब से रही हैं—नियमों के,जनता के या फाइलों के? प्रधानमंत्री आवास योजना पर उठे सवाल ने बढ़ाई गर्मी
इस विवाद का एक संवेदनशील पहलू प्रधानमंत्री आवास योजना से जुड़ा है, साहू ने आरोप लगाया है कि एक अधिकारी द्वारा योजना को लेकर कथित रूप से अमर्यादित टिप्पणी की गई, लेकिन उसके बाद भी प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई,यह आरोप गंभीर है और इसकी सत्यता की निष्पक्ष जांच आवश्यक है,यदि ऐसी कोई टिप्पणी नहीं हुई तो प्रशासन को स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,यदि हुई तो यह भी बताया जाना चाहिए कि शिकायत मिलने के बाद क्या जांच हुई और उसका परिणाम क्या रहा, क्योंकि प्रधानमंत्री आवास योजना महज सरकारी फाइल का नाम नहीं है,गरीब परिवार के लिए यह पक्की छत की उम्मीद है। ऐसे में योजना को लेकर किसी अधिकारी के कथित व्यवहार या टिप्पणी पर सवाल उठता है तो उसका जवाब भी उतना ही स्पष्ट होना चाहिए।
नियुक्तियों का दरवाजा सामने है या बैकडोर भी खुला है?
आंदोलन की घोषणा में दूसरा बड़ा मुद्दा कथित नियुक्तियों और पदस्थापनाओं का है,मनोज साहू ने कुछ मामलों में मनमानी नियुक्ति, पदस्थापना और ‘बैकडोर एंट्री’ का आरोप लगाया है, बैकडोर एंट्री शब्द अपने आप में गंभीर है,इसलिए इसे राजनीतिक आरोप की तरह छोड़ देने के बजाय संबंधित मामलों के दस्तावेज सामने आने चाहिए,किस पद पर नियुक्ति हुई? योग्यता क्या निर्धारित थी? विज्ञापन कब निकला? चयन प्रक्रिया क्या रही? चयन समिति में कौन थे? कितने आवेदन आए और चयन किस आधार पर हुआ? यदि सभी नियुक्तियां नियमानुसार हैं तो रिकॉर्ड सामने आने के बाद विवाद काफी हद तक समाप्त हो सकता है,लेकिन यदि दस्तावेजों में नियमों से विचलन दिखाई देता है तो फिर मामला आंदोलन से आगे जांच और जिम्मेदारी तय करने तक पहुंच सकता है,यानी अब गेंद आरोप लगाने वाले के साथ-साथ प्रशासन के पाले में भी है—एक पक्ष को प्रमाण रखने होंगे और दूसरे को उनका तथ्यात्मक जवाब देना होगा।
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