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सूरजपुर@ एक साल में मिला सिर्फ रपटा…अब पहली बरसात बताएगी निर्माण की असली कहानी

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  • पुल टूटा,साल बीता…अब रपटा के भरोसे हजारों
  • ग्रामीण,पहली बारिश में होगी गुणवत्ता की अग्निपरीक्षा
  • एक साल बाद भी स्थायी पुल नहीं…अब अस्थायी रपटा पर टिकी हजारों लोगों की जिंदगी
  • घटती-घटना’ के अभियान के बाद बना रपटा,फिर बनी सड़क…अब बरसात में होगी विभाग के दावों की परीक्षा…
  • 20 साल में पुल टूटा, एक साल में रपटा बना…अब क्या पहली बरसात में ही होगा फैसला?
  • 30 जून को टूटा था पुल… एक साल बाद भी नहीं बना नया, अब रपटा बचा तो बचेगी विभाग की साख…
  • गोबरी नदी के तेज बहाव के बीच अब पहली बरसात में होगी वैकल्पिक व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा…
  • 30 जून 2025 को टूटा था करोड़ों की लागत वाला पुल, एक वर्ष बाद भी स्थायी निर्माण शुरू नहीं…

-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,06 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
ठीक एक वर्ष पहले,30 जून 2025 को गोबरी नदी पर बना वह पुल अचानक धराशायी हो गया था,जिसने वर्षों तक कोरिया और सूरजपुर जिले के हजारों ग्रामीणों को राष्ट्रीय राजमार्ग-43 से जोड़ रखा था,पुल टूटते ही हजारों लोगों का सीधा संपर्क मुख्य मार्ग से समाप्त हो गया,प्रशासन ने तत्काल आवागमन बंद कराया और जल्द नए पुल के निर्माण का भरोसा दिया,लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी नया पुल धरातल पर दिखाई नहीं दे रहा है,जुलाई 2026 शुरू हो चुकी है,बरसात भी दस्तक दे चुकी है, ऐसे समय में ग्रामीणों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्थायी पुल नहीं बन पाया,तब वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में तैयार किया गया रपटा क्या इस बरसात का दबाव झेल पाएगा?
एक वर्ष तक चलता रहा इंतजार…फिर वैकल्पिक व्यवस्था का सहारा
30 जून 2025 को पुल टूटने के बाद प्रशासन ने लोगों को भरोसा दिलाया था कि वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी और स्थायी पुल निर्माण की प्रक्रिया शुरू होगी,लेकिन बरसात समाप्त होने के बाद भी नया पुल निर्माण अपेक्षित गति नहीं पकड़ सका,उधर हजारों ग्रामीण प्रतिदिन परेशानी झेलते रहे, किसानों को अपनी उपज बाजार तक पहुंचाने में कठिनाई हुई,विद्यार्थियों को लंबा रास्ता तय करना पड़ा और मरीजों को अस्पताल तक पहुंचने में अतिरिक्त समय लगने लगा।
अब रपटा नहीं, विभाग की प्रतिष्ठा भी बहेगी या बचेगी?
पूरा एक साल बीत गया,स्थायी पुल नहीं बन पाया, लेकिन वैकल्पिक व्यवस्था के नाम पर रपटा जरूर तैयार हो गया,अब मानसून की पहली बड़ी परीक्षा केवल रपटा की नहीं, बल्कि लोक निर्माण विभाग की कार्यशैली और निर्माण गुणवत्ता की भी है,गोबरी नदी सामान्य नदी नहीं है,पहाड़ी जलग्रहण क्षेत्र से आने वाला तेज बहाव और जलाशय से बढ़ता जलप्रवाह हर बरसात में अपने साथ बहुत कुछ बहा ले जाता है,ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह रपटा पहली ही बरसात का दबाव झेल पाएगा,या फिर पानी के साथ विभाग के दावे भी बह जाएंगे? यदि यह वैकल्पिक रपटा सुरक्षित रहता है तो विभाग अपनी पीठ थपथपा सकता है,लेकिन यदि पहली ही बरसात में यह बह गया,तो सिर्फ पत्थर और मिट्टी नहीं बहेंगे,बल्कि एक साल की प्रशासनिक तैयारी,करोड़ों के वादे और निर्माण गुणवत्ता पर जनता का भरोसा भी पानी के साथ बहता नजर आएगा,जनता अब बादलों की नहीं, बहाव की प्रतीक्षा कर रही है…क्योंकि इस बार परीक्षा नदी नहीं, निर्माण की है।
4 जुलाई की खबर के बाद फिर जागा विभाग
4 जुलाई 2026 के अंक में दैनिक घटती-घटना ने प्रमुखता से 15 लाख का रपटा… अब सड़क के लिए जनता से चंदा! शीर्षक से खबर प्रकाशित की,समाचार में बताया गया कि सरकारी रपटा तो बन गया,लेकिन सड़क नहीं बनने के कारण पूरा रास्ता दलदल में बदल चुका है और ग्रामीण स्वयं सहयोग राशि एकत्र कर पत्थर डलवाने को मजबूर हैं, खबर प्रकाशित होने के कुछ ही घंटों के भीतर संबंधित विभाग सक्रिय हुआ,मौके पर जेसीबी,डंपर और अन्य मशीनें पहुंचीं तथा रपटा तक पहुंचने वाले मार्ग पर डब्ल्यूएमएम डालने का कार्य शुरू कर दिया गया,स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यह कार्य समय पर नहीं होता तो बरसात में रपटा बनने के बावजूद उसका लाभ नहीं मिल पाता।
अब असली परीक्षा शुरू-अब जबकि एप्रोच रोड पर डब्ल्यूएमएम का कार्य भी किया जा चुका है,लोगों की नजरें आगामी बारिश पर टिकी हैं,ग्रामीणों का कहना है कि असली परीक्षा अब होगी,क्योंकि गोबरी नदी का स्वभाव सामान्य नदियों जैसा नहीं है।
गोबरी नदी का तेज बहाव बना सबसे बड़ी चुनौती-स्थानीय लोगों के अनुसार गोबरी नदी का जलग्रहण क्षेत्र पूरी तरह पहाड़ी है,पटना व कटकोना के मध्य बरिदिया में स्थित गोबरी जलाशय और आसपास की पहाडि़यों से बड़ी मात्रा में पानी बरसात के दौरान एक साथ नदी में उतरता है, जब जलाशय भर जाता है और अतिरिक्त पानी बांध के उपर से बहता जाता है, तब नदी का बहाव कई गुना बढ़ जाता है,ऐसी स्थिति में नदी का प्रवाह अत्यंत तेज हो जाता है, ग्रामीणों का कहना है कि इसी तेज बहाव के कारण पूर्व में बना पुल भी लंबे समय तक दबाव झेलते-झेलते अंततः क्षतिग्रस्त हुआ था, अब यही चिंता रपटा को लेकर भी व्यक्त की जा रही है।
ग्रामीण बोले—अभी से दिखने लगे हैं कटाव के संकेत– स्थानीय लोगों का कहना है कि रपटा के कुछ हिस्सों में प्रारंभिक कटाव दिखाई देने लगा है,बारिश का पानी किनारों की मिट्टी बहा रहा है,यदि समय रहते सुरक्षा कार्य नहीं किए गए तो लगातार बारिश में स्थिति गंभीर हो सकती है,हालांकि इस संबंध में संबंधित विभाग की ओर से कोई आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है।
एक वर्ष…फिर भी स्थायी पुल नहीं- सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर एक वर्ष बीत जाने के बाद भी स्थायी पुल निर्माण की स्पष्ट समय-सीमा क्यों तय नहीं हो सकी, यदि नया पुल समय पर स्वीकृत होकर निर्माणाधीन होता तो आज हजारों ग्रामीणों को अस्थायी रपटा पर निर्भर नहीं रहना पड़ता, लोग पूछ रहे हैं आखिर नया पुल कब बनेगा? प्रशासन ने एक वर्ष में क्या प्रगति की? क्या केवल अस्थायी व्यवस्था ही समाधान है?
20 साल में ढहा पुल, अब गुणवत्ता पर फिर सवाल
जिस पुल के स्थान पर यह रपटा बनाया गया है, उसका निर्माण लगभग दो दशक पहले हुआ था,पुल के धराशायी होने के बाद निर्माण गुणवत्ता,रखरखाव और विभागीय निगरानी पर गंभीर सवाल उठे थे, अब लोग चाहते हैं कि वैकल्पिक रपटा और भविष्य में बनने वाले नए पुल में गुणवत्ता से कोई समझौता न हो।
अंग्रेजों के दौर के निर्माण की तुलना क्यों?
ग्रामीणों के बीच अक्सर यह चर्चा सुनाई देती है कि अंग्रेजों के समय बने कई पुल,भवन और पुलिया आज भी उपयोग में हैं,जबकि आधुनिक समय में बने कई सरकारी निर्माण अपेक्षाकृत कम समय में क्षतिग्रस्त हो जाते हैं,हालांकि प्रत्येक निर्माण की तकनीक, डिजाइन,यातायात भार,सामग्री,रखरखाव और भौगोलिक परिस्थितियां अलग होती हैं,इसलिए ऐसी तुलना सीधे तौर पर तकनीकी निष्कर्ष नहीं मानी जा सकती,फिर भी लोगों की अपेक्षा यही है कि सार्वजनिक धन से बनने वाले निर्माण लंबे समय तक टिकाऊ और सुरक्षित रहें।
दैनिक घटती-घटना ने लगातार उठाया मुद्दा
इस पूरे मामले को दैनिक घटती-घटना ने लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया,पुल टूटने से लेकर प्रशासनिक दावों,ग्रामीणों की परेशानियों, वैकल्पिक मार्ग की मांग और निर्माण कार्यों की धीमी गति तक हर पहलू को समाचार के माध्यम से सामने लाया गया,लगातार प्रकाशित खबरों के बाद प्रशासन हरकत में आया और गोबरी नदी पर वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में रपटा निर्माण का निर्णय लिया गया,ग्रामीणों को उम्मीद जगी कि कम से कम बरसात के दौरान आवागमन पूरी तरह बंद नहीं होगा।
रपटा बना… लेकिन सड़क नहीं…
करीब 15 लाख रुपये की लागत से रपटा तैयार कर दिया गया,लेकिन उसके दोनों ओर की एप्रोच सड़क अधूरी छोड़ दी गई,पहली ही बारिश में सड़क दलदल में बदल गई,रपटा तक पहुंचना मुश्किल हो गया,हालात ऐसे बन गए कि लोग कहने लगे रपटा बन गया,लेकिन सड़क नहीं बनी,स्थिति इतनी खराब हो गई कि ग्रामीणों ने स्वयं चंदा जुटाकर सड़क बनाने की पहल शुरू कर दी।
‘घटती-घटना’ के बड़े सवाल
नया स्थायी पुल निर्माण कब शुरू होगा?
एक वर्ष बाद भी केवल वैकल्पिक व्यवस्था क्यों?
क्या रपटा पहली ही बरसात की परीक्षा पास कर पाएगा?
निर्माण गुणवत्ता की निगरानी कौन कर रहा है?
यदि रपटा को नुकसान होता है तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
क्या विभाग ने मानसून के दौरान नियमित निरीक्षण की योजना बनाई है?

जनहित का अभियान जारी रहेगा
गोबरी नदी का यह पुल केवल कंक्रीट की संरचना नहीं था, बल्कि हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी का आधार था, इसलिए इस मुद्दे पर दैनिक घटती-घटना आगे भी लगातार फॉलो-अप करता रहेगा, ताकि स्थायी पुल का निर्माण शीघ्र पूरा हो और क्षेत्र के लोगों को सुरक्षित एवं स्थायी आवागमन की सुविधा मिल सके।


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