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कोरिया@11 खबरें…दर्जनों दस्तावेज…फिर भी शासन-प्रशासन मौन, आखिर किसके संरक्षण में चल रहा स्टेनो प्रकरण?

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  • दस्तावेज बोलते रहे…सरकार चुप रही! आखिर किसका है यह अदृश्य संरक्षण?
  • आंखों पर पट्टी,कानों में रुई और मुंह पर टेप? आखिर किस संरक्षण में चलता रहा कोरिया का चर्चित स्टेनो प्रकरण?
  • 24 साल की प्रतिनियुक्ति,डेढ़ लाख की तनख्वाह,सेवा पुस्तिका,पदोन्नति,वेतन
  • निर्धारण,संविलियन की कोशिश और अब भी जवाब का इंतजार…
  • 24 साल का जुगाड़ या प्रशासनिक चमत्कार? 11 खुलासों के बाद भी जवाब नहीं…
  • स्टेनो या सुपर सिस्टम? 11 खबरों के बाद भी शासन-प्रशासन ने क्यों नहीं खोली फाइल?
  • डेढ़ लाख की तनख्वाह,24 साल की प्रतिनियुक्ति…11 खुलासे,फिर भी कार्रवाई शून्य!
  • नियम हार गए या सिस्टम झुक गया? 11 खबरों के बाद भी प्रशासन की चुप्पी बरकरार
  • कोरिया का ‘सबसे प्रभावशाली स्टेनो’ या सिस्टम की सबसे बड़ी चुप्पी?
  • प्रतिनियुक्ति से वेतन तक सवाल ही सवाल…11 खबरों के बाद भी शासन बेखबर क्यों?
  • स्टेनो प्रकरणः फाइलें खुलती रहीं, सवाल बढ़ते रहे…लेकिन सरकार क्यों नहीं बोली?


-रवि सिंह-
कोरिया,05 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
लोकतंत्र में यदि किसी समाचार पत्र द्वारा किसी एक मामले पर एक-दो नहीं बल्कि लगातार 11 समाचार प्रकाशित किए जाएं, आधिकारिक दस्तावेज प्रकाशित किए जाएं, आदेशों की प्रतियां सामने लाई जाएं, प्रतिनियुक्ति से लेकर सेवा पुस्तिका,वेतन निर्धारण, पदोन्नति और संविलियन जैसे गंभीर प्रशासनिक प्रश्न उठाए जाएं, फिर भी शासन और प्रशासन की ओर से न कोई आधिकारिक खंडन आए,न कोई सार्वजनिक जांच की घोषणा हो और न ही तथ्यात्मक स्पष्टीकरण दिया जाए, तो सवाल केवल एक कर्मचारी पर नहीं रह जाता,बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की जवाबदेही पर खड़ा हो जाता है, दैनिक घटती-घटना पिछले कई सप्ताह से इस पूरे प्रकरण के दस्तावेज एक-एक कर सार्वजनिक करता रहा है, हर खबर के साथ नए आदेश,नई फाइलें और नए सवाल सामने आते रहे,लेकिन जितनी तेजी से दस्तावेज सामने आए, उतनी ही गहरी होती गई शासन-प्रशासन की चुप्पी, आज कोरिया जिले में सबसे ज्यादा चर्चा किसी कर्मचारी की नहीं, बल्कि उस चुप्पी की हो रही है।
क्या शासन ने आंखें मूंद ली हैं?
लोग अब व्यंग्य में कहते हैं कि शायद इस मामले में शासन और प्रशासन ने तीन नई सरकारी वस्तुएं खरीद ली हैं—आंखों पर पट्टी…कानों में रुई…मुंह पर टेप…क्योंकि…दस्तावेज सामने आ रहे हैं, आदेश सामने आ रहे हैं, वेतन पर्चियां सामने आ रही हैं, सेवा पुस्तिका सामने आ रही है, प्रतिनियुक्ति के रिकॉर्ड सामने आ रहे हैं, लेकिन जवाब कहीं दिखाई नहीं दे रहा, यदि प्रकाशित दस्तावेज गलत हैं तो उनका तत्काल खंडन होना चाहिए था, यदि दस्तावेज सही हैं तो फिर कार्रवाई दिखाई देनी चाहिए थी, लेकिन दोनों में से कुछ भी सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया।
24 साल…और खत्म ही नहीं हुई प्रतिनियुक्ति!-
पूरे मामले का सबसे बड़ा प्रश्न प्रतिनियुक्ति है,उपलब्ध दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 2000 में संबंधित कर्मचारी मत्स्य महासंघ से जुड़ा था, मध्यप्रदेश पुनर्गठन के बाद उसे छत्तीसगढ़ मत्स्य महासंघ में कार्यभार ग्रहण करने के आदेश दिए गए,लेकिन उसके बाद वही कर्मचारी वर्षों तक कलेक्टर कार्यालय में कार्य करता रहा, सवाल यह नहीं कि कर्मचारी ने काम किया, सवाल यह है कि प्रतिनियुक्ति आखिर कितने दिन की होती है? सरकारी नियमों में प्रतिनियुक्ति अस्थायी व्यवस्था मानी जाती है, लेकिन यहां तो प्रतिनियुक्ति ने लगभग 24 वर्ष पूरे कर लिए, अब कर्मचारी ही नहीं, जिले के अधिकारी भी पूछ रहे हैं क्या यह देश की सबसे लंबी प्रतिनियुक्तियों में से एक है?
संविलियन का सपना…लेकिन पूरा नहीं हुआ?
दस्तावेज यह भी संकेत देते हैं कि राजस्व विभाग में संविलियन की दिशा में भी प्रयास हुए, लेकिन उपलब्ध रिकॉर्ड से यह स्पष्ट नहीं होता कि संविलियन हुआ,यदि संविलियन नहीं हुआ तो फिर सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि—जब कर्मचारी मूल विभाग का था तो राजस्व विभाग में उसकी स्थिति किस आधार पर बनी रही? यदि संविलियन नहीं हुआ…तो वेतन किस नियम से बना? यदि संविलियन नहीं हुआ…तो पदोन्नति किस विभाग ने दी? यदि संविलियन नहीं हुआ…तो वार्षिक वेतनवृद्धि किस नियम के अनुसार लगी?
निज सहायक से स्टेनो वर्ग-1 तक…आखिर कैसे?
वर्ष 2000 के दस्तावेजों में कर्मचारी का उल्लेख निज सहायक के रूप में मिलता है,बाद के दस्तावेजों में वही कर्मचारी स्टेनोग्राफर वर्ग-01 के रूप में दिखाई देता है,यहीं से प्रशासनिक प्रश्न और गंभीर हो जाते हैं, क्या पदोन्नति मत्स्य महासंघ के नियमों से हुई? या राजस्व विभाग के नियमों से? या फिर किसी विशेष प्रशासनिक आदेश से? यदि कर्मचारी सहकारिता क्षेत्र का था तो क्या उसके पदोन्नति नियम राजस्व विभाग से अलग नहीं होने चाहिए थे?
आईएएस से भी ज्यादा वेतन?
अब पूरे जिले में सबसे ज्यादा चर्चा वेतन को लेकर है, उपलब्ध वेतन संबंधी जानकारी के अनुसार संबंधित कर्मचारी को लगभग 1.46 लाख प्रतिमाह वेतन-भत्ते मिलने की बात सामने आई है,यहीं से सवालों की दूसरी फाइल खुलती है, कलेक्टर कार्यालय में कार्यरत सामान्य स्टेनोग्राफरों का वेतन इससे काफी कम बताया जाता है, फिर राजस्व विभाग ने यह वेतन निर्धारित किया? मत्स्य महासंघ ने किया? या किसी अन्य प्राधिकारी ने यदि कर्मचारी मूल रूप से मत्स्य महासंघ का था तो उसका इंक्रीमेंट राजस्व विभाग में कैसे जुड़ता गया?
सेवा पुस्तिका खुली…तो पूरा मामला खुल गया
वर्ष 2024 में मत्स्य महासंघ द्वारा सेवा पुस्तिका और निरंतरता प्रमाण-पत्र मांगने के बाद वर्षों पुरानी फाइलें फिर चर्चा में आ गईं,यहीं से सवाल उठा यदि सेवा पुस्तिका मूल विभाग की थी…तो वर्षों तक रही कहां? वार्षिक सत्यापन किसने किया? चरित्रावली किसने लिखी? छुट्टियां किस विभाग ने स्वीकृत कीं? वार्षिक मूल्यांकन किसके द्वारा हुआ?
24 साल में छुट्टी भी नहीं?
सूत्रों के अनुसार संबंधित कर्मचारी के बारे में यह भी चर्चा है कि उन्होंने वर्षों तक शायद ही कोई अवकाश लिया हो,यदि ऐसा है तो यह भी जांच का विषय है कि सेवा अभिलेखों में अवकाश, अर्जित अवकाश,चिकित्सा अवकाश और अन्य प्रविष्टियां किस प्रकार दर्ज हुईं।
कलेक्टर बदलते रहे…लेकिन व्यवस्था नहीं बदली
पिछले दो दशकों में सरकारें बदलीं…कलेक्टर बदले…कमिश्नर बदले…राजनीतिक नेतृत्व बदला…लेकिन जिस व्यवस्था पर आज सवाल उठ रहे हैं, वह जस की तस बनी रही, यही कारण है कि अब लोग व्यंग्य में कहते हैं— ‘कोरिया में मौसम बदलता है…सरकार बदलती है…लेकिन कुछ फाइलें नहीं बदलतीं। ‘
11 खबरें छपीं…लेकिन कार्रवाई कहां है?|
दैनिक घटती-घटना इस पूरे मामले पर लगातार 11 खबरें प्रकाशित कर चुका है,इन खबरों में प्रतिनियुक्ति के दस्तावेज, सेवा पुस्तिका,विभागीय पत्राचार, वेतन संबंधी प्रश्न,पदोन्नति,संविलियन,प्रशासनिक आदेश सभी पहलुओं को सामने रखा गया,लेकिन अब तक कोई विस्तृत आधिकारिक स्पष्टीकरण नहीं,कोई सार्वजनिक जांच रिपोर्ट नहीं, कोई तथ्यात्मक खंडन नहीं,यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में परेशानी क्या है?
क्या यह कर्मचारी प्रभावशाली था…या व्यवस्था कमजोर थी?
जिले में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं,कुछ लोग कहते हैं इतने वर्षों तक कोई व्यवस्था बिना मजबूत संरक्षण के नहीं चल सकती, कुछ लोग कहते हैं की यह किसी कर्मचारी का नहीं, पूरे सिस्टम का मामला है,इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं है, लेकिन यह जरूर सच है कि प्रशासनिक चुप्पी ने इन चर्चाओं को और हवा दी है।
अब सवाल केवल स्टेनो पर नहीं…पूरे सिस्टम पर है…
क्या नियम सबके लिए समान हैं?
क्या प्रतिनियुक्ति की समय-सीमा का पालन हुआ?
क्या वेतन निर्धारण नियमानुसार हुआ?
क्या पदोन्नति वैधानिक थी?
क्या सेवा पुस्तिका का नियमित सत्यापन हुआ?
क्या किसी सक्षम अधिकारी ने पूरे प्रकरण की समीक्षा की?

यह कोई साधारण स्टेनो है या प्रशासनिक ‘वीआईपी ‘?
जिले में अब लोग मजाक में कहते हैं कि यह कोई साधारण स्टेनो नहीं है, यह ऐसा स्टेनो है जिसके सामने कलेक्टर बदलते रहे…सरकारें बदलती रहीं…लेकिन व्यवस्था नहीं बदली, लोग यह भी कहते हैं कि शायद सरकारी सेवा नियमों में एक नया अध्याय जोड़ देना चाहिए की विशेष प्रभावशाली स्टेनो सेवा नियमावली, क्योंकि सामान्य कर्मचारी जहां प्रतिनियुक्ति की अवधि पूरी होने पर अपने मूल विभाग लौट जाते हैं, वहीं यहां प्रतिनियुक्ति ने दो दशक से भी अधिक समय पूरा कर लिया।
क्या नियम भी वीआईपी और सामान्य हो गए?
सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि यदि कोई सामान्य कर्मचारी तीन महीने की प्रतिनियुक्ति बढ़वाने की कोशिश करे तो उसे दर्जनों अनुमति पत्र लगाने पड़ते हैं, लेकिन यहां…वर्ष 2000 से… 2024 तक… व्यवस्था चलती रही, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कौन-सा ऐसा नियम था जो केवल इस मामले में लागू था? या फिर नियम एक तरफ थे और व्यवस्था दूसरी तरफ?
जवाब देना होगा…क्योंकि चुप्पी भी सवाल बन चुकी है…
लोकतंत्र में पत्रकारिता का दायित्व सवाल पूछना है, लेकिन शासन का दायित्व जवाब देना है, दैनिक घटती-घटना ने लगातार दस्तावेजों के आधार पर सवाल उठाए हैं, अब यह शासन और प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह रिकॉर्ड के आधार पर स्थिति स्पष्ट करे, यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है तो जनता के सामने तथ्य रखे जाएं, यदि कहीं प्रक्रियागत त्रुटियां हुई हैं तो उनकी निष्पक्ष जांच हो, क्योंकि अब सबसे बड़ा सवाल किसी कर्मचारी का नहीं, बल्कि शासन की चुप्पी का है, आखिर 11 खबरों के बाद भी सरकार और प्रशासन ने आंखें क्यों मूंद लीं? क्या यह केवल एक कर्मचारी का मामला है, या फिर ऐसा प्रशासनिक अध्याय, जिसकी फाइल खुलने से कई और परतें सामने आ सकती हैं?


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