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बिलासपुर@महिला कर्मचारियों को बड़ी राहत,संविदा और दैनिक वेतनभोगियों को भी मातृत्व अवकाश

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बिलासपुर,24 जून 2026। बिलासपुर हाईकोर्ट ने कामकाजी महिलाओं के मातृत्व अधिकारों को लेकर एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाया है। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि मातृत्व अवकाश और इससे जुड़े वित्तीय लाभ प्राप्त करना केवल नियमित सरकारी कर्मचारियों का विशेषाधिकार नहीं है। अब से दैनिक वेतनभोगी, मस्टर रोल पर कार्यरत कर्मी, संविदा कर्मचारी और कॉलेजों में सेवाएं दे रहे अतिथि व्याख्याताओं को भी मातृत्व अवकाश का समान अधिकार प्राप्त होगा। यह निर्णय कार्यस्थल पर होने वाले भेदभाव को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। यह कानूनी लड़ाई रायपुर की शिल्पी शुक्ला द्वारा शुरू की गई थी, जो नवंबर 2022 से शासकीय जे. योगानंदम छत्तीसगढ़ कॉलेज में अतिथि व्याख्याता के पद पर कार्यरत हैं। गर्भावस्था के दौरान उन्हें 13 सितंबर 2025 से मातृत्व अवकाश की स्वीकृति मिली थी, जिसके बाद वे 20 मार्च 2026 को पुनः अपने कर्तव्य पर लौट आईं। अवकाश की अवधि समाप्त होने के बाद जब उन्होंने अपने देय वेतन और लाभों के लिए आवेदन किया, तो उच्च शिक्षा विभाग ने उनके दावे को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि वे एक नियमित कर्मचारी नहीं हैं। विभाग का तर्क था कि संविदा या अतिथि प्रकृति की नौकरी में इस तरह के वित्तीय लाभ का कोई प्रावधान नहीं है। विभागीय इनकार के बाद शिल्पी शुक्ला ने इस अन्याय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार ने अपने पुराने तर्क दोहराते हुए कहा कि अतिथि व्याख्याता होने के कारण याचिकाकर्ता इन लाभों की पात्र नहीं हैं। इसके जवाब में याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मातृत्व लाभ किसी महिला का मानवीय, मौलिक और कानूनी अधिकार है, जिसे केवल नौकरी की प्रकृति का हवाला देकर छीना नहीं जा सकता। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णयों का भी हवाला दिया गया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि मातृत्व अवकाश का अधिकार कर्मचारी की सेवा श्रेणी या उसके पद की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता है।


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