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कोरिया @ पशुपालन विभाग में करोड़ों का खेल?

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  • कृत्रिम गर्भाधान और वत्सो पालन योजनाओं पर उठे गंभीर सवाल
  • कागजों में हजारों उपलब्धियां,जमीन पर नहीं दिख रहा लाभ;भौतिक सत्यापन की मांग तेज
  • कोरिया और एमसीबी जिले में भी अनियमितताओं की चर्चा, जांच हुई तो खुल सकती हैं कई परतें


-रवि सिंह-
कोरिया, 24 जून 2026 (घटती-घटना)।
किसानों और पशुपालकों की आय बढ़ाने तथा पशुधन विकास को गति देने के उद्देश्य से संचालित की जा रही प्रायवेट कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ता योजना एवं वत्सो पालन योजना अब सवालों के घेरे में आ गई हैं। पशुपालन विभाग कोरिया में इन योजनाओं के संचालन को लेकर गंभीर आरोप सामने आ रहे हैं,क्षेत्र में चर्चा है कि योजनाओं के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च तो दर्शाए गए,लेकिन धरातल पर अपेक्षित परिणाम दिखाई नहीं दे रहे हैं,ऐसे में विभागीय रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच अंतर को लेकर लोगों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।
सूत्रों के अनुसार जिले के विभिन्न विकासखंडों में कार्यरत निजी कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं द्वारा हर माह बड़ी संख्या में पशुओं के कृत्रिम गर्भाधान,गर्भधारण और वत्स (बछड़ा-बछिया) जन्म के आंकड़े विभाग को भेजे जाते रहे हैं, इन्हीं आंकड़ों के आधार पर योजनाओं की प्रगति रिपोर्ट तैयार की जाती है और शासन से प्राप्त राशि का भुगतान भी किया जाता है,लेकिन आरोप है कि इन आंकड़ों का कभी गंभीरता से भौतिक सत्यापन नहीं कराया गया।
आंकड़ों और वास्तविकता में अंतर की चर्चा…
जानकारों और स्थानीय स्तर पर जुड़े लोगों का कहना है कि कई क्षेत्रों में विभाग को भेजे गए आंकड़े वास्तविक स्थिति से मेल नहीं खाते,आरोप है कि जिन गांवों और क्षेत्रों में बड़ी संख्या में कृत्रिम गर्भाधान और पशु जन्म का दावा किया गया है,वहां उतनी संख्या में पशुधन ही उपलब्ध नहीं है, यदि इन दावों की निष्पक्ष जांच कराई जाए तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं, क्षेत्र में यह चर्चा भी है कि कई मामलों में कागजों में उपलब्धियां दिखाकर योजनाओं को सफल बताया गया, जबकि वास्तविक लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ अपेक्षित स्तर पर नहीं पहुंच सका,यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं बल्कि सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला भी बन सकता है।
जांच की मांग हुई तेज…
अब पूरे मामले की उच्चस्तरीय और स्वतंत्र जांच की मांग उठने लगी है,लोगों का कहना है कि यह केवल वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं है,बल्कि किसानों और पशुपालकों के अधिकारों से जुड़ा विषय है,यदि योजनाओं का लाभ वास्तविक हितग्राहियों तक नहीं पहुंचा और सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है,तो इसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए,अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या कागजों में दिखाई गई उपलब्धियां वास्तविक हैं या फिर करोड़ों रुपये की सरकारी राशि फर्जी आंकड़ों की भेंट चढ़ गई? इस सवाल का जवाब केवल निष्पक्ष और पारदर्शी जांच ही दे सकती है।
क्या बिना सत्यापन के स्वीकार किए गए आंकड़े?
सबसे गंभीर आरोप यह है कि प्रायवेट कृत्रिम गर्भाधान कार्यकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों को विभागीय अधिकारियों ने बिना पर्याप्त जांच और सत्यापन के स्वीकार कर लिया। इसके बाद उन्हीं आंकड़ों के आधार पर योजनाओं की सफलता का दावा किया गया और भुगतान की प्रक्रिया पूरी की गई, आरोप लगाने वाले लोगों का कहना है कि यदि विभाग के पास वास्तविक लाभार्थियों की सूची, पशुओं का विवरण और जन्मे वत्सों का रिकॉर्ड मौजूद है तो उसे सार्वजनिक जांच के लिए उपलब्ध कराया जाना चाहिए, इससे योजनाओं की पारदर्शिता भी बढ़ेगी और उठ रहे संदेह भी दूर होंगे।
एमसीबी जिले में भी उठ रहे सवाल…
सूत्रों का दावा है कि केवल कोरिया जिले में ही नहीं बल्कि मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर (एमसीबी) जिले में भी इसी प्रकार की अनियमितताओं की चर्चा है, बताया जा रहा है कि कई मामलों में फर्जी या संदिग्ध आंकड़ों के आधार पर योजनाओं का क्रियान्वयन दर्शाया गया और शासन से प्राप्त राशि खर्च दिखाकर फाइलों का निपटारा कर दिया गया, हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि अभी तक नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवालों ने विभाग की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगा दिया है।
गांव-गांव सत्यापन की मांग…
स्थानीय पशुपालकों, जनप्रतिनिधियों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने का सबसे प्रभावी तरीका भौतिक सत्यापन है, उनका सुझाव है कि विभाग की मासिक रिपोर्ट के आधार पर गांव-गांव जाकर लाभार्थियों, पशुओं और जन्मे वत्सों का सत्यापन कराया जाए, यदि रिकॉर्ड सही हैं तो विभाग की स्थिति स्पष्ट हो जाएगी, और यदि गड़बड़ी है तो दोषियों पर कार्रवाई का रास्ता खुलेगा।


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