दो साल से अधूरी पानी टंकी बनी ग्रामीणों और स्कूली बच्चों के लिए खतरा
करोड़ों की टंकी,लेकिन पानी नहीं,बांस-बल्ली अब भी लटकी, विभाग मौन
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,15 जून 2026 (घटती-घटना)। केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना का उद्देश्य हर घर तक स्वच्छ पेयजल पहुंचाना है, लेकिन कोरिया जिले के ग्राम पंचायत गेजी में यह योजना फिलहाल ग्रामीणों के लिए सुविधा से ज्यादा विडंबना का प्रतीक बनती जा रही है, करोड़ों रुपये की लागत से निर्मित पानी टंकी आज भी अधूरी पड़ी है और ग्रामीणों की प्यास बुझाने के बजाय सरकारी कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रही है। ग्रामीणों का आरोप है कि लगभग दो वर्ष पहले शुरू हुआ निर्माण कार्य आज तक पूरी तरह पूरा नहीं हो सका है, हालात यह हैं कि जिस टंकी को गांव के लोगों को नियमित पेयजल उपलब्ध कराना था, वह आज एक विशालकाय ‘शोपीस’ बनकर खड़ी है, ऊपर से विभागीय दावे विकास की गंगा बहाने के हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि टंकी के निर्माण में लगाई गई बांस-बल्ली और सेंटरिंग तक नहीं हटाई गई है।
दो साल बाद भी लटकी है सेंटरिंग, क्या यही है निर्माण गुणवत्ता?
ग्रामीण बताते हैं कि निर्माण कार्य के दौरान टंकी की ढलाई के लिए लगाए गए बांस-बल्ली आज तक नहीं हटाए गए हैं, दो वर्षों से धूप, बारिश और मौसम की मार झेल रहे ये बांस अब सड़ने लगे हैं और कई जगह टूटकर नीचे लटक रहे हैं, सवाल यह है कि यदि निर्माण कार्य पूरा हो चुका था और भुगतान भी हो गया था तो फिर सेंटरिंग क्यों नहीं हटाई गई? क्या ठेकेदार भूल गया? क्या विभागीय अधिकारियों ने कभी निरीक्षण नहीं किया? या फिर फाइलों में टंकी पूरी बन गई और जमीन पर अधूरी छोड़ दी गई? ग्रामीणों का कहना है कि बांस-बल्ली किसी भी समय टूटकर गिर सकती है और बड़ा हादसा हो सकता है।
टंकी के नीचे गड्ढे, सुरक्षा भगवान भरोसे-केवल टंकी ही नहीं, उसके आसपास का क्षेत्र भी उपेक्षा की कहानी बयां करता है, ग्रामीणों के अनुसार टंकी के नीचे समतलीकरण का कार्य नहीं किया गया है, जगह-जगह गड्ढे बने हुए हैं, जो दुर्घटना का कारण बन सकते हैं, बरसात के दौरान इन गड्ढों में पानी भरने से स्थिति और खतरनाक हो सकती है, यानी ऊपर से सड़ी हुई सेंटरिंग और नीचे गहरे गड्ढे—बीच में आम ग्रामीण, शायद यही है ‘विकास मॉडल’ का नया संस्करण।
जल जीवन मिशन या कागजी जीवन मिशन?- देशभर में जल जीवन मिशन को ग्रामीण क्षेत्रों की सबसे महत्वपूर्ण योजनाओं में गिना जाता है, इसके लिए केंद्र और राज्य सरकारें हजारों करोड़ रुपये खर्च कर रही हैं, लेकिन गेजी की यह टंकी एक बड़ा सवाल खड़ा करती है क्या योजनाएं वास्तव में जनता के लिए बन रही हैं या केवल आंकड़ों के लिए? क्योंकि यदि दो साल बाद भी टंकी चालू नहीं हो पाई, निर्माण अधूरा है, सुरक्षा व्यवस्था नहीं है और ग्रामीणों को पानी नहीं मिल रहा, तो फिर योजना की सफलता का दावा किस आधार पर किया जा रहा है?
शिकायतें हुईं,लेकिन कार्रवाई नहीं…
ग्रामीणों का कहना है कि इस संबंध में कई बार शिकायतें की जा चुकी हैं, अधिकारियों को अवगत कराया गया, जनप्रतिनिधियों ने भी मामला उठाया, लेकिन परिणाम शून्य रहा, हर बार आश्वासन मिला, लेकिन सुधार नहीं हुआ, ऐसा लगता है कि शिकायतों की फाइलें भी शायद उसी टंकी की तरह अधूरी अवस्था में कहीं पड़ी हुई हैं।
जवाब देने से बच रहे अधिकारी?
ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का आरोप है कि विभागीय अधिकारी जानकारी देने में भी टालमटोल कर रहे हैं,जब निर्माण कार्य की स्थिति पूछी जाती है तो स्पष्ट जवाब नहीं मिलता, जब गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं तो जांच की बात कही जाती है,जब समयसीमा पूछी जाती है तो कोई निश्चित तिथि नहीं बताई जाती, ऐसे में लोगों के मन में संदेह पैदा होना स्वाभाविक है।
सबसे बड़ा सवाल-जिम्मेदार कौन?
यदि निर्माण अधूरा है तो जिम्मेदार कौन? यदि सेंटरिंग नहीं हटाई गई तो जिम्मेदार कौन? यदि बच्चों की सुरक्षा खतरे में है तो जिम्मेदार कौन? यदि भुगतान हो चुका है तो अधूरे काम का भुगतान किस आधार पर हुआ? और यदि भुगतान नहीं हुआ तो दो साल से काम रुका क्यों है? इन सवालों का जवाब जनता जानना चाहती है।
ग्रामीणों की मांग…
निर्माण कार्य की तकनीकी जांच कराई जाए।
गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच हो।
अधूरे कार्यों को तत्काल पूरा कराया जाए।
सड़ी हुई बांस-बल्ली और सेंटरिंग तुरंत हटाई जाए।
स्कूल के बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
दोषी ठेकेदार और जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
टंकी को जल्द से जल्द चालू कर ग्रामीणों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराया जाए।
स्कूल के बच्चों पर मंडरा रहा खतरा
मामला और गंभीर इसलिए हो जाता है क्योंकि पानी टंकी के ठीक समीप स्कूल स्थित है,स्कूल खुलने वाला है और प्रतिदिन सैकड़ों बच्चे इसी रास्ते से आना-जाना करेंगे,यदि सड़ी हुई बांस-बल्ली अचानक टूटकर गिर जाए या कोई हिस्सा नीचे आ जाए तो उसकी चपेट में मासूम बच्चे आ सकते हैं, ग्रामीणों का कहना है कि विभाग शायद किसी दुर्घटना का इंतजार कर रहा है,क्योंकि शिकायतों के बावजूद आज तक न तो सेंटरिंग हटाई गई और न ही सुरक्षा के कोई इंतजाम किए गए,ऐसा लगता है कि जिम्मेदार अधिकारी यह मानकर बैठे हैं कि जब तक कोई हादसा नहीं होगा,तब तक कार्रवाई की जरूरत नहीं है।
सीढि़यां भी अधूरी,फिर कैसे होगा रखरखाव?
टंकी के ऊपर पहुंचने के लिए बनाई जाने वाली सीढि़यां भी आज तक अधूरी हैं,आश्चर्य की बात यह है कि ग्रामीणों के अनुसार निर्माण कार्य को पूर्ण दिखाकर राशि का आहरण भी कर लिया गया,यदि यह बात सही है तो सवाल उठता है कि आखिर अधूरी सीढि़यों वाली टंकी को पूर्ण कैसे घोषित कर दिया गया? क्या गुणवत्ता परीक्षण हुआ था? क्या किसी अधिकारी ने निर्माण स्थल का निरीक्षण किया था? क्या केवल कागजों में ही निर्माण पूरा माना गया? यदि सीढि़यां अधूरी हैं तो भविष्य में टंकी के रखरखाव और मरम्मत का कार्य कैसे होगा?
टंकी में पानी से ज्यादा सवाल भरे हैं…
गेजी की पानी टंकी आज विकास की कहानी कम और लापरवाही की मिसाल ज्यादा बन चुकी है,दो साल बाद भी अधूरी सीढि़यां, सड़ती हुई सेंटरिंग,गड्ढों से घिरा परिसर,स्कूल के बच्चों पर खतरा,और विभागीय चुप्पी, ऐसे में यह कहना गलत नहीं होगा कि यहां ‘जल जीवन मिशन’ फिलहाल ‘जल इंतजार मिशन’ बन गया है,ग्रामीणों को अब सिर्फ पानी का इंतजार नहीं है,बल्कि उस दिन का इंतजार भी है जब जिम्मेदार अधिकारी फाइलों से निकलकर जमीन पर आएंगे और देखेंगे कि करोड़ों की लागत से बनी यह टंकी आखिर जनता की सेवा कर रही है या केवल सरकारी उपलब्धियों की सूची में एक और आंकड़ा बनकर खड़ी है।
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