- 1941 किलो गांजा पकड़ा,लेकिन सरहद तक पहुंचा कैसे?
- बसंतपुर पुलिस की अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई,10 करोड़ का गांजा,50 लाख का ट्रक जब्त,दो तस्कर गिरफ्तार

-संवाददाता-
बलरामपुर/बसंतपुर,12 जून 2026 (घटती-घटना)। बलरामपुर जिले की बसंतपुर पुलिस ने मादक पदार्थों की तस्करी के खिलाफ अब तक की सबसे बड़ी कार्रवाई करते हुए 1941.110 किलोग्राम गांजा बरामद किया है। पुलिस ने इस मामले में उत्तर प्रदेश के दो अंतरराज्यीय तस्करों को गिरफ्तार किया है तथा तस्करी में प्रयुक्त करीब 50 लाख रुपए कीमत का टाटा ट्रक भी जब्त किया है। बरामद गांजा की अनुमानित कीमत लगभग 10 करोड़ रुपए बताई जा रही है। कुल जब्त मशरूका की कीमत साढ़े 10 करोड़ रुपए से अधिक आंकी गई है। पुलिस की यह कार्रवाई निश्चित रूप से सराहनीय है,लेकिन इसके साथ ही कई गंभीर सवाल भी खड़े हो गए हैं,जिनका जवाब जनहित में मिलना आवश्यक है।
देर रात तकनीकी
सूचना पर हुई कार्रवाई…
पुलिस के अनुसार पूर्व में दर्ज एनडीपीएस प्रकरण की विवेचना के दौरान कुछ महत्वपूर्ण तकनीकी सूचनाएं प्राप्त हुई थीं। इसी आधार पर 11-12 जून की दरमियानी रात थाना प्रभारी निरीक्षक जितेन्द्र सोनी के नेतृत्व में टीम ने थाना क्षेत्र में निगरानी बढ़ाई। रात्रि लगभग 2.30 से 3 बजे के बीच टाटा ट्रक क्रमांक आरजे-14-जी-9078 को रोककर जांच की गई। तलाशी के दौरान ट्रक से 62 पैकेटों में छिपाकर रखा गया 1941 किलो 110 ग्राम गांजा बरामद हुआ। मौके से सहारनपुर निवासी लोकेश शर्मा (46 वर्ष) और मुजफ्फरनगर निवासी आमिष अंसारी (23 वर्ष) को गिरफ्तार किया गया। दोनों आरोपियों के विरुद्ध एनडीपीएस एक्ट के तहत मामला दर्ज कर न्यायिक रिमांड पर भेज दिया गया है।
छह महीने में दूसरी बड़ी बरामदगी : यह पहला मामला नहीं है जब बसंतपुर पुलिस ने इतनी बड़ी कार्रवाई की हो। 29 दिसंबर 2025 को भी थाना बसंतपुर पुलिस ने एक टाटा ट्रक से 1198.460 किलोग्राम गांजा बरामद किया था। उस समय गांजा को नारियल भूसी के भीतर छिपाकर उड़ीसा से राजस्थान ले जाया जा रहा था। उस मामले में भी दो आरोपियों की गिरफ्तारी हुई थी। लगातार दूसरी बार इतनी बड़ी मात्रा में गांजा पकड़े जाने से यह संकेत मिलता है कि उत्तर प्रदेश-छत्तीसगढ़ सीमा क्षेत्र तस्करों के लिए महत्वपूर्ण ट्रांजिट कॉरिडोर के रूप में इस्तेमाल किया जा रहा है।
नशे के कारोबार पर चिंता बढ़ी : सरगुजा संभाग और सीमावर्ती क्षेत्रों में पिछले कुछ वर्षों में मादक पदार्थों की तस्करी के मामले लगातार सामने आए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि तस्करी नेटवर्क की जड़ तक नहीं पहुंचा गया तो केवल खेप पकड़ने से समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं होगा। युवाओं तक नशे की पहुंच समाज और कानून व्यवस्था दोनों के लिए गंभीर चुनौती बनती जा रही है।
पुलिस की सफलता,लेकिन व्यवस्था के लिए चेतावनी भी : पुलिस महानिरीक्षक सरगुजा दीपक कुमार झा और पुलिस अधीक्षक बलरामपुर वैभव बैंकर के निर्देशन में हुई यह कार्रवाई निस्संदेह बड़ी सफलता मानी जा रही है। तकनीकी निगरानी और पुलिस टीम की सतर्कता से करोड़ों रुपए का मादक पदार्थ बाजार तक पहुंचने से पहले पकड़ लिया गया। लेकिन यह घटना एक चेतावनी भी है कि नशे का कारोबार करने वाले नेटवर्क अभी भी सक्रिय हैं और लंबी दूरी तक अवैध खेप पहुंचाने की क्षमता रखते हैं। जनहित का सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि 10 करोड़ रुपए का गांजा तो पकड़ लिया गया,लेकिन क्या जांच उन लोगों तक भी पहुंचेगी जो पर्दे के पीछे बैठकर इस पूरे कारोबार का संचालन कर रहे हैं? यदि ऐसा हुआ, तभी इस कार्रवाई को तस्करी नेटवर्क पर वास्तविक और निर्णायक प्रहार माना जाएगा।
सबसे बड़ा सवालः इतनी बड़ी खेप रास्ते में कहां-कहां से गुजरी?
पुलिस का दावा है कि गांजा उड़ीसा से उत्तर प्रदेश ले जाया जा रहा था। यदि यह तथ्य सही है तो लगभग दो हजार किलो गांजा से भरा ट्रक कई जिलों और सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर बसंतपुर तक पहुंच गया।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है…
– क्या रास्ते में कहीं भी प्रभावी जांच नहीं हुई?
– विभिन्न राज्यों की सीमाओं पर स्थापित चेक पोस्ट क्या कर रहे थे?
– क्या तस्करों ने सुरक्षा तंत्र की कमजोरियों का फायदा उठाया?
– या फिर तस्करी नेटवर्क इतना संगठित हो चुका है कि वह लगातार जांच एजेंसियों को चुनौती दे रहा है?
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी मात्रा में मादक पदार्थों का परिवहन किसी एक या दो व्यक्तियों का काम नहीं हो सकता। इसके पीछे एक संगठित अंतरराज्यीय नेटवर्क सक्रिय होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
क्या केवल चालक और सहचालक तक सीमित रह जाएगी जांच?
एनडीपीएस के अधिकांश मामलों में अक्सर वाहन चालक और परिवहन से जुड़े लोग गिरफ्त में आ जाते हैं, लेकिन असली सरगना,फाइनेंसर और सप्लाई चेन संचालक कानून की पहुंच से दूर रह जाते हैं।
इस मामले में भी कुछ अहम प्रश्न हैं…
– गांजा उपलब्ध कराने वाला गिरोह कौन है?
– वास्तविक खरीदार कौन था?
– परिवहन की पूरी व्यवस्था किसने की?
– करोड़ों रुपए की खेप के पीछे फंडिंग किसकी थी?
– क्या इस मामले का संबंध दिसंबर 2025 में पकड़ी गई खेप से है?
– क्या दोनों मामलों में कोई समान नेटवर्क काम कर रहा था?
इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे।
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