एमसीबी जिले में निजी बस संचालन पर उठे गंभीर सवाल, नियमों की धज्जियां या जिम्मेदारों की चुप्पी?
-संवाददाता-
एमसीबी,10 जून 2026 (घटती-घटना)। सड़क परिवहन व्यवस्था किसी भी क्षेत्र की जीवनरेखा मानी जाती है, आम नागरिकों की दैनिक आवाजाही, विद्यार्थियों की पढ़ाई, व्यापारियों का कारोबार और ग्रामीण अंचलों की आर्थिक गतिविधियां काफी हद तक सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था पर निर्भर करती हैं,लेकिन जब यही व्यवस्था नियमों से नहीं बल्कि मनमर्जी से संचालित होने लगे,तब सवाल केवल परिवहन सेवाओं पर नहीं बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली पर उठने लगते हैं। मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर जिले में इन दिनों निजी बसों के संचालन को लेकर कुछ ऐसे ही सवाल खड़े हो रहे हैं, आरोप हैं कि कई निजी बस संचालक जिस मार्ग के लिए परमिट प्राप्त किए हुए हैं,उस मार्ग पर संचालन करने के बजाय दूसरे मार्गों पर बसें चला रहे हैं,इतना ही नहीं,जिन वाहनों के नाम पर परमिट स्वीकृत है, उनकी जगह दूसरे वाहनों के संचालन की चर्चाएं भी क्षेत्र में आम हो चुकी हैं, यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह केवल नियमों का उल्लंघन नहीं बल्कि यात्रियों की सुरक्षा, सरकारी राजस्व और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा गंभीर मामला है।
परमिट एक बस का, सड़क पर दूसरी बस
मामले का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू यह बताया जा रहा है कि कुछ स्थानों पर जिस वाहन के नाम पर परमिट जारी है, उसके स्थान पर दूसरी बसों का संचालन किया जा रहा है, यह केवल कागजी अनियमितता नहीं है, किसी वाहन का बीमा, फिटनेस, कर भुगतान, परमिट और सुरक्षा संबंधी सभी दस्तावेज उसी वाहन के लिए मान्य होते हैं, यदि उसकी जगह दूसरा वाहन सड़क पर उतरता है तो दुर्घटना की स्थिति में कानूनी जटिलताएं खड़ी हो सकती हैं, ऐसी स्थिति में यात्रियों के बीमा दावों, मुआवजे और जिम्मेदारी निर्धारण जैसे मुद्दे भी विवाद का विषय बन सकते हैं।
परिवहन विभाग की भूमिका पर सवाल- सबसे बड़ा प्रश्न परिवहन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर खड़ा हो रहा है, यदि बसें वर्षों से दूसरे मार्गों पर संचालित हो रही हैं तो क्या विभाग को इसकी जानकारी नहीं है? यदि जानकारी नहीं है तो यह विभागीय निगरानी की विफलता मानी जाएगी, और यदि जानकारी होने के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं हुई है तो फिर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्षेत्र में लोग यह चर्चा करते दिखाई देते हैं कि बिना विभागीय जानकारी के इस प्रकार का संचालन लंबे समय तक संभव नहीं हो सकता, यही कारण है कि अब लोगों की उंगलियां केवल बस संचालकों पर ही नहीं बल्कि निगरानी करने वाले तंत्र पर भी उठने लगी हैं।
कहीं प्रतिस्पर्धा खत्म करने का खेल तो नहीं?- कुछ जानकारों का मानना है कि कई बार लाभदायक मार्गों पर कब्जा बनाए रखने के लिए भी इस प्रकार की गतिविधियां सामने आती हैं, यदि किसी बस संचालक को किसी दूसरे मार्ग पर अधिक यात्री और अधिक आमदनी मिल रही है तो वह स्वीकृत मार्ग छोड़कर वहां संचालन शुरू कर देता है, इससे उन बस संचालकों को नुकसान होता है जो नियमों का पालन करते हुए निर्धारित मार्गों पर सेवा दे रहे होते हैं। धीरे-धीरे यह स्थिति स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को खत्म कर देती है और नियम मानने वाले संचालक आर्थिक नुकसान झेलने लगते हैं।
यात्रियों की सुरक्षा सबसे बड़ा मुद्दा
इस पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यात्रियों की सुरक्षा का है, जब कोई बस निर्धारित नियमों के अनुरूप संचालित होती है तो उसकी जवाबदेही स्पष्ट रहती है, लेकिन यदि बस, रूट और दस्तावेजों के बीच ही विसंगति हो जाए तो दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना कठिन हो जाता है, यात्रियों को यह जानने का अधिकार है कि जिस वाहन में वे सफर कर रहे हैं, वह कानूनी रूप से उसी मार्ग पर संचालित होने के लिए अधिकृत है या नहीं, परिवहन नियम केवल सरकारी फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए नहीं बनाए गए हैं, उनका उद्देश्य यात्रियों की सुरक्षा और व्यवस्था की पारदर्शिता सुनिश्चित करना है।
परमिट की शर्तें आखिर होती क्यों हैं?-
परिवहन विभाग किसी भी वाहन को परमिट जारी करने से पहले उसकी फिटनेस,क्षमता,रूट की आवश्यकता,यात्री भार और अन्य तकनीकी पहलुओं का परीक्षण करता है,इसके बाद एक निर्धारित मार्ग के लिए अनुमति दी जाती है ताकि उस क्षेत्र के यात्रियों को नियमित और सुरक्षित परिवहन सुविधा मिल सकेलेकिन यदि कोई वाहन स्वीकृत मार्ग छोड़कर दूसरे मार्ग पर दौड़ने लगे तो फिर परमिट प्रणाली का पूरा उद्देश्य ही समाप्त हो जाता है,सवाल यह है कि यदि बस मालिक अपनी सुविधा के अनुसार मार्ग बदलने लगेंगे तो फिर परिवहन विभाग द्वारा निर्धारित नियमों और शर्तों का औचित्य क्या रह जाएगा?
इन मार्गों को लेकर उठ रहे हैं सवाल
क्षेत्र में चर्चा का विषय बने कुछ मार्गों में मनेंद्रगढ़-उधनापुर-पोड़ी बचरा-प्रेमनगर-बैकुंठपुर-जरौधा तथा बैकुंठपुर-पोड़ी बचरा-चिरमी, प्रेमनगर-खड़गवां-मनेंद्रगढ़ मार्ग शामिल बताए जा रहे हैं,स्थानीय लोगों का आरोप है कि कई बसें अपने स्वीकृत मार्गों पर नियमित संचालन नहीं कर रही हैं, बल्कि अधिक लाभ वाले मार्गों को चुनकर वहां सेवाएं दे रही हैं,परिणाम यह हो रहा है कि जिन क्षेत्रों के लिए परमिट स्वीकृत किए गए थे,वहां के यात्रियों को परेशानी उठानी पड़ रही है जबकि अन्य मार्गों पर बसों की संख्या आवश्यकता से अधिक दिखाई दे रही है, यदि ऐसा हो रहा है तो यह सीधे-सीधे परिवहन नीति और यात्री हितों के विपरीत माना जाएगा।
जांच की मांग तेज
क्षेत्र के नागरिकों, जनप्रतिनिधियों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि जिले में संचालित सभी निजी बसों की विशेष जांच कराई जाए,जांच में निम्न बिंदुओं को शामिल किए जाने की मांग की जा रही है—बस का वास्तविक परमिट किस मार्ग के लिए जारी है,वर्तमान में बस किस मार्ग पर संचालित हो रही है, स्वीकृत वाहन और संचालित वाहन एक ही हैं या नहीं,वाहन की फिटनेस,बीमा और कर संबंधी दस्तावेज अद्यतन हैं या नहीं,निर्धारित शर्तों का पालन किया जा रहा है या नहीं, लोगों का कहना है कि जांच केवल औपचारिकता न होकर जमीनी स्तर पर की जानी चाहिए ताकि वास्तविक स्थिति सामने आ सके।
प्रशासन के लिए परीक्षा की घड़ी
यह मामला अब केवल बस संचालन तक सीमित नहीं रह गया है, यह प्रशासनिक जवाबदेही और कानून के समान अनुपालन का भी प्रश्न बन चुका है,यदि नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई नहीं होती तो इससे यह संदेश जाएगा कि व्यवस्था में प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम हैं और आम लोगों के लिए अलग, दूसरी ओर यदि निष्पक्ष जांच कर दोषियों पर कार्रवाई की जाती है तो इससे जनता का विश्वास प्रशासन और परिवहन विभाग दोनों पर मजबूत होगा।
अब जवाब का इंतजार
एमसीबी जिले में परिवहन व्यवस्था को लेकर उठे इन सवालों का जवाब अब प्रशासन और परिवहन विभाग को देना है, क्षेत्र के लोगों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या नियमों को ताक पर रखकर संचालित हो रही बसों की जांच होगी, क्या जिम्मेदारों की जवाबदेही तय होगी और क्या यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस कदम उठाए जाएंगे? फिलहाल सड़क पर दौड़ती बसों के साथ-साथ एक सवाल भी दौड़ रहा है—क्या परमिट की शर्तें केवल कागजों तक सीमित हैं, या फिर उनका पालन कराने के लिए भी कोई जिम्मेदार है?
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