



- टूटा पुल, अधूरा रपटा और बरसात की दस्तक,आखिर जिम्मेदार कौन? विभाग,ठेकेदार या जनप्रतिनिधि?
- गोबरी नदी में विकास की दो रफ्तार,करोड़ों का पुल तेज,जनता का रपटा अधूरा
- बरसात सिर पर,रपटा अधूरा—आखिर किसके भरोसे रहेगा आवागमन?
- टूटा पुल, अधूरा रपटा और मौन व्यवस्था,11 महीने बाद भी नहीं मिला समाधान
- जहां करोड़ों की मलाई,वहीं अधिकारियों की परछाई,15 लाख का रपटा भगवान भरोसे
- एक दिन काम,दस दिन आराम,गोबरी नदी रपटा पुल निर्माण पर उठे सवाल
- रपटा पुल की चाल कछुए जैसी, अधिकारियों की गाड़ी फर्राटे जैसी
- जनता पूछ रही—पुल पहले बनेगा या फिर अगला मानसून आ जाएगा?
- टूटा पुल देख रो रहे ग्रामीण,करोड़ों का पुल देख मुस्कुरा रहे जिम्मेदार
- नेता आए, फोटो खिंचाए,आश्वासन दे गए—रपटा आज भी अधूरा रह गया
- लापरवाही किसकी? विभाग की, ठेकेदार की या सिर्फ जनता की किस्मत खराब है?
-रवि सिंह-
सूरजपुर/कोरिया, 01 जून 2026 (घटती-घटना)। गोबरी नदी पर टूटे पुल की कहानी अब केवल एक निर्माण कार्य की देरी की कहानी नहीं रह गई है, बल्कि यह सरकारी तंत्र,ठेकेदारी व्यवस्था,विभागीय उदासीनता और राजनीतिक प्राथमिकताओं की ऐसी जीवंत मिसाल बन गई है, जिसे देखकर ग्रामीणों के मन में एक ही सवाल उठ रहा है आखिर उनकी परेशानी का जिम्मेदार कौन है? विभाग, ठेकेदार, जनप्रतिनिधि या फिर वह व्यवस्था जो हर निरीक्षण के बाद आश्वासन देती है लेकिन जमीन पर कुछ बदलता नहीं, करीब 11 महीने पहले गोबरी नदी पर बना पुल क्षतिग्रस्त हुआ था, उस समय दावा किया गया था कि तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था बनाई जाएगी और स्थायी पुल निर्माण की दिशा में तेजी से कदम उठाए जाएंगे, लेकिन आज जब मानसून की आहट सुनाई देने लगी है,तब भी स्थिति लगभग वैसी ही है जैसी पुल टूटने के समय थी, फर्क सिर्फ इतना है कि तब लोगों के पास उम्मीद थी, अब निराशा है।

गोबरी नदी पर विकास की दो तस्वीरें
वही उसी गोबरी नदी इस समय विकास की दो अलग-अलग तस्वीरें दिखा रही है, पहली तस्वीर बिरमताल से उमेशपुर मार्ग पर बन रहे लगभग 3 करोड़ 60 लाख रुपये के पुल की है, यहां मशीनें चल रही हैं, अधिकारी निरीक्षण कर रहे हैं, ठेकेदार सक्रिय दिखाई देता है और काम की प्रगति भी नजर आती है, दूसरी तस्वीर उसी नदी पर बने टूटे हुए पुराने पुल और उसके स्थान पर बनाए जा रहे 15 लाख रुपये के रपटा पुल की है,यहां महीनों से काम रेंग रहा है, कभी मजदूर दिखते हैं तो कई दिनों तक काम बंद रहता है, कभी पाइप गिरा दिए जाते हैं तो कई सप्ताह तक कोई गतिविधि दिखाई नहीं देती,ग्रामीणों का कहना है कि लगता है जैसे करोड़ों का पुल विभाग और ठेकेदार दोनों का प्रिय प्रोजेक्ट है, जबकि 15 लाख का रपटा केवल मजबूरी में लिया गया काम है।
मानसून की दस्तक और बढ़ती चिंता…
सबसे बड़ी चिंता अब आने वाले मानसून को लेकर है, मौसम में बदलाव शुरू हो चुका है। बीच-बीच में बारिश भी हो रही है,यदि बरसात शुरू होने से पहले रपटा पुल तैयार नहीं हुआ तो पूरा क्षेत्र फिर से संपर्कहीन हो सकता है,लोगों को डर है कि पिछले 11 महीनों की परेशानी आने वाले महीनों में और बढ़ सकती है।
पत्रों में कार्रवाई,जमीन पर इंतजार
विभागीय रिकॉर्ड में शायद बहुत सी कार्रवाई हो चुकी होगी, पत्र जारी हुए होंगे, स्पष्टीकरण मांगे गए होंगे,निरीक्षण रिपोर्ट तैयार हुई होंगी,लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि पुल अभी भी अधूरा है, जनता को पत्र नहीं चाहिए,पुल चाहिए,ग्रामीणों को फाइलों की भाषा नहीं समझ आती,उन्हें सिर्फ इतना समझ आता है कि बरसात आने वाली है और उनका रास्ता अभी भी अधूरा पड़ा है।
सबसे बड़ा सवाल अब भी बाकी…
11 महीने पहले पुल टूटा था, 11 महीने बाद भी वैकल्पिक रपटा अधूरा है,एक ही ठेकेदार के पास दोनों काम हैं,करोड़ों वाले पुल पर तेजी है, लेकिन जनता की तत्काल जरूरत वाला काम अब भी अधूरा है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर गोबरी नदी पर प्राथमिकता किसे दी जा रही है—जनता को या बजट को? और यदि इस बार भी बरसात में आवागमन बंद हुआ,लोग फंसे,मरीज रास्ते में परेशान हुए और बच्चे स्कूल नहीं पहुंच पाए,तो जिम्मेदारी किसकी तय होगी? क्योंकि नदी तो हर साल बरसात में बढ़ती है,लेकिन इस बार सवाल पानी से ज्यादा उस व्यवस्था पर उठ रहे हैं जो 11 महीने में भी लोगों के लिए एक वैकल्पिक रास्ता तैयार नहीं कर पाई।
एक ही ठेकेदार,लेकिन दो अलग-अलग रफ्तार…
सबसे बड़ा सवाल यह है कि दोनों कार्यों की जिम्मेदारी एक ही ठेकेदार को दी गई है,जब 3.60 करोड़ रुपये वाले पुल पर काम लगातार चल सकता है तो फिर 15 लाख रुपये के रपटा पुल पर काम महीनों तक क्यों अटका रहता है? स्थानीय लोगों का आरोप है कि रपटा पुल पर काम की स्थिति ऐसी है कि एक दिन मजदूर पहुंचते हैं और अगले दस दिन तक निर्माण स्थल पर सन्नाटा पसरा रहता है फिर जब कहीं से दबाव बनता है या खबर प्रकाशित होती है तो दोबारा थोड़ी गतिविधि दिखाई देती है, इस तरह काम करते-करते दो महीने से अधिक समय निकल चुका है और रपटा अब भी अधूरा है।
11 महीने में नहीं बन पाया वैकल्पिक पुल,तो स्थायी पुल कब बनेगा?
यही वह सवाल है जो आज हर ग्रामीण पूछ रहा है, एक वैकल्पिक रपटा पुल, जिसकी लागत केवल 15 लाख रुपये है और जिसका उद्देश्य केवल लोगों का आवागमन बहाल करना है, यदि 11 महीने में तैयार नहीं हो पाया तो करोड़ों रुपये की लागत वाला स्थायी पुल आखिर कब बना शुरू होगा? लोगों का कहना है कि यदि अस्थायी समाधान में ही इतना समय लग रहा है तो स्थायी समाधान के लिए शायद वर्षों इंतजार करना पड़े, स्थिति यह है कि स्थायी पुल का सपना भविष्य में है और वर्तमान का सहारा बनने वाला रपटा अभी तक अधूरा पड़ा है।
एसडीओ के निरीक्षण भी सवालों के घेरे में…
ग्रामीणों का आरोप है कि विभागीय अधिकारियों की प्राथमिकताएं भी स्पष्ट दिखाई देती हैं,जहां करोड़ों रुपये वाला पुल बन रहा है वहां अधिकारी स्वयं पहुंचकर निरीक्षण कर रहे हैं, लेकिन रपटा पुल के मामले में केवल पत्राचार और स्पष्टीकरण तक सीमित कार्रवाई दिखाई दे रही है, सूत्रों के अनुसार विभाग द्वारा नए इंजीनियर को जिम्मेदारी सौंपे जाने और ठेकेदार को पत्र जारी करने जैसी औपचारिकताएं की गई हैं,लेकिन ग्रामीण पूछ रहे हैं कि यदि पत्रों से पुल बनते तो देश में निर्माण कार्यों की कोई समस्या ही नहीं होती।
क्या टूटे-फूटे ह्यूम पाइप से बनेगा रपटा?
रपटा पुल निर्माण में उपयोग की जा रही सामग्री को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं, स्थानीय लोगों का दावा है कि निर्माण स्थल पर जो ह्यूम पाइप लाए गए हैं,वे नए नहीं लगते, कई पाइप टूटे-फूटे और पहले से उपयोग किए हुए दिखाई दे रहे हैं, ग्रामीणों का आरोप है कि किसी अन्य निर्माण स्थल पर उपयोग किए गए या बच गए पाइपों को यहां लाकर लगाया जा रहा है ताकि लागत कम की जा सके, यदि यह आरोप सही हैं तो यह केवल निर्माण गुणवत्ता का नहीं बल्कि सार्वजनिक धन के उपयोग का भी गंभीर मामला है, सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पहली तेज बारिश में यह रपटा बह गया तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
ग्रामीणों की जिंदगी बन गई रोज की परीक्षा
गोबरी नदी का पुल केवल एक संरचना नहीं था बल्कि दो जिलों के बीच जीवनरेखा था,इसके टूटने के बाद लोग लंबा और महंगा रास्ता अपनाने को मजबूर हैं, जो दूरी पहले कुछ मिनटों में तय हो जाती थी, उसके लिए अब 15 से 20 किलोमीटर अतिरिक्त सफर करना पड़ रहा है, छात्रों को स्कूल पहुंचने में परेशानी हो रही है, किसानों को अपनी उपज बाजार तक ले जाने में अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ रहा है, मरीजों को अस्पताल पहुंचाने में समय लग रहा है, कई ग्रामीण बताते हैं कि सुबह घर से निकलने वाला व्यक्ति शाम तक रास्ते की समस्या से जूझता रहता है।
शिवपुर मार्ग भी बना खतरे का रास्ता
समस्या केवल टूटे पुल तक सीमित नहीं है, नए पुल निर्माण के दौरान जो वैकल्पिक मार्ग बनाया गया है, उसकी स्थिति भी चिंताजनक बताई जा रही है, ग्रामीणों का आरोप है कि वहां पर्याप्त गिट्टी और मुरुम नहीं डाली गई है, परिणामस्वरूप दोपहिया वाहन चालक लगातार फिसल रहे हैं और दुर्घटनाएं हो रही हैं, बरसात शुरू होने के बाद इस मार्ग की स्थिति और खराब होने की आशंका है।
जनप्रतिनिधियों की चुप्पी भी चर्चा में…
जब पुल टूटा था तब कई जनप्रतिनिधियों ने मौके का दौरा किया था, तस्वीरें खिंची थीं,बयान दिए गए थे और जल्द समाधान का भरोसा दिलाया गया था,लेकिन समय बीतने के साथ यह मुद्दा भी राजनीतिक प्राथमिकताओं की सूची से नीचे खिसकता गया,ग्रामीणों का कहना है कि अब कोई जनप्रतिनिधि इस विषय पर खुलकर बात नहीं करता,न कोई समय सीमा बताई जा रही है और न ही कोई जवाबदेही तय हो रही है।
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