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रायपुर@स्वागत पीछे से,व्यवस्था नीचे से और गुस्सा ऊपर से,बेमेतरा में प्रशासन पर बरसे रमन सिंह

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  • प्रोटोकॉल हुआ ध्वस्त तो मंच से गरजे रमन सिंह,कलेक्टर-एसपी को दी खुली चेतावनी
  • आंधी से उड़ा पंडाल,व्यवस्था से उड़ा भरोसा, बेमेतरा में फूटा विधानसभा अध्यक्ष का गुस्सा…
  • मुख्यमंत्री के प्रोटोकॉल पर सवाल,विधानसभा अध्यक्ष ने मंच से लगाई प्रशासन को फटकार…
  • ’यह परंपरा नहीं,अक्षम्य भूल है’-बेमेतरा में अधिकारियों पर बरसे विधानसभा अध्यक्ष
  • बेमेतरा बना प्रशासनिक पाठशाला,विधानसभा अध्यक्ष ने मंच से पढ़ाया प्रोटोकॉल का पाठ
  • जब विधानसभा अध्यक्ष को मंच से याद दिलानी
  • पड़ी मर्यादा,तब कटघरे में खड़ा हुआ प्रशासन
  • माननीयों का सम्मान भी नहीं संभाल पाया
  • प्रशासन,बेमेतरा में खुल गई व्यवस्थाओं की पोल
  • पंद्रह साल के मुख्यमंत्री का छलका अनुभव, बोले…ऐसी व्यवस्था दोबारा नहीं दिखनी चाहिए
  • क्या बेलगाम हो चुका है प्रशासन? बेमेतरा में विधानसभा अध्यक्ष की नाराजगी ने खड़े किए बड़े सवाल…
  • फटकार या बड़ी सीख? बेमेतरा में भड़के विधानसभा अध्यक्ष,कलेक्टर-एसपी को मंच से सुनाई खरी-खरी


-न्यूज डेस्क-
रायपुर 01 जून 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ की राजनीति में अक्सर नेताओं की नाराजगी बंद कमरों तक सीमित रहती है, लेकिन बेमेतरा में जो दृश्य सामने आया उसने प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचा दी, प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और वर्तमान विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने खुले मंच से जिस तरह प्रशासनिक व्यवस्थाओं पर नाराजगी जाहिर की, उसने यह संकेत दे दिया कि मामला केवल एक कार्यक्रम की अव्यवस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन और प्रशासन के बीच बढ़ती दूरी का सार्वजनिक प्रदर्शन बन चुका है, ढाई वर्ष के कार्यकाल में पहली बार ऐसा अवसर देखने को मिला जब विधानसभा अध्यक्ष को मंच से ही कलेक्टर और एसपी को नसीहत देनी पड़ी, राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यह केवल एक जिले की घटना नहीं बल्कि पूरे प्रदेश के प्रशासनिक तंत्र के लिए चेतावनी का संदेश था।
आंधी आई तो उड़ गया पंडाल,साथ में उड़ गई प्रशासनिक तैयारी भी…
बेमेतरा में सुशासन तिहार,सामूहिक विवाह सम्मेलन और कई महत्वपूर्ण कार्यक्रमों का आयोजन था,कार्यक्रम में मुख्यमंत्री, दोनों उपमुख्यमंत्री,केंद्रीय राज्य मंत्री, मंत्रीगण और विधायक मौजूद थे, ऐसे आयोजन में सुरक्षा, प्रोटोकॉल और वैकल्पिक व्यवस्था सर्वोच्च प्राथमिकता मानी जाती है,लेकिन तेज आंधी और बारिश ने जैसे ही दस्तक दी,प्रशासनिक तैयारियों की पोल खुल गई,टेंट और पंडाल धराशायी होने लगे,कुर्सियां उड़ने लगीं और व्यवस्था संभालने का दावा करने वाले अधिकारी एक-दूसरे की ओर देखने लगे, सबसे बड़ा सवाल यह रहा कि वीवीआईपी स्तर के कार्यक्रम में वैकल्पिक व्यवस्था तत्काल क्यों नहीं हो सकी? बताया जा रहा है कि करीब दो घंटे तक अधिकारी इस बात पर ही सहमति नहीं बना पाए कि कार्यक्रम को किस स्थान पर शिफ्ट किया जाए, यही वह बिंदु था जिसने विधानसभा अध्यक्ष को सबसे ज्यादा नाराज किया।
जब माननीयों का यह हाल है तो आम जनता का क्या?-इस पूरे घटनाक्रम का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह है जिस पर आम जनता चर्चा कर रही है, लोग सवाल पूछ रहे हैं कि यदि मुख्यमंत्री,उपमुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री और विधानसभा अध्यक्ष की मौजूदगी वाले कार्यक्रम में व्यवस्था इस स्तर तक बिगड़ सकती है,तो आम नागरिकों की समस्याओं को प्रशासन कितनी गंभीरता से लेता होगा? राजस्व विभाग से लेकर स्थानीय प्रशासन तक आम लोगों की शिकायतें पहले से ही लंबित मामलों, चक्कर काटने और कथित भ्रष्टाचार को लेकर सामने आती रही हैं,यही कारण है कि विधानसभा अध्यक्ष की फटकार को कई लोग जनता की भावना का प्रतिबिंब भी मान रहे हैं।
प्रोटोकॉल पर पड़ा ग्रहण,स्वागत भी पीछे से!
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार विधानसभा अध्यक्ष की नाराजगी केवल टेंट उड़ने तक सीमित नहीं थी,उन्हें इस बात ने अधिक विचलित किया कि मुख्यमंत्री सहित अन्य माननीयों के स्वागत और प्रोटोकॉल का पालन भी निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं हुआ,कहा जा रहा है कि कुछ माननीयों का स्वागत पीछे से किया गया, जबकि प्रोटोकॉल के अनुसार वरिष्ठ जनप्रतिनिधियों के आगमन और स्वागत की स्पष्ट व्यवस्था होती है, मंच से विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह परंपरा नहीं है,यह उचित नहीं है और भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं दिखनी चाहिए,उनकी भाषा भले संयमित थी, लेकिन संदेश बेहद कठोर था।
क्या प्रशासन मर्यादा भूल गया है?
सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या प्रशासनिक अमला अब राजनीतिक और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर उतना सजग नहीं रह गया है जितना पहले हुआ करता था? डॉ. रमन सिंह कोई साधारण जनप्रतिनिधि नहीं हैं,वे पंद्रह वर्षों तक प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे हैं और वर्तमान में विधानसभा अध्यक्ष जैसे संवैधानिक पद पर आसीन हैं, ऐसे में उनका सार्वजनिक रूप से नाराज होना सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती,राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि विधानसभा अध्यक्ष को मंच से अधिकारियों को याद दिलाना पड़े कि प्रोटोकॉल क्या होता है, तो यह प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
बेमेतरा से निकला संदेश पूरे प्रदेश के लिए?
घटना भले बेमेतरा की हो,लेकिन इसके संदेश को पूरे प्रदेश के संदर्भ में देखा जा रहा है, कई जनप्रतिनिधि लंबे समय से यह शिकायत करते रहे हैं कि प्रशासनिक अधिकारी जनता और निर्वाचित प्रतिनिधियों के साथ संवाद में अपेक्षित संवेदनशीलता नहीं दिखा रहे,कई जिलों में विधायक और अधिकारी आमने-सामने तक आ चुके हैं,ऐसे माहौल में विधानसभा अध्यक्ष की यह टिप्पणी केवल तत्कालीन व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं बल्कि प्रशासनिक व्यवहार में सुधार का सार्वजनिक निर्देश भी मानी जा रही है।
सरल मुख्यमंत्री और बेलगाम व्यवस्था?
भाजपा संगठन के भीतर भी लंबे समय से यह चर्चा सुनाई देती रही है कि मुख्यमंत्री की सहज और सौम्य कार्यशैली का लाभ कुछ अधिकारी अपनी सुविधानुसार उठा रहे हैं,कई कार्यकर्ता यह आरोप लगाते हैं कि प्रशासनिक तंत्र कई मामलों में जनप्रतिनिधियों की बात को गंभीरता से नहीं लेता। शिकायतें सुनने के बजाय फाइलों को इधर-उधर घुमाने की संस्कृति विकसित हो रही है,बेमेतरा की घटना ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
फटकार नहीं,प्रशासनिक
आईना था बेमेतरा का मंच

बेमेतरा का मंच केवल एक कार्यक्रम का मंच नहीं था,वह प्रशासनिक कार्यशैली का आईना बन गया, विधानसभा अध्यक्ष ने जिस तरह सार्वजनिक रूप से नाराजगी व्यक्त की,उससे यह स्पष्ट संकेत गया कि व्यवस्था केवल कागजों और प्रस्तुतियों से नहीं चलती। संकट की घड़ी में निर्णय क्षमता, समन्वय और जिम्मेदारी सबसे बड़ी कसौटी होती है, अब देखने वाली बात यह होगी कि बेमेतरा की यह सार्वजनिक सीख केवल तालियों तक सीमित रहती है या फिर वास्तव में प्रशासनिक कार्यशैली में बदलाव दिखाई देता है,क्योंकि विधानसभा अध्यक्ष ने मंच से जो कहा,वह केवल कलेक्टर और एसपी के लिए नहीं था, वह पूरे प्रशासनिक ढांचे के लिए एक संदेश था पद चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो,प्रोटोकॉल, मर्यादा और जवाबदेही से बड़ा नहीं हो सकता।


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