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बलरामपुर@ फर्जी निवास प्रमाण पत्र रैकेट का पर्दाफाश

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छत्तीसगढ़ कोटे से केंद्रीय बलों में भर्ती कराने वाला गिरोह बेनकाब,मुख्य आरोपी समेत 4 गिरफ्तार
बलरामपुर,29 मई 2026 (घटती-घटना)।
छत्तीसगढ़ राज्य का फर्जी निवास प्रमाण-पत्र बनवाकर केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में अवैध भर्ती कराने वाले बड़े गिरोह का बलरामपुर पुलिस ने पर्दाफाश किया है। मामले में अब तक मुख्य आरोपी समेत चार आरोपियों को गिरफ्तार किया गया है। जांच में खुलासा हुआ है कि गिरोह डोंगरगढ़ और अन्य स्थानों से कूटरचित दस्तावेज तैयार कर गैर-निवासियों को छत्तीसगढ़ का निवासी दर्शाकर सीआरपीएफ,एसएसबी और सीआईएसएफ जैसी केंद्रीय एजेंसियों में भर्ती करवा रहा था। पुलिस के मुताबिक यह पूरा खेल इसलिए खेला जा रहा था क्योंकि केंद्रीय भर्ती में छत्तीसगढ़ राज्य का कटऑफ अन्य राज्यों की तुलना में कम रहता है। इसी का फायदा उठाकर दूसरे राज्यों के युवकों को फर्जी तरीके से छत्तीसगढ़ का निवासी बनाकर नौकरी दिलाई जा रही थी।
तहसीलदार की शिकायत से खुला बड़ा खेल : मामले का खुलासा उस समय हुआ जब 28 अप्रैल 2026 को तहसीलदार बलरामपुर ने थाना बलरामपुर में लिखित शिकायत दी। शिकायत में बताया गया कि 204 कोबरा बटालियन सीआरपीएफ करनपुर जगदलपुर में पदस्थ कांस्टेबल सुमित पिता अचल सिंह द्वारा ई-डिस्टि्रक्ट पोर्टल के माध्यम से फर्जी तरीके से स्थानीय निवासी प्रमाण पत्र बनवाया गया है। जांच में पाया गया कि आरोपी ने विशाल सोनी के शैक्षणिक एवं अन्य दस्तावेजों में कूट रचना कर अपना नाम जोड़ते हुए छत्तीसगढ़ का निवास प्रमाण पत्र जारी करवाया था। शिकायत के आधार पर थाना बलरामपुर में अपराध क्रमांक 78/2026 के तहत बीएनएस की विभिन्न धाराओं और आईटी एक्ट के तहत मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई।
राजस्थान निवासी आरोपी पहले ही हो चुका था भर्ती : विवेचना के दौरान सामने आया कि आरोपी सुमित पिता अचल सिंह, निवासी ग्राम रुंध जिला धौलपुर (राजस्थान),फर्जी दस्तावेजों के आधार पर वर्ष 2023 में एसएससी माध्यम से सीआरपीएफ में भर्ती हो चुका था। पुलिस ने आरोपी को 14 मई 2026 को गिरफ्तार कर न्यायिक रिमांड पर जेल भेज दिया।
रायपुर से पकड़े गए मास्टरमाइंड : जांच आगे बढ़ने पर पुलिस ने गिरोह के मुख्य आरोपी विवेक सिंह तोमर और उसके साथी आकाश सिंह शर्मा को रायपुर से हिरासत में लिया।
पुलिस जांच में खुलासा हुआ कि…
विवेक सिंह तोमर ने स्वयं भी डोंगरगढ
¸ से फर्जी दस्तावेजों के जरिए छत्तीसगढ
¸ का निवास प्रमाण-पत्र बनवाया था।
आकाश शर्मा ने अपना नाम बदलकर
‘तुकेश्वर पिता भोजराज’ के नाम से
फर्जी आधार कार्ड और पैन कार्ड तैयार
कराया।
बलरामपुर निवासी दीपक चौरसिया के
शैक्षणिक दस्तावेजों में छेड़छाड़ कर
फर्जी पहचान बनाई गई।
इसके आधार पर तहसील कार्यालय
बलरामपुर से स्थानीय निवासी प्रमाण
पत्र जारी कराया गया।

दोनों आरोपियों को 23 मई 2026 को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।
डोंगरगढ़ से संचालित हो रहा था फर्जीवाड़े का नेटवर्क
प्रकरण की जांच के दौरान पुलिस ने राजनांदगांव जिले के डोंगरगढ़ क्षेत्र से जुड़े एक और आरोपी ओमप्रकाश चंद्रवंशी को गिरफ्तार किया। पूछताछ में आरोपी ने कई चौंकाने वाले खुलासे किए। आरोपी ने बताया कि विवेक सिंह तोमर बाहरी राज्यों के लोगों के दस्तावेज उपलब्ध कराता था। इसके बाद ई-डिस्टि्रक्ट पोर्टल में सिटीजन आईडी बनाकर दस्तावेजों में एडिटिंग कर फर्जी आवेदन ऑनलाइन जमा किए जाते थे।
प्रत्येक व्यक्ति से 4 से 5 हजार रुपये लेकर दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जबकि मुख्य आरोपी विवेक सिंह तोमर एक फर्जी प्रमाण पत्र बनवाने के एवज में 3 से 4 लाख रुपये तक वसूलता था। पुलिस ने आरोपी के कब्जे से घटना में उपयोग किया गया कंप्यूटर सिस्टम भी जब्त किया है।
20 से 25 फर्जी प्रमाण पत्र जारी होने की आशंका
पुलिस जांच में यह भी सामने आया है कि केवल बलरामपुर ही नहीं, बल्कि डोंगरगढ़ तहसील कार्यालय से भी लगभग 20 से 25 फर्जी स्थानीय निवासी प्रमाण पत्र जारी किए गए हैं। इन प्रमाण पत्रों का उपयोग कर कई गैर-निवासी युवक केंद्रीय सुरक्षा बलों में भर्ती हो चुके हैं या भर्ती होने का प्रयास कर रहे हैं। अब पुलिस संबंधित केंद्रीय एजेंसियों और भर्ती इकाइयों को पत्राचार कर आवश्यक वैधानिक कार्रवाई की तैयारी कर रही है।
पुलिस की जांच में कई और बड़े खुलासों के संकेत
जांच एजेंसियों का मानना है कि यह केवल एक जिला या एक तहसील तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसके तार दूसरे राज्यों और कई जिलों से जुड़े हो सकते हैं। संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस फर्जी भर्ती रैकेट में और भी नाम सामने आ सकते हैं। पुलिस अब ई-डिस्टि्रक्ट पोर्टल से जारी पुराने प्रमाण पत्रों की भी जांच कर रही है।
बड़ा सवाल

  • आखिर इतने बड़े पैमाने पर फर्जी प्रमाण पत्र जारी कैसे होते रहे?
  • ई-डिस्टि्रक्ट पोर्टल की मॉनिटरिंग व्यवस्था कहां विफल हुई?
  • क्या इसमें अंदरूनी मिलीभगत भी शामिल है?
  • कितने बाहरी लोग छत्तीसगढ़ कोटे का अवैध लाभ लेकर सरकारी नौकरी पा चुके हैं?
    इन सवालों के जवाब अब जांच पूरी होने के बाद ही सामने आ पाएंगे, लेकिन इस खुलासे ने प्रशासनिक व्यवस्था और दस्तावेज सत्यापन प्रणाली पर गंभीर सवाल जरूर खड़े कर दिए हैं।

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