
- कोरिया कलेक्ट्रेट में ‘स्थायी स्टेनो राज’ पर बड़ा सवाल,
- नियम किनारे और प्रभावशाली व्यवस्था का जलवा बरकरार
- ‘स्थायी स्टेनो राज’ का खेल! कलेक्टर बदलते रहे,
- लेकिन नहीं बदला प्रतिनियुक्ति सिस्टम
- राजस्व विभाग गायब,प्रतिनियुक्ति वाला सक्रिय!
- कोरिया कलेक्ट्रेट में उठे बड़े सवाल
- निष्ठा का सम्मान या सिस्टम का इनाम?
- विवादों के बीच स्टेनो को मिला प्रशस्ति पत्र
- प्रतिनियुक्ति या परमानेंट पोस्टिंग ? कोरिया
- कलेक्ट्रेट में वर्षों से जमे स्टेनो पर घमासान
- हम नहीं बदलते…कलेक्ट्रेट में स्थायी कर्मचारी
- व्यवस्था पर कर्मचारियों का तंज
- प्रशस्ति पत्र से बढ़ा विवाद,नियमों पर
- सवाल, सम्मान पर भी उठी उंगलियां
- कलेक्ट्रेट में ‘स्थायी सत्ता’ का आरोप,
- विभागीय कर्मचारी किनारे,प्रतिनियुक्ति वाला केंद्र में
- कोरिया कलेक्ट्रेट में कौन चला रहा सिस्टम? अधिकारी बदलते रहे,प्रभाव वही कायम
- प्रतिनियुक्ति की आड़ में वर्षों का प्रभाव? उत्कृष्ट कर्मचारी सम्मान के बाद गरमाया मामला
- सरकारी सिस्टम या निजी पकड़? कलेक्ट्रेट में ‘स्थायी स्टेनो’ मॉडल पर बहस तेज
- फाइलों से ज्यादा चर्चाओं में स्टेनो राज,प्रशस्ति पत्र ने खोले कई सवाल
- ‘निष्ठापूर्वक दायित्व’ या वर्षों की पकड़? प्रशस्ति पत्र बना प्रशासनिक बहस का केंद्र
- कलेक्ट्रेट में बदलते अफसर, स्थायी प्रभावशाली कर्मचारी — अब जांच की मांग तेज
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,28 मई 2026 (घटती-घटना)। कोरिया कलेक्ट्रेट इन दिनों किसी सामान्य प्रशासनिक कार्यालय से ज्यादा स्थायी सत्ता केंद्र की तरह चर्चा में है,यहां कुर्सियां बदलती हैं, कलेक्टर बदलते हैं,सरकारें बदलती हैं, आदेश बदलते हैं, लेकिन यदि कुछ नहीं बदलता तो वह है कुछ प्रभावशाली कर्मचारियों की पकड़। और इसी पकड़ का सबसे चर्चित चेहरा इन दिनों प्रतिनियुक्ति पर वर्षों से कार्यरत स्टेनो घनश्याम मिश्रा को माना जा रहा है,स्वतंत्रता दिवस 2024 पर मिले ‘प्रशस्ति पत्र’ ने अब पूरे मामले को और ज्यादा विस्फोटक बना दिया है, जिस कर्मचारी की प्रतिनियुक्ति और भूमिका को लेकर लंबे समय से सवाल उठते रहे, उसी कर्मचारी को निष्ठा पूर्वक दायित्वों का निर्वहन करने पर सम्मानित किए जाने से अब कर्मचारियों के बीच नाराजगी खुलकर सामने आने लगी है, कलेक्ट्रेट के गलियारों में इन दिनों सबसे ज्यादा जो लाइन गूंज रही है, वह है की हम नहीं बदलते… कलेक्टर बदलते रहते हैं! और यही लाइन अब पूरे विवाद का सबसे बड़ा व्यंग्य बन चुकी है।
प्रतिनियुक्ति या स्थायी पोस्टिंग?
सरकारी नियमों में प्रतिनियुक्ति को हमेशा अस्थायी व्यवस्था माना जाता है, जब किसी विभाग में आवश्यकता होती है, तब दूसरे विभाग से कर्मचारी को कुछ समय के लिए भेजा जाता है, लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में यह व्यवस्था मानो स्थायी शासन मॉडल में बदल चुकी दिखाई देती है, सूत्र बताते हैं कि मत्स्य विभाग से प्रतिनियुक्ति पर आए स्टेनो घनश्याम मिश्रा वर्षों से कलेक्ट्रेट व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बने हुए हैं,इतने वर्षों में उनकी पकड़ सिर्फ फाइलों तक सीमित नहीं रही,बल्कि प्रशासनिक समन्वय,गोपनीय पत्राचार और कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों तक मजबूत प्रभाव बना रहा, अब कर्मचारी पूछ रहे हैं यदि प्रतिनियुक्ति अस्थायी व्यवस्था है,तो फिर यह अस्थायी कर्मचारी वर्षों से स्थायी भूमिका में कैसे बना हुआ है? यह सवाल इसलिए भी गंभीर है क्योंकि इसी दौरान राजस्व विभाग के मूल स्टेनो लगभग व्यवस्था से बाहर दिखाई दिए, जिन कर्मचारियों को विभागीय जिम्मेदारियां मिलनी चाहिए थीं,वे अवसर का इंतजार करते रह गए, जबकि महत्वपूर्ण कार्य लगातार प्रतिनियुक्ति व्यवस्था के इर्द-गिर्द घूमते रहे।
प्रशस्ति पत्र बना विवाद की नई चिंगारी
स्वतंत्रता दिवस 2024 पर जारी प्रशस्ति पत्र में स्टेनो घनश्याम मिश्रा को निष्ठा पूर्वक दायित्वों का निर्वहन करने के लिए सम्मानित किया गया। यहीं से पूरे विवाद ने नया मोड़ ले लिया, कर्मचारियों के बीच अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि किसी कर्मचारी की प्रतिनियुक्ति व्यवस्था ही विवादों में रही हो, तो फिर उसी कर्मचारी को उत्कृष्ट कार्य और निष्ठा का प्रमाणपत्र किस आधार पर दिया गया? कलेक्ट्रेट में यह भी चर्चा है कि कई ऐसे कर्मचारी हैं जिन्होंने वर्षों तक जमीनी स्तर पर काम किया, जनता की समस्याएं सुलझाईं, लेकिन वे आज भी किसी पहचान और सम्मान से दूर हैं वहीं दूसरी ओर प्रभावशाली माने जाने वाले कर्मचारी को प्रशस्ति पत्र मिल गया,यही कारण है कि अब सम्मान चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी सवाल उठ रहे हैं, कुछ कर्मचारी व्यंग्य में कह रहे हैं सरकारी सेवा में अब मेहनत नहीं, नेटवर्किंग उत्कृष्टता का नया पैमाना है।
‘निष्ठा’ किसके प्रति? विभाग, नियम या सिस्टम?-सबसे तीखा सवाल अब यही उठ रहा है कि आखिर ‘निष्ठा’ किसके प्रति दिखाई गई? क्या विभागीय नियमों के प्रति? क्या प्रशासनिक पारदर्शिता के प्रति? या फिर उस ‘स्थायी सिस्टम’ के प्रति, जिसने वर्षों तक एक ही व्यवस्था को कायम रखा? सरकारी कार्यालयों में आम कर्मचारी छोटी-सी गलती पर नोटिस और स्पष्टीकरण का सामना करता है, लेकिन यहां मामला बिल्कुल उल्टा दिखाई देता है। जिनकी भूमिका पर सवाल हैं, वही सम्मानित भी हैं, यही वजह है कि कलेक्ट्रेट में अब यह मामला कर्मचारियों की असंतुष्टि से आगे बढ़कर प्रशासनिक विश्वसनीयता का विषय बन गया है।
कलेक्टर बदलते रहे,सिस्टम नहीं बदला- कोरिया कलेक्ट्रेट के अंदर इन दिनों यह लाइन बेहद लोकप्रिय हो चुकी है हम नहीं बदलते…कलेक्टर बदलते रहते हैं, इस एक लाइन में पूरे विवाद का सार छिपा हुआ है, कर्मचारियों का कहना है कि प्रशासनिक अधिकारी आते-जाते रहे, लेकिन कुछ प्रभावशाली कर्मचारियों की स्थिति पर कोई असर नहीं पड़ा,यही कारण है कि अब यह चर्चा हो रही है कि असली सिस्टम कौन चला रहा था—अधिकारी या वर्षों से जमे कर्मचारी? सूत्र बताते हैं कि महत्वपूर्ण फाइलों से लेकर गोपनीय जानकारियों तक में लंबे समय से कुछ चुनिंदा लोगों की भूमिका बेहद प्रभावशाली रही। इससे विभागीय संतुलन और अवसर दोनों प्रभावित हुए।
विभागीय कर्मचारियों में बढ़ता असंतोष
राजस्व विभाग और अन्य कर्मचारियों के बीच अब असंतोष खुलकर सामने आने लगा है, कई कर्मचारियों का कहना है कि यदि वर्षों पहले प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की समीक्षा होती, तो विभागीय कर्मचारियों को भी आगे आने का अवसर मिलता, कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां हमेशा सीमित लोगों तक ही रखी गईं,इससे न केवल अन्य कर्मचारियों का मनोबल प्रभावित हुआ,बल्कि विभागीय कार्यप्रणाली में भी असंतुलन पैदा हुआ,व्यंग्यात्मक टिप्पणी यह भी सुनाई दे रही है की यहां ट्रांसफर आम कर्मचारियों का होता है, प्रभावशाली लोग सिर्फ सीट एडजस्ट करते हैं।
संभाग आयुक्त पर टिकी निगाहें…
अब पूरे मामले में सबसे ज्यादा नजर संभाग आयुक्त कार्यालय पर टिकी हुई है। सूत्रों के अनुसार कुछ कर्मचारियों ने मौखिक शिकायतें और असंतोष उच्च स्तर तक पहुंचाया है, अब सवाल उठ रहा है क्या पूरे मामले की निष्पक्ष जांच होगी? क्या वर्षों से चली आ रही प्रतिनियुक्ति व्यवस्था की समीक्षा होगी? क्या विभागीय कर्मचारियों को अवसर देने पर विचार होगा? क्या उत्कृष्ट कर्मचारी चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता जांची जाएगी? और सबसे बड़ा सवाल क्या ‘स्थायी स्टेनो सिस्टम’ पर कोई प्रशासनिक कार्रवाई होगी? हालांकि सरकारी गलियारों में इस पर भी व्यंग्य चल रहा है की फाइलें जरूर चलेंगी, बस फैसला पहुंचेगा या नहीं… यह सिस्टम तय करेगा।
सरकारी सिस्टम पर बड़ा प्रश्नचिह्न
यह पूरा मामला अब सिर्फ एक प्रशस्ति पत्र या एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रहा, यह उस मानसिकता की तस्वीर बन गया है, जहां सरकारी व्यवस्था धीरे-धीरे व्यक्ति विशेष पर निर्भर होती चली जाती है, जब नियमों से ज्यादा प्रभाव काम करने लगे, जब विभागीय कर्मचारियों से ज्यादा बाहरी प्रतिनियुक्ति व्यवस्था मजबूत हो जाए, जब पुरस्कारों पर भी सवाल उठने लगें—तब यह केवल प्रशासनिक विषय नहीं रह जाता, बल्कि जनता के विश्वास का मामला बन जाता है, आम लोग अब पूछ रहे हैं यदि नियमों के बावजूद वर्षों तक व्यवस्था नहीं बदलती, तो फिर सरकारी नियम आखिर लागू किसके लिए होते हैं?
राजस्व विभाग का स्टेनो गायब,लेकिन ‘स्थायी सिस्टम’ सक्रिय
कलेक्ट्रेट कर्मचारियों के बीच सबसे बड़ी चर्चा इस बात को लेकर है कि आखिर राजस्व विभाग के मूल स्टेनो की भूमिका कहां चली गई? यदि विभाग में नियमित कर्मचारी मौजूद थे, तो फिर बाहरी विभाग से आए कर्मचारी पर इतनी निर्भरता क्यों बनी रही? कई कर्मचारियों का आरोप है कि वर्षों से एक ऐसा ‘समानांतर सिस्टम’ विकसित हो गया, जहां फाइलों का रास्ता,अधिकारियों तक पहुंच और गोपनीय जानकारी तक कुछ चुनिंदा लोगों का प्रभाव बना रहा,कलेक्ट्रेट में व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा जा रहा है की यहां पद अस्थायी हैं, लेकिन पकड़ स्थायी है, सूत्रों का दावा है कि कई बार अधिकारी बदलने के बाद भी वास्तविक प्रशासनिक नियंत्रण वही लोग संभालते रहे, जिनकी पकड़ वर्षों से सिस्टम पर बनी हुई थी, यही वजह है कि अब यह मामला सिर्फ एक कर्मचारी का नहीं,बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की पारदर्शिता का विषय बन चुका है।
अब सवाल सिर्फ एक स्टेनो का नहीं, पूरे सिस्टम का है…
कोरिया कलेक्ट्रेट का यह विवाद अब ‘एक कर्मचारी बनाम विभाग’ की कहानी नहीं रह गया, यह उस स्थायी प्रशासनिक संस्कृति की कहानी बनता जा रहा है, जहां कुर्सियां घूमती हैं लेकिन प्रभाव नहीं बदलता, और फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है क्या इस बार भी मामला फाइलों में दब जाएगा? या फिर सचमुच ‘स्थायी स्टेनो राज’ की निष्पक्ष समीक्षा होगी?
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