- नवीन नगर पंचायत,पुरानी राजनीति और नया संग्राम
- थाने से चुनाव मैदान तक…शिवनंदनपुर में नेता,पत्रकार और राजनीति का ‘नारियल संग्राम’
- आर्म्स एक्ट से आमरण अनशन तक,नगर पंचायत चुनाव ने खोले ताकत और पहचान के कई राज…
- शिवनंदनपुर चुनाव से पहले सियासी विस्फोट,एफआईआर, धरना और ‘पावर पॉलिटिक्स’ का बड़ा खेल
- नेता कौन,पत्रकार कौन? विश्रामपुर धरने ने खड़े किए राजनीति और निष्पक्षता पर सवाल
- नारियल पानी से टूटा अनशन,लेकिन गरम रही राजनीतिः शिवनंदनपुर चुनाव में बढ़ी रही सियासी तकरार


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर 27 मई 2026 (घटती-घटना)। शिवनंदनपुर नगर पंचायत अभी नई-नई बनी ही थी कि राजनीति ने यहां अपना पुराना रंग दिखाना शुरू कर दिया,सरगुजा संभाग की यह इकलौती नवीन नगर पंचायत अब सिर्फ विकास योजनाओं या नगर निर्माण के लिए चर्चा में नहीं है,बल्कि यहां चुनाव से पहले शुरू हुए राजनीतिक महाभारत ने पूरे क्षेत्र का तापमान बढ़ा दिया है, यह चुनाव सामान्य नगरीय निकाय चुनाव के साथ कुछ महीनों बाद भी कराया जा सकता था,अगर चार महीने रुक जाते तो बाकी निकायों के साथ यह चुनाव भी निपट जाता, सरकारी मशीनरी का खर्च बच जाता और नेताओं की ऊर्जा भी,लेकिन लोकतंत्र में कभी-कभी चुनाव से ज्यादा महत्वपूर्ण चुनाव का ‘माहौल’ होता है,इसलिए अलग से चुनाव हुआ और अब यह छोटा सा नगर पंचायत चुनाव प्रदेश स्तरीय सियासी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुका है, भाजपा चाहती है कि नवीन नगर पंचायत का पहला अध्यक्ष उसके खाते में जाए,ताकि सत्ता का संदेश नीचे तक जाए। कांग्रेस चाहती है कि विपक्ष में रहते हुए भी वह यह चुनाव जीतकर यह साबित करे कि जमीन पर उसकी पकड़ अब भी मजबूत है,यानी चुनाव नगर पंचायत का है, लेकिन लड़ाई इगो पंचायत की बन गई है। बता दे की सूरजपुर बिश्रामपुर भाजपा नेताओं की शिकायत पर सूरजपुर जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष नरेंद्र जैन के खिलाफ बिश्रामपुर थाने में रविवार की रात आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया था। इसे लेकर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज,पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव,पूर्व सीएम भूपेश बघेल के अलावा कांग्रेस के प्रदेश से लेकर जिला स्तर के नेता बिश्रामपुर थाने के सामने धरने पर बैठे थे,सिंहदेव मंगलवार की शाम से आमरण अनशन पर जबकि दीपक बैज क्रमिक भूख हड़ताल पर बैठे थे,उन्होंने कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष के खिलाफ दर्ज एफआईआर वापस लेने, बिश्रामपुर टीआई को निलंबित करने तथा भाजपा नेताओं के खिलाफ एफआईआर करने की मांग की थी,बुधवार को ये तीनों मांगें मान ली गई,इसके बाद नारियल पानी पिलाकर आमरण अनशन व क्रमिक भूख हड़ताल समाप्त किया गया।
धरना,अनशन और
राजनीति का नारियल मॉडल
धरना बढ़ा तो कांग्रेस ने इसे आंदोलन का रूप दे दिया,टीएस सिंहदेव आमरण अनशन पर बैठ गए,दीपक बैज ने भूख हड़ताल शुरू कर दी, राजनीति में भूख हड़ताल एक ऐसा हथियार है जिसमें भूख कम और संदेश ज्यादा दिखाई देता है,रात के दो-दो बजे तक नेता थाने के बाहर बैठे रहे, कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर लाइव चलाते रहे,समर्थक इसे लोकतंत्र की लड़ाई बताते रहे और विरोधी इसे चुनावी स्टंट कहते रहे,फिर आखिरकार प्रशासन और कांग्रेस नेताओं के बीच बातचीत हुई,आश्वासन मिला कि भाजपा कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी एफआईआर होगी, जांच डीएसपी स्तर के अधिकारी करेंगे और फिलहाल नरेंद्र जैन की गिरफ्तारी नहीं होगी, बस फिर आंदोलन समाप्त हो गया,और आंदोलन खत्म भी कैसे हुआ? कोई क्रांतिकारी घोषणा नहीं, कोई ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं…बल्कि नारियल पानी से,दीपक बैज और टीएस सिंहदेव ने एक-दूसरे को नारियल पानी पिलाया और आंदोलन समाप्त हो गया,लोकतंत्र में यह शायद पहला मौका नहीं होगा जब तीन दिन की राजनीतिक गर्मी का अंत ठंडे नारियल पानी से हुआ हो।
भूपेश बघेल की चेतावनी और राजनीतिक संदेश
धरने के दौरान भूपेश बघेल ने मंच से पुलिस अधिकारियों को चेतावनी देते हुए कहा कि जब उनकी सरकार आएगी तो ऐसे अधिकारियों पर कार्रवाई होगी,यह बयान केवल पुलिस के लिए नहीं था,बल्कि आने वाले चुनावों के लिए राजनीतिक संदेश भी था,कांग्रेस यह दिखाना चाहती थी कि वह विपक्ष में रहते हुए भी संघर्ष की राजनीति कर रही है,वहीं भाजपा समर्थक इसे दबाव की राजनीति बता रहे थे।
शिवनंदनपुर चुनाव अब सिर्फ चुनाव नहीं रहा- अब यह चुनाव केवल अध्यक्ष चुनने का चुनाव नहीं रह गया है,यह सत्ता बनाम विपक्ष, प्रशासन बनाम आंदोलन और प्रभाव बनाम निष्पक्षता की लड़ाई बन चुका है,नगर पंचायत का पहला अध्यक्ष कौन बनेगा, यह तो 1 जून के बाद तय होगा, लेकिन उससे पहले ही इस चुनाव ने कई चेहरे और कई रिश्ते उजागर कर दिए हैं।
विवाद की शुरुआत,चुनाव से पहले चिंगारी
1 जून को चुनाव होना है,लेकिन उससे पहले ही माहौल ऐसा गरमा गया मानो मतदान नहीं बल्कि विधानसभा का शक्ति परीक्षण होने वाला हो,भाजपा समर्थकों और कांग्रेस समर्थकों के बीच विवाद हुआ,आरोप लगे कि कांग्रेस जिला उपाध्यक्ष नरेंद्र जैन ने गाली-गलौज की और किसी औजार या हथियार जैसी वस्तु निकालकर डराने की कोशिश की, पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए आर्म्स एक्ट सहित विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर लिया,बस फिर क्या था राजनीति में एफआईआर कभी सिर्फ एफआईआर नहीं होती,वह सम्मान,प्रभाव और शक्ति का प्रश्न बन जाती है,कांग्रेस ने सवाल उठाया कि जब विवाद दो पक्षों के बीच हुआ तो कार्रवाई सिर्फ एक तरफ क्यों? अगर हथियार दिखाया गया तो उसका सबूत कहां है? बरामदगी कहां है? जांच कहां है? और अगर कुछ मिला ही नहीं तो फिर आर्म्स एक्ट क्यों? यहीं से मामला कानूनी कम और राजनीतिक ज्यादा हो गया।
थाना बना लोकतंत्र का नया धरना स्थल
विश्रामपुर थाना अचानक राजनीतिक तीर्थस्थल बन गया,कांग्रेस कार्यकर्ता थाने के बाहर जमा हो गए। नारे लगे,भाषण हुए,पुलिस पर आरोप लगे और धीरे-धीरे धरना एक बड़े शक्ति प्रदर्शन में बदल गया,फिर दृश्य ऐसा बना जिसे देखकर आम जनता भी समझ गई कि मामला अब ‘स्थानीय विवाद’ से ऊपर उठ चुका है,दीपक बैज पहुंचे,टी. एस. सिंहदेव पहुंचे,भूपेश बघेल पहुंचे,अमरजीत भगत पहुंचे,पूर्व मंत्री,विधायक,जिला अध्यक्ष,कार्यकर्ता पूरा काफिला थाने के बाहर उतर आया,जिस थाने में आम आदमी अपनी रिपोर्ट लिखवाने घंटों बैठा रहता है वहां अब नेताओं के भाषण,नारे और मीडिया कैमरे चमक रहे थे।
सबसे बड़ा सवाल
आखिर नरेंद्र जैन हैं कौन?
इस पूरे आंदोलन के बाद सबसे ज्यादा चर्चा किसी एफआईआर की नहीं, बल्कि एक पहचान की होने लगी,लोग पूछने लगे क्या नरेंद्र जैन कांग्रेस नेता हैं? क्या वे पत्रकार हैं? क्या वे व्यवसायी हैं? या फिर तीनों भूमिकाओं का ऐसा ‘कॉम्बो पैक’ हैं जिसमें हर परिस्थिति के अनुसार पहचान बदल जाती है? यहीं से बहस और तीखी हो गई,पत्रकारों के बीच चर्चा शुरू हुई कि क्या कोई व्यक्ति सक्रिय राजनीति में रहकर पत्रकारिता की निष्पक्षता निभा सकता है? राजनीतिक विरोधियों ने कहा कि पत्रकारिता का इस्तेमाल प्रभाव बनाने के लिए किया जा रहा है,समर्थकों ने कहा कि किसी व्यक्ति का सामाजिक और राजनीतिक रूप से सक्रिय होना गलत नहीं,लेकिन जनता ने इस पूरे मामले में सबसे व्यंग्यात्मक निष्कर्ष निकाला जिसके समर्थन में पूरा विपक्ष थाने के बाहर बैठ जाए, उसकी ताकत समझने के लिए अलग परिचय की जरूरत नहीं।
राजनीति में ‘पावर’ का प्रदर्शन
यह पूरा मामला केवल कानूनी विवाद नहीं रहा,यह राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन बन गया,संदेश साफ था हमारे आदमी को हाथ लगाया तो पूरा संगठन सड़क पर उतर आएगा,यानी नगर पंचायत चुनाव से पहले ही दोनों दलों ने अपनी-अपनी ताकत दिखा दी,भाजपा प्रशासनिक कार्रवाई का समर्थन करती दिखी,जबकि कांग्रेस इसे राजनीतिक प्रताड़ना बताकर मैदान में उतर गई, इस पूरे घटनाक्रम ने यह भी दिखा दिया कि छोटे शहरों और कस्बों की राजनीति अब पहले जैसी शांत नहीं रही,यहां भी अब वही सब हो रहा है जो बड़े राजनीतिक मंचों पर दिखता है धरना,प्रदर्शन,अनशन, मीडिया मैनेजमेंट,सोशल मीडिया युद्ध और शक्ति प्रदर्शन।
जनता क्या देख रही है?
सबसे दिलचस्प बात यह है कि आम जनता इस पूरे घटनाक्रम को बहुत ध्यान से देख रही है,जनता समझ रही है कि किसके पास कितनी ताकत है, कौन कितना प्रभाव रखता है और किसकी आवाज पर पूरा राजनीतिक कुनबा सड़क पर उतर आता है, लेकिन जनता यह भी पूछ रही है क्या नगर पंचायत चुनाव का मुद्दा विकास होगा? या फिर पूरा चुनाव एफआईआर,धरना और राजनीतिक प्रतिष्ठा के इर्द-गिर्द घूमेगा?
अंत में…शिवनंदनपुर
का यह चुनाव अब लोकतंत्र
से ज्यादा लोक
ड्रामा बन चुका है,थाना राजनीतिक मंच बन गया,धरना शक्ति प्रदर्शन बन गया और नारियल पानी आंदोलन का समापन गीत,लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक बात साफ कर दी,छोटे कस्बों की राजनीति अब बिल्कुल छोटी नहीं रही। यहां भी अब पहचान,प्रभाव,मीडिया और सत्ता सब एक-दूसरे में ऐसे घुल चुके हैं कि यह तय करना मुश्किल हो गया है कि कौन नेता है,कौन पत्रकार और कौन सिर्फ दर्शक,फिलहाल शिवनंदनपुर इंतजार कर रहा है 1 जून का…जहां जनता वोट डालेगी, लेकिन असली मुकाबला शायद पहले ही शुरू हो चुका है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur