

- चिरमिरी में सात दिन चली कथा
- लेकिन क्या सात मिनट भी बदला समाज?
- सात दिन रामकथा,आठवें दिन वही राजनीति! चिरमिरी में रामराज्य से पहले शुरू हो गया बयान युद्ध
- राम सुनने वालों का हृदय बदला या सिर्फ¸ फेसबुक स्टेटस? चिरमिरी की कथा के बाद बड़ा सवाल
- मंच पर राम, बाहर वही काम! कथा खत्म होते ही लौट आई पुरानी व्यवस्था
- करोड़ों की रामकथा के बाद क्या बदला? चिरमिरी में अब भी रामराज्य तलाश रहा समाज
- रामभद्राचार्य की कथा में उमड़ी भीड़, लेकिन क्या राम लोगों के व्यवहार में उतरे?
- जय श्रीराम के नारों से गूंजा चिरमिरी, पर क्या भ्रष्टाचार और राजनीति भी हुई शांत?
- रामकथा में आंसू बहाए, बाहर निकलते ही फिर वही स्वार्थ! आखिर कथा का असर कहां गया?
- कथा खत्म, कटाक्ष शुरू! ‘जगद्गुरु’ की बहस में उलझ गया चिरमिरी
- रामराज्य का सपना या धार्मिक ब्रांडिंग का महोत्सव? चिरमिरी की कथा पर उठे तीखे सवाल
- राम को सुनना आसान, राम जैसा बनना कठिन — चिरमिरी की कथा ने छोड़ दिए कई सवाल
-रवि सिंह-
एमसीबी/चिरीमिरी, 27 मई 2026 (घटती-घटना)। नवीन जिला एमसीबी के चिरमिरी पिछले कुछ दिनों से भक्ति,धर्म,राजनीति और बयान बाज़ी के एक ऐसे संगम का केंद्र बना रहा,जहां मंच पर भगवान राम के आदर्शों की गंगा बहाई गई,लेकिन कथा समाप्त होते-होते वही पुरानी सामाजिक और राजनीतिक धूल फिर उड़ने लगी, सात दिनों तक चली भव्य रामकथा में देश के प्रसिद्ध संत जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य ने राम के जीवन,मर्यादा,त्याग,धर्म और आदर्शों पर विस्तृत प्रवचन दिया, हजारों की भीड़ उमड़ी,जय श्रीराम के नारे लगे, मंचों पर फूल बरसे,नेताओं ने चरण स्पर्श किए,श्रद्धालुओं ने आशीर्वाद लिया और सोशल मीडिया पर भक्ति की ऐसी बाढ़ आई कि मानो चिरमिरी में कुछ समय के लिए सचमुच रामराज्य उतर आया हो, लेकिन कथा समाप्त होने के बाद शहर में एक सवाल तेजी से घूमने लगा क्या रामकथा सिफऱ् आयोजन बनकर रह गई है? क्या राम अब सिफऱ् पोस्टर, मंच और नारे तक सीमित हो चुके हैं? और सबसे बड़ा सवाल,क्या इतने बड़े धार्मिक आयोजन के बाद भी समाज वही रहेगा जैसा पहले था?
कथा समाप्त होने से एक दिन पहले शुरू हुई राजनीतिक कथा
रामकथा खत्म हुई नहीं कि राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गई,कांग्रेस के नेता प्रतिपक्ष नेताओं ने जगद्गुरु श्री रामभद्राचार्य को जगद्गुरु मानने से ही इंकार कर दिया और टिप्पणी कर दी कि जगतगुरु तो दूर,गांव का गुरु भी नहीं मानते,बस फिर क्या था,धर्म की चर्चा अचानक उपाधियों की बहस में बदल गई,जब यह बयान संत तक पहुंचा तो उन्होंने भी प्रतिक्रिया दी,उन्होंने विस्तार से बताया कि जगद्गुरु किसे कहा जाता है,उसकी क्या योग्यताएं होती हैं और क्यों वे स्वयं उस उपाधि के अधिकारी हैं,यानी कथा के बाद अब चर्चा राम के आदर्शों की नहीं,बल्कि जगद्गुरु कौन की होने लगी,यह दृश्य भी कम दिलचस्प नहीं था,सात दिन तक मंच से लोगों को अहंकार त्यागने का संदेश दिया गया और कथा समाप्त होने से एक दिन पहले समाज फिर अहंकार,राजनीति और आरोप-प्रत्यारोप में उलझ गया।
रामकथा का असर अगर व्यवहार में नहीं दिखा तो क्या लाभ?
धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को बेहतर बनाना होता है, अगर कथा सुनने के बाद कोई व्यक्ति झूठ कम बोले, रिश्वत लेना छोड़ दे,दूसरों की मदद करने लगे और अपने व्यवहार में सुधार लाए तभी कथा सफल मानी जाएगी, लेकिन अगर कथा सिफऱ् भीड़, प्रचार,मंच और राजनीतिक तस्वीरों तक सीमित रह जाए, तो फिर वह आध्यात्मिक कम और सामाजिक आयोजन अधिक लगती है,चिरमिरी की इस कथा के बाद अब शहर के लोगों की नजर इस बात पर रहेगी कि क्या वास्तव में कोई परिवर्तन आता है,क्या लोग अब धर्म को सिफऱ् नारे में नहीं, बल्कि व्यवहार में उतारेंगे? क्या राम सिफऱ् मंचों पर नहीं, बल्कि जीवन में भी दिखाई देंगे?
सबसे बड़ा प्रश्न अभी बाकी है…
कथा समाप्त हो चुकी है,पंडाल धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं, पोस्टर उतर जाएंगे,फेसबुक पोस्टें पुरानी हो जाएंगी,लेकिन एक प्रश्न अभी भी हवा में तैर रहा है क्या इस कथा के बाद चिरमिरी बदलेगा? क्या अब यहां भ्रष्टाचार कम होगा? क्या राजनीति में कटुता घटेगी? क्या धर्म का उपयोग वोट और प्रसिद्धि से ऊपर उठ पाएगा? क्या लोग राम को सिफऱ् सुनेंगे नहीं, बल्कि थोड़ा-बहुत जीने की कोशिश भी करेंगे? क्योंकि सच यही है कि रामकथा का उद्देश्य सिफऱ् भगवान राम की कहानी सुनाना नहीं,बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे हुए राम को जगाना है,अब देखना यह है कि चिरमिरी की इस भव्य कथा ने लोगों के भीतर मर्यादा जगाई है या सिफऱ् मंच पर जयकारे।
दूरदर्शन की रामायण से आधुनिक धार्मिक उद्योग तक का सफर
एक समय था जब रामायण प्रसारित होती थी तो पूरा देश रुक जाता था,लोग टीवी के सामने बैठकर भगवान राम के जीवन को देखते थे और अपने बच्चों को बताते थे कि देखो बेटा,ऐसे होते हैं आदर्श,उस दौर में रामायण सिफऱ् मनोरंजन नहीं थी,बल्कि सामाजिक शिक्षा का माध्यम थी,लोग पात्रों को पूजते थे,कलाकारों के चरण छूते थे और मानते थे कि राम के आदर्श समाज बदल देंगे,लेकिन समय बदला,अब रामायण टीवी से उतरकर भव्य पंडालों में आ चुकी है,कथाएं अब आध्यात्मिकता के साथ-साथ प्रतिष्ठा का प्रतीक बन चुकी हैं,जहां पहले कथा का उद्देश्य आत्मशुद्धि होता था,वहीं अब आयोजन की भव्यता,मंच की ऊंचाई, संत की लोकप्रियता और भीड़ की संख्या सफलता का पैमाना बन गई है,चिरमिरी की यह कथा भी कुछ वैसी ही रही,शहर में बड़े-बड़े पोस्टर लगे,मंच सजा,विशाल पंडाल तैयार हुआ,व्हीआईपी व्यवस्था बनी,नेताओं की उपस्थिति दर्ज हुई और हजारों लोग कथा सुनने पहुंचे,कोई पूरे सात दिन बैठा रहा,तो कोई सिफऱ् मंच तक पहुंचकर फोटो खिंचवाकर लौट गया,किसी ने कथा सुनी,किसी ने सिफऱ् सेल्फी ली,किसी ने संत का आशीर्वाद लिया और किसी ने फेसबुक पर लिख दिया आज पूज्य गुरुदेव के दर्शन का सौभाग्य मिला, लेकिन इसी भीड़ के बीच एक बूढ़ा सवाल फिर सिर उठाने लगा क्या कथा सुनने से सचमुच जीवन बदलता है?
राम को सुनना आसान,राम को जीना कठिन
भगवान राम का जीवन त्याग,सत्य,मर्यादा और न्याय का प्रतीक माना जाता है,उन्होंने राजपाट छोड़ा,वनवास स्वीकार किया, पिता के वचन की रक्षा की और प्रजा के लिए स्वयं का सुख त्याग दिया, लेकिन आज का समाज राम के नाम पर जयकारे तो लगाता है, पर क्या उनके आदर्शों पर चलना चाहता है? रामकथा में बैठे कई लोग अगले ही दिन अपने दफ्तरों में रिश्वत लेते दिखाई देते हैं, कथा में सत्य बोलो सुनने वाले लोग व्यापार में झूठ बोलते हैं, दूसरों का सम्मान करो सुनने वाले सोशल मीडिया पर गालियां देते हैं, धर्म का पालन करो सुनने वाले कमजोरों का हक मारते हैं, ऐसा लगता है जैसे कथा खत्म होते ही लोग राम को पंडाल में छोड़कर बाहर निकल आते हैं, चिरमिरी की कथा ने भी यही सवाल पैदा किया, सात दिनों तक हजारों लोगों ने राम के आदर्श सुने,लेकिन क्या अब शहर में भ्रष्टाचार खत्म हो जाएगा? क्या अधिकारी रिश्वत लेना बंद कर देंगे? क्या नेता झूठे वादे छोड़ देंगे? क्या समाज में कटुता कम होगी? या फिर कथा के अगले ही दिन सब कुछ पहले जैसा हो जाएगा?
रामराज्य की कल्पना या धार्मिक आयोजन की राजनीति?
रामराज्य शब्द सुनते ही लोगों के मन में आदर्श शासन की छवि आती है, ऐसा राज्य जहां न्याय हो,भय न हो,भ्रष्टाचार न हो और जनता सुखी हो,लेकिन आज रामराज्य का सबसे ज्यादा उपयोग भाषणों और नारों में दिखाई देता है,चिरमिरी में हुए इस आयोजन पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होने की चर्चा रही,हालांकि आधिकारिक आंकड़े सामने नहीं आए,लेकिन भव्य व्यवस्थाओं को देखकर अंदाजा लगाना कठिन नहीं था कि आयोजन बेहद बड़े स्तर पर हुआ,अब सवाल उठने लगे की अगर इतने पैसे शिक्षा, अस्पताल, गरीबों की मदद या शहर की समस्याओं पर खर्च होते तो क्या समाज को ज्यादा फायदा नहीं मिलता? क्या रामराज्य सिफऱ् मंच सजाने और नारे लगाने से आएगा? क्या रामराज्य का मतलब सिफऱ् धार्मिक आयोजन है या सामाजिक ईमानदारी भी? कई लोगों का मानना है कि रामकथा का वास्तविक उद्देश्य समाज में नैतिकता पैदा करना होना चाहिए, अगर कथा सुनने के बाद भी वही भ्रष्टाचार,वही कमीशनखोरी, वही स्वार्थ और वही राजनीतिक द्वेष चलता रहे, तो फिर कथा सिफऱ् एक वार्षिक उत्सव बनकर रह जाती है।
भक्ति कम,ब्रांडिंग ज्यादा?
आज के दौर में धर्म भी धीरे-धीरे प्रदर्शन का माध्यम बनता जा रहा है,कथा में पहुंचना अब सिफऱ् श्रद्धा का विषय नहीं रहा, बल्कि सामाजिक उपस्थिति का हिस्सा भी बन चुका है,नेता कथा में इसलिए दिखते हैं क्योंकि वहां भीड़ होती है,व्यापारी इसलिए दान देते हैं क्योंकि प्रतिष्ठा मिलती है,लोग इसलिए फोटो डालते हैं क्योंकि धार्मिक छवि बनती है,कई लोग कथा में ऐसे शामिल होते हैं जैसे किसी बड़े सांस्कृतिक महोत्सव में आए हों,व्हीआईपी कुर्सियां,मंच तक पहुंच,संत के साथ फोटो और सोशल मीडिया पोस्ट यही आधुनिक भक्ति का नया रूप बनता जा रहा है,कुछ लोग कथा में रोते भी हैं,भावुक भी होते हैं,लेकिन बाहर निकलते ही ट्रैफिक में किसी गरीब रिक्शेवाले पर चिल्लाते हुए दिखाई देते हैं, यही आधुनिक धार्मिकता का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
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