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अम्बिकापुर@ सरगुजा की आध्यात्मिक विरासत को राष्ट्रीय पहचान की तैयारी

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केंद्र सरकार की ‘ज्ञान भारतम्’ योजना के तहत दुर्लभ संस्कृत पाण्डुलिपियों का हुआ परीक्षण,संरक्षण और डिजिटाइजेशन की प्रक्रिया होगी शुरू….
अम्बिकापुर,26 मई 2026 (घटती-घटना)।
सरगुजा की सांस्कृतिक,आध्यात्मिक और तांत्रिक परंपरा से जुड़ी एक अनमोल धरोहर अब राष्ट्रीय स्तर पर संरक्षित होने की दिशा में आगे बढ़ रही है। शहर के प्रतिष्ठित पाण्डेय परिवार के पास पीढि़यों से सुरक्षित रखी गई दुर्लभ हस्तलिखित संस्कृत पाण्डुलिपियों का केंद्र सरकार की टीम ने गहन अवलोकन किया। ‘ज्ञान भारतम्’ योजना के तहत पहुंचे प्रशासनिक और सांस्कृतिक विशेषज्ञों ने इन ग्रंथों को भारतीय ज्ञान परंपरा की अमूल्य धरोहर बताया। इस अवसर पर सरगुजा संभाग आयुक्त (कमिश्नर) श्री नरेंद्र दुग्गा, संयुक्त कलेक्टर शारदा अग्रवाल, उप आयुक्त सहित कई प्रशासनिक अधिकारी एवं जगदलपुर से आए केंद्र सरकार के प्रतिनिधि मौजूद रहे। अधिकारियों ने लगभग तीन घंटे तक पाण्डुलिपियों का परीक्षण, जियो टैगिंग और दस्तावेजीकरण किया। टीम ने बताया कि अगले चरण में इन दुर्लभ ग्रंथों की हाई रिजोल्यूशन स्कैनिंग की जाएगी,ताकि आने वाली पीढि़यों के लिए इन्हें सुरक्षित रखा जा सके। इसके बाद संस्कृति मंत्रालय की विशेषज्ञ टीम इनके संरक्षण और संवर्धन का कार्य करेगी।
पीढि़यों से सुरक्षित रखी गई हैं दुर्लभ पाण्डुलिपियां : इन पाण्डुलिपियों को वर्तमान में राजेश पाण्डेय ‘अब्र’ के बड़े भाई राकेश पाण्डेय द्वारा सुरक्षित रखा गया है। बताया गया कि ये सभी ग्रंथ उनके प्रपितामह पंडित चतुर प्रसाद शर्मा द्वारा संस्कृत भाषा में स्वयं लिखे गए थे। कई पृष्ठों पर विक्रम संवत, लेखक का नाम और पारंपरिक चिह्न स्पष्ट रूप से अंकित हैं, जिससे इनकी ऐतिहासिक प्रमाणिकता और महत्व और अधिक बढ़ जाता है। पाण्डुलिपियों की स्थिति भले समय के साथ जर्जर हुई हो, लेकिन उनमें अंकित ज्ञान आज भी सुरक्षित है। अधिकारियों ने अवलोकन के दौरान पाया कि लेखन शैली, प्रयुक्त भाषा और संरचना अत्यंत प्राचीन भारतीय परंपरा को दर्शाती है।
कामाख्या पीठ से जुड़ा है परिवार का इतिहास : राजेश पाण्डेय ‘अब्र’ ने बताया कि उनके प्रपितामह और उनके भाई को तत्कालीन राजपरिवार स्वयं असम स्थित प्रसिद्ध कामाख्या पीठ से सरगुजा लेकर आया था। दोनों गुरु-शिष्य परंपरा से जुड़े तंत्र और ज्योतिष विद्या के विशिष्ट जानकार थे। उनकी विद्वता और साधना से प्रभावित होकर तत्कालीन राजा ने उन्हें राजपुरोहित का दायित्व सौंपा था। उन्होंने बताया कि परिवार ने इन पाण्डुलिपियों को केवल धार्मिक ग्रंथ मानकर नहीं बल्कि एक सांस्कृतिक धरोहर के रूप में संभालकर रखा। वर्षों तक इन्हें सुरक्षित रखने के पीछे उद्देश्य यही था कि आने वाली पीढि़यां भारतीय ज्ञान परंपरा की वास्तविक विरासत को समझ सकें।
‘ज्ञान भारतम्’ योजना से मिलेगी नई पहचान
केंद्र सरकार द्वारा संचालित ‘ज्ञान भारतम्’ योजना का उद्देश्य देशभर में बिखरी दुर्लभ पाण्डुलिपियों और पारंपरिक ज्ञान को खोजकर उसका डिजिटाइजेशन और संरक्षण करना है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की वास्तविक बौद्धिक विरासत केवल पुस्तकालयों तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारों परिवारों और आश्रमों में आज भी ऐसी दुर्लभ पाण्डुलिपियां सुरक्षित हैं। सरगुजा में मिले इन ग्रंथों को भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण खोज माना जा रहा है। अधिकारियों ने संकेत दिए कि परीक्षण और स्कैनिंग के बाद इन पाण्डुलिपियों को राष्ट्रीय स्तर पर पंजीकृत किया जा सकता है।
तंत्र साधना और ज्योतिष से जुड़े हैं ग्रंथ
परीक्षण के दौरान जिन ग्रंथों का अवलोकन किया गया उनमें ‘वन दुर्गा ‘, ‘प्रत्यंगिरा विधि ‘, ‘भैरव तंत्र’ और ‘भुजंग प्रयात छंद’ आधारित पाण्डुलिपियां प्रमुख हैं। विशेषज्ञों के अनुसार ये ग्रंथ सामान्य साहित्य नहीं बल्कि तंत्र साधना, ज्योतिष और आध्यात्मिक साधना की अत्यंत विशिष्ट परंपरा से जुड़े दस्तावेज हैं। विशेषज्ञों ने माना कि इस प्रकार की हस्तलिखित पाण्डुलिपियां अब बहुत कम परिवारों में सुरक्षित बची हैं। कई ग्रंथ तो समय के साथ नष्ट हो चुके हैं, ऐसे में इन पाण्डुलिपियों का संरक्षित मिलना अपने आप में बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
घर का माहौल बना उत्सव जैसा
अधिकारियों और विशेषज्ञों की मौजूदगी के दौरान पूरा घर उत्सव के माहौल में नजर आया। परिवार के अधिकांश सदस्य इस ऐतिहासिक क्षण के साक्षी बने। किसी ने इसे पूर्वजों के ज्ञान का सम्मान बताया तो किसी ने इसे सरगुजा की सांस्कृतिक पहचान का गौरवपूर्ण पल कहा। परिवार का कहना है कि वर्षों से संभालकर रखी गई यह विरासत अब देशभर के शोधकर्ताओं और विद्वानों तक पहुंचेगी, यही उनके पूर्वजों के ज्ञान को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।


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