अनोखा है यहा का ‘कठपुतली ब्याह’ और ‘दसराहा’ मेला
-संवाददाता-
अम्बिकापुर,25 मई 2026 (घटती-घटना)। भारत में गंगा,गोदावरी,यमुना,सरस्वती और ब्रह्मपुत्र जैसी नदियों को जीवनदायिनी मानकर पूजा जाता है। इनमें देव नदी गंगा का स्थान भारतीय जनमानस में सर्वोपरि है। इसी धार्मिक आस्था और लोक-संस्कृति का अनूठा संगम गंगा दशहरा को सरगुजा अंचल में देखने को मिलता है, जहाँ पारंपरिक श्रद्धा और उल्लास के साथ ‘गंगा दशहरा’का पर्व और भव्य दशहरा मेला आयोजित किया जाता है । भारत में गंगा,यमुना और गोदावरी जैसी नदियों को सिर्फ पानी का स्रोत नहीं,बल्कि जिंदगी देने वाली ‘प्राणदायिनी’ माना गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देश के दिल छत्तीसगढ़ के सरगुजा अंचल में गंगा मैया को अपने ही गाँव के तालाब में उतार लेने की एक बेहद खूबसूरत और अनूठी परंपरा है? जी हाँ, जेठ महीने की शुक्ल पक्ष की दशमी को यहाँ मनाया जाने वाला ‘गंगा दसराहा’ सिर्फ एक त्योहार नहीं,बल्कि जल संरक्षण, लोक संस्कृति, मनोरंजन और मानवीय संवेदनाओं का एक अद्भुत उत्सव है।
भगीरथ की तपस्या
और प्रकृति का उत्सव
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार,राजा भगीरथ ने अपने पूर्वजों की अस्थियों के उद्धार के लिए कठोर तपस्या कर देवी गंगा को पृथ्वी पर अवतरित किया था। ज्येष्ठ मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को हुए इसी पावन अवतरण की याद में गंगा दशहरा मनाया जाता है। राज्यपाल पुरस्कृत पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा वासियों की यह अटूट आस्था है कि गंगा दशहरे के दिन मैया दूर हिमालय से आकर उनके गांव के उस जलाशय में विराजती हैं,जहाँ पुरइन (कमल) के पत्ते खिले होते हैं। ग्रामीणों ने चर्चा में बताया कि ‘गंगा जी बहुत दूर हैं, इसलिए हम अपने गांव के तालाब को ही गंगा तुल्य मानकर पूजते हैं और पुण्य कमाते हैं।’—यह अटूट विश्वास है यहाँ के ग्रामीणों का।
इस दिन साल भर के शुभ कार्यों के प्रतीक : जैसे शादी का मौर, कंगन, कलश और यहाँ तक कि बच्चे के जन्म के समय की नाल व छठी के बाल को गाँव के बैगा (पुरोहित) की मौजूदगी में पूरे विधि-विधान से तालाब में विसर्जित (सेराना) किया जाता है। बच्चे की नाल को कमल की जड़ के नीचे गाड़ा जाता है,जो जल और जीवन के गहरे अंतर्संबंध को दर्शाता है।
जब गुड्डा-गुडिय़ा का रचाते हैं ब्याह : इस त्योहार का सबसे अनोखा और कौतुक जगाने वाला हिस्सा है कठपुतली विवाह। प्राचीन मनोरंजन की यह विधा यहाँ की कुंवारी लड़कियों के लिए परंपरा सीखने का जरिया है। लकड़ी से बने गुड्डा-गुड्डी का ब्याह पूरे तीन दिनों तक चलता है।
निभाई जाती हैं शादी की रस्में
मड़वा (मंडप) गाडऩे से लेकर विदाई तक, शादी की हर रस्म बड़े-बुजुर्गों की देखरेख में हूबहू निभाई जाती है। गाँव की लड़कियाँ दुल्हन की माँ और लडके दूल्हे के पिता बनते हैं। इसका मकसद बच्चों को मनोरंजन के साथ-साथ अपनी संस्कृति और संस्कारों से जोडऩा है। दशहरे के दिन इन कठपुतली दूल्हा-दुल्हन को जलाशय में विसर्जित कर दिया जाता है।
दान-पुण्य और सामाजिक
समरसता की अनूठी परंपरा
सरगुजा अंचल में गंगा दशहरा मनाने का ढंग बेहद खास और अनूठा है। इस दिन यहाँ दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। मेले और विसर्जन के लिए निकलने से पहले ग्रामीणों ने अपने सगे-संबंधियों को आदरपूर्वक घर पर निमंत्रित किया। परंपरा के अनुसार, अपनों को तेल, कपड़े, रोटी और यथाशक्ति नकद राशि दान स्वरूप भेंट की गई और उन्हें सप्रेम दशहरा मेला घूमने के लिए प्रेरित किया गया।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur