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सूरजपुर@ 7.40 करोड़ की सड़क में ‘विकास’ की धूल! नारियल फूटे तीन बार,गुणवत्ता पहली बारिश में बहने को तैयार?

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  • गंगौटी-शिवपुर सड़क में बेस कमजोर,बिल मजबूत! पीडब्ल्यूडी की इंजीनियरिंग पर उठे बड़े सवाल
  • सड़क कम,कमीशन की लेयर ज्यादा? 7.40 करोड़ की सड़क निर्माण में तकनीकी मानकों की उड़ती धज्जियां
  • घटिया बेस पर करोड़ों का डामर! ग्रामीण बोले जैसी बने,बस बन जाए सड़क
  • मिट्टी बैठी नहीं,लेकिन भुगतान की तैयारी शुरू! गंगौटी-शिवपुर सड़क निर्माण पर ग्रामीणों का फूटा गुस्सा
  • तीन भूमिपूजन,अधूरी गुणवत्ता और भागता सिस्टम! सड़क निर्माण में विकास नहीं, जल्दबाजी ज्यादा दिखी
  • पीडब्लूडी की सड़क या बरसाती प्रयोगशाला? कहीं पतली,कहीं मोटी सड़क पर उठे तकनीकी सवाल
  • किसानों ने जमीन दी,सिस्टम ने घटिया निर्माण दिया! 7.40 करोड़ की सड़क पर विभागीय चुप्पी
  • वाइब्रेटर रोलर चला कम,भ्रष्ट व्यवस्था ज्यादा! गुणवत्ता विहीन सड़क निर्माण पर ग्रामीणों की पैनी नजर
  • पहले फोटो, फिर फीता,अब फटाफट सड़क! खबर छपते ही हरकत में आया पूरा सिस्टम
  • बरसात से पहले सड़क या बरसात के बाद गड्ढे? गंगौटी-शिवपुर मार्ग पर निर्माण से ज्यादा सवाल


ओंकार पाण्डेय
सूरजपुर,25 मई 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर अंचल की बहुचर्चित गंगौटी-शिवपुर-नवापारा सड़क आखिरकार फिर सुर्खियों में है, वर्षों तक गड्ढों, कीचड़ और सरकारी वादों के बीच पिसते ग्रामीणों की आवाज जब लगातार खबरों के जरिए बाहर आई, तब जाकर प्रशासन, पीडब्ल्यूडी और ठेकेदारी सिस्टम की नींद टूटी, 7 करोड़ 40 लाख रुपए की लागत से बनने वाली यह सड़क अब तेजी से बनाई जा रही है, लेकिन निर्माण की शुरुआत ने ही गुणवत्ता पर ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं कि ग्रामीण कहने लगे हैं सड़क बन रही है या भविष्य का घोटाला? यह वही सड़क है जिसका तीन-तीन बार भूमिपूजन हुआ, हर बार नेता आए, नारियल फोड़ा गया, फीता कटा, फोटो खिंचे, सोशल मीडिया पोस्ट चमके और जनता को बताया गया कि विकास अब दौड़ेगा है, लेकिन विकास इतना धीरे दौड़ा कि सड़क बनने से पहले ही कई ग्रामीण बूढ़े हो गए, अब जब अखबारों ने सवाल उठाए, ग्रामीणों ने विरोध दर्ज कराया और किसानों ने प्रशासन को आईना दिखाया, तब जाकर मशीनें मैदान में उतरीं, मगर सवाल यह है कि क्या यह सड़क टिकाऊ बनेगी या पहली बारिश में फिर सरकारी इंजीनियरिंग की पोल खोल देगी?
किसानों ने दिखाई इंसानियत,सिस्टम ने दिखाई बेशर्मी
इस सड़क की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जिन किसानों की जमीन सड़क निर्माण में गई, उन्हें आज तक पूरा मुआवजा नहीं मिला, फिर भी किसान अत्री साहू सहित कई ग्रामीणों ने गांव और जनहित को देखते हुए अपनी जमीन सड़क निर्माण के लिए दे दी, यह वही किसान हैं जिन्हें चुनावी मंचों पर देश का अन्नदाता कहकर सम्मानित किया जाता है, लेकिन जब फाइलों में उनका नाम आता है तो वही किसान सरकारी प्रक्रिया में सबसे आखिरी पायदान पर पहुंच जाता है, ग्रामीणों का कहना है कि सड़क गांव के लिए जरूरी थी, इसलिए उन्होंने विरोध नहीं किया, लेकिन बदले में उन्हें सिर्फ आश्वासन मिला, मुआवजा फाइलों में घूमता रहा और सड़क राजनीति के मंचों पर है, विडंबना देखिए की गरीब किसान बिना मुआवजे के विकास का रास्ता दे रहा है, और करोड़ों की परियोजना में गुणवत्ता शुरू से ही संदिग्ध दिखाई दे रही है।
क्या आंख पर पट्टी या सुविधा की चुप्पी?
अब सबसे बड़ा सवाल पीडब्ल्यूडी विभाग की भूमिका पर उठ रहा है, जब करोड़ों रुपए की परियोजना पर काम चल रहा है, तब अधिकारी आखिर क्या कर रहे हैं? क्या वे सब देखकर भी चुप हैं? या फिर उन्हें सिर्फ फाइलों की प्रगति दिखाई दे रही है? ग्रामीण तंज कस रहे हैं लगता है इंजीनियर साहब सड़क की मजबूती नहीं, बिल की मोटाई चेक कर रहे हैं, लोगों का आरोप है कि यदि शुरुआत में ही इतनी अनियमितताएं दिख रही हैं तो आगे स्थिति और खराब हो सकती है।
ग्रामीणों की मजबूरी,घटिया ही सही,पर बन जाए
इस पूरे मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि ग्रामीण अब गुणवत्ता की लड़ाई से ज्यादा सड़क बन जाने की प्रार्थना कर रहे हैं, बरसात नजदीक है गांव की हालत हर साल खराब हो जाती है, मरीज अस्पताल नहीं पहुंच पाते, बच्चे स्कूल जाने में परेशान होते हैं और किसानों की उपज फंस जाती है, ऐसे में लोग कह रहे हैं जैसी भी बने, बस सड़क बन जाए, यह सिर्फ मजबूरी नहीं, बल्कि सरकारी व्यवस्था पर जनता के टूट चुके भरोसे की सबसे बड़ी तस्वीर है।
तीन भूमिपूजन और राजनीति की रिटेनिंग वॉल
ग्रामीण बताते हैं कि इस सड़क का तीन बार भूमिपूजन हुआ, हर बार नेताओं ने विकास के बड़े-बड़े दावे किए। फोटो खिंचे, नारियल फूटे, भाषण हुए, लेकिन सड़क नहीं बनी, अब जब खबरों ने दबाव बनाया, तब जाकर सड़क निर्माण शुरू हुआ, लोग मजाक में कह रहे हैं इस सड़क पर डामर से ज्यादा नारियल खर्च हो चुका है।
ग्रामीणों की मांग हर लेयर की स्वतंत्र जांच हो…
अब ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि सड़क निर्माण की हर प्रक्रिया की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, उनकी मांग है की मिट्टी कंपैक्शन का एफडीटी टेस्ट सार्वजनिक हो, जीएसबी और डब्लूएमएम की लैब रिपोर्ट जारी हो, सड़क की पूरी चौड़ाई डिजिटल माप से जांची जाए, निर्माण स्थल पर गुणवत्ता बोर्ड लगाया जाए, जिम्मेदार इंजीनियरों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित हो, ग्रामीणों का कहना है कि यदि अभी निगरानी नहीं हुई तो करोड़ों रुपए की यह सड़क भविष्य में फिर सरकारी लापरवाही की मिसाल बन जाएगी।
कमीशनखोरी बनाम गुणवत्ता — असली लड़ाई यही है…
ग्रामीणों का कहना है कि सड़क निर्माण में सबसे बड़ी समस्या तकनीकी नहीं,मानसिकता की है,जब परियोजना की शुरुआत गुणवत्ता से नहीं बल्कि कितना ऊपर जाएगा से होती है,तब सड़क की उम्र पहले दिन ही तय हो जाती है,लोगों का आरोप है कि सड़क निर्माण अब विकास नहीं,बल्कि कमीशन आधारित इंजीनियरिंग बन चुका है। जहां सड़क की मोटाई से ज्यादा प्रतिशत की परतें मजबूत होती हैं।
सबसे बड़ा सवाल,क्या पहली बारिश में खुल जाएगी पोल?
तकनीकी विशेषज्ञ साफ मानते हैं कि यदि अभी गुणवत्ता सुधार नहीं हुआ तो पहली तेज बारिश के बाद सड़क की वास्तविक स्थिति सामने आ जाएगी,कमजोर बेस,खराब कंपैक्शन,घटिया जीएसबी और असमान लेवलिंग भविष्य में धंसाव और गड्ढों का कारण बन सकती है, फिर वही पुरानी कहानी दोहराई जाएगी जांच समिति बनेगीज् नोटिस जारी होंगेज् ठेकेदार सफाई देगाज् और जनता फिर गड्ढों में सफर करेगी।
सड़क बन रही है या भरोसा टूट रहा है?
गंगौटी-शिवपुर सड़क अब सिर्फ सड़क परियोजना नहीं रही, यह सरकारी जवाबदेही, तकनीकी ईमानदारी और ग्रामीण धैर्य की परीक्षा बन चुकी है,एक तरफ किसान बिना मुआवजे के विकास का रास्ता खोल रहे हैं,दूसरी तरफ विभागीय उदासीनता और ठेकेदारी मॉडल उस रास्ते को शुरुआत से ही कमजोर बनाने में जुटा दिखाई दे रहा है,खबरों के दबाव में काम तो शुरू हो गया,लेकिन अब जनता सिर्फ सड़क नहीं देख रही…जनता मिट्टी की हर परत,रोलर की हर आवाज और डामर की हर मोटाई पर नजर रख रही है, क्योंकि इस बार सवाल सिर्फ सड़क का नहीं…7 करोड़ 40 लाख रुपए के भरोसे का है।
तकनीकी मानकों की कहानी और जमीन की हकीकत
पीडब्लूडी की स्वीकृति के अनुसार इस सड़क की कुल चौड़ाई 9 मीटर निर्धारित है, तकनीकी प्रक्रिया के अनुसार पहले 7 मीटर हिस्से में मिट्टी भराई,पानी का छिड़काव और वाइब्रेटर रोलर से सही कंपैक्शन होना चाहिए, इसके बाद जीएसबी (ग्रैन्युलर सब बेस) फिर डब्लूएमएम (वेट मिक्स मैकैडम) और अंत में लगभग 3.90 मीटर चौड़ाई में डामर बिछाया जाना है, तकनीकी विशेषज्ञ बताते हैं कि सड़क निर्माण में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बेस लेयर होता है, यदि मिट्टी सही तरीके से बैठी नहीं, तो ऊपर की पूरी सड़क भविष्य में धंसने और टूटने लगती है,लेकिन ग्रामीणों और मौके पर मौजूद लोगों का आरोप है कि यहां मिट्टी डालने के बाद पर्याप्त पानी नहीं डाला गया,वाइब्रेटर रोलर औपचारिकता निभाता दिखाई दे रहा है,कई जगह बेस असमान है,कहीं सड़क ऊंची है,कहीं नीचे, कहीं चौड़ाई ज्यादा है, कहीं कम,यानी शुरुआत ही ऐसी दिखाई दे रही है कि सड़क से ज्यादा चिंता उसकी उम्र को लेकर होने लगी है।
घटिया जीएसबी और कमजोर बेस पर उठे गंभीर सवाल
सड़क निर्माण में जीएसबी यानी सड़क की रीढ़ मानी जाती है,इसमें निर्धारित गुणवत्ता के पत्थर और ग्रेन्युलर सामग्री का उपयोग होना चाहिए ताकि सड़क भारी वाहनों का भार सह सके, लेकिन ग्रामीणों का आरोप है कि यहां निम्न गुणवत्ता की जीएसबी सामग्री उपयोग की जा रही है,कई जगह मिट्टी मिश्रित सामग्री दिखाई दे रही है,यदि जीएसबी कमजोर होगी तो डब्लूएमएम और डामर की परत भी ज्यादा दिन टिक नहीं पाएगी, विशेषज्ञों के अनुसार मिट्टी भराई के बाद ऑप्टिमम मॉइस्चर कंटेंट बनाए रखना जरूरी होता है,यानी मिट्टी को पर्याप्त पानी देकर रोलर से दबाना चाहिए ताकि उसमें भविष्य में धंसाव न हो,लेकिन यहां कई जगह सूखी मिट्टी पर ही रोलर चला दिया गया, इसका परिणाम यह हुआ कि सड़क की लेवलिंग पूरी तरह संतुलित नहीं दिख रही,भविष्य में यही सड़क दरारों और गड्ढों की फैक्ट्री बन सकती है।
कहीं पतली,कहीं मोटी — सड़क कम…प्रयोग ज्यादा…
ग्रामीणों का कहना है कि यदि सड़क की चौड़ाई शुरू से अंत तक नापी जाए तो कई जगह भारी अंतर दिखाई देगा,कहीं सड़क मानक से कम चौड़ी है,कहीं साइड क्लियरेंस नहीं है,तो कहीं बिना सही कटिंग किए काम आगे बढ़ा दिया गया,तकनीकी रूप से सड़क निर्माण में फॉर्मेशन विड्थ समान होना बेहद जरूरी होता है,यदि सड़क की चौड़ाई और बेस हर जगह समान नहीं होगी तो सड़क किनारों से टूटने लगेगी,ग्रामीण व्यंग्य में कह रहे हैं लगता है सड़क इंजीनियरिंग से नहीं,अंदाजे से बनाई जा रही है।
दो-दो फीट की नाली,लेकिन ड्रेनेज सिस्टम पर खतरा
सड़क के दोनों ओर दो-दो फीट चौड़ी नालियां बनाई जा रही हैं,लेकिन ग्रामीणों और जानकारों का कहना है कि नालियों की गहराई और ढलान तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं दिख रही,विशेषज्ञ बताते हैं कि सड़क की सबसे बड़ी दुश्मन बारिश का पानी होता है,यदि पानी सड़क के बेस में घुस गया तो मिट्टी कमजोर हो जाएगी और सड़क जल्दी टूटने लगेगी, यानी यदि ड्रेनेज सिस्टम मजबूत नहीं हुआ तो करोड़ों रुपए की सड़क पहली ही बरसात में जवाब दे सकती है।
युद्ध स्तर पर काम,लेकिन गुणवत्ता आईसीयू में…
सबसे हैरानी की बात यह है कि निर्माण कार्य युद्ध स्तर पर चल रहा है, मशीनें लगातार काम कर रही हैं, मजदूर तेजी से लगे हुए हैं, लेकिन गुणवत्ता जांच कहीं दिखाई नहीं दे रही, ग्रामीण पूछ रहे हैं क्या मिट्टी का Field Density Test हो रहा है? क्या GSB और WMM की लैब जांच हुई? क्या लेवल मशीन से हर हिस्से की माप ली गई? क्या इंजीनियर नियमित साइट निरीक्षण कर रहे हैं? यदि यह सब हो रहा है तो फिर सड़क का बेस शुरुआत से ही असमान क्यों दिख रहा है?


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