

- जनगणना में जनता कम,सरकार की कमियां ज्यादा गिनने लगीं तो बदलने लगे आंकड़े?
- जब जनगणना में खुलने लगी योजनाओं की पोल, तब शुरू हुआ ‘रिपोर्ट सुधार अभियान’!
- जब आंकड़ों ने खोली योजनाओं की पोल, तब सच्चाई पर ही लग गया एडिट मोड
- जनगणना बनी ‘इमेज मैनेजमेंट योजना’? शिक्षकों के आरोपों से मचा हड़कंप
- सरकारी योजनाओं की असलियत जनगणना में आई सामने, अब डेटा बदलने का आरोप
- घर-घर जाकर जुटाई सच्चाई,सिस्टम बोला—”रिपोर्ट थोड़ी चमकाइए!“
- कच्चे घरों को पक्का, लकड़ी के चूल्हे को गैस बताने, जनगणना में आंकड़ों का खेल?
- जनगणना के नाम पर ‘विकसित भारत’ की पेंटिंग? प्रगणकों ने खोली पोल
- ओडीएफ गांवों की जमीन पर हकीकत अलग, आंकड़ों में सब चमकदार!
- जनगणना या सरकारी इमेज मैनेजमेंट? कोरिया जिले से उठे बड़े सवाल
- शौचालय बिना घर भी ‘सुविधाभोगी’, जनगणना में सच्चाई छिपाने का आरोप
- तपती धूप में जुटाई सच्चाई, पोर्टल पर बदलने का दबाव—जनगणना पर विवाद
- जनगणना की गणित में गरीबी गायब! प्रगणकों के आरोपों से मचा हड़कंप
- सिस्टम चाहता है ‘संतृप्त भारत’, प्रगणक बता रहे अभाव की असली कहानी
- घर-घर जाओ, लेकिन सच मत लाओ!— जनगणना पर प्रगणकों का बड़ा आरोप
-संवाददाता-
बैकुंठपुर/कोरिया, 25 मई 2026 (घटती-घटना)। सरकार देश की जनसंख्या गिनने निकली थी, लेकिन जैसे-जैसे प्रगणक गांव-गांव पहुंचे, वैसे-वैसे सरकार की योजनाओं की असली स्थिति भी गिनती में आने लगी, कहीं शौचालय सिर्फ कागज में मिला, कहीं उज्ज्वला का सिलेंडर कोने में धूल खाता मिला, कहीं नल योजना के पाइप तो दिखे लेकिन पानी नहीं दिखा, यानी जनगणना का मकसद था लोगों की संख्या जानना, लेकिन इस दौरान सरकार की कमियों की भी जनगणना शुरू हो गई। और शायद यहीं से पूरी कहानी असहज होने लगी, प्रगणकों का आरोप है कि जब वास्तविक आंकड़े सिस्टम में दर्ज होने लगे और गांवों की सच्चाई सरकारी दावों से मेल नहीं खाने लगी, तब अचानक रिपोर्ट सुधारो अभियान शुरू हो गया, अब शिक्षकों पर कथित तौर पर यह दबाव बनाया जा रहा है कि आंकड़े ऐसे भरे जाएं जिससे हर गांव विकसित, हर घर सुविधायुक्त और हर योजना शत-प्रतिशत सफल दिखाई दे, व्यंग्य यह है कि सरकार को शायद डर जनसंख्या बढ़ने का नहीं, बल्कि कमियों की गिनती बढ़ने का ज्यादा दिखाई देने लगा, इसलिए अब हालत यह हो गई है कि जहां लकड़ी के धुएं में रोटी बन रही है वहां एलपीजी लिखने की सलाह है, जहां लोग खुले में जा रहे हैं वहां शौचालय उपलब्ध दिखाने का दबाव है, और जहां अधूरा मकान बरसात में टपक रहा है वहां पक्का आवास दर्ज करने की बात हो रही है, यानी अब जनगणना केवल लोगों की नहीं, बल्कि सरकारी छवि बचाने की कवायद बनती नजर आ रही है, ऐसा लग रहा है मानो सिस्टम कह रहा हो सच्चाई कम दिखाओ, विकास ज्यादा दिखाओ, और इसी के बाद शिक्षकों के बीच यह व्यंग्यात्मक चर्चा भी शुरू हो गई कि अगर आखिर में आंकड़े सरकार के हिसाब से ही भरने हैं, तो फिर इतनी गर्मी में घर-घर भेजने की क्या जरूरत थी? एसी कमरे में बैठकर ही पूरे जिले को संपूर्ण विकसित घोषित कर दिया जाता। बता दे की छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले से जो आवाजें निकलकर सामने आ रही हैं, वे इस पूरी प्रक्रिया को ही कटघरे में खड़ा कर रही हैं, सवाल उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में जनगणना है, या फिर जनभावना प्रबंधन अभियान, जिसमें गरीबी को सरकारी पोर्टल पर अपलोड होने से पहले ही संपादित कर दिया जाता है? गर्मी ऐसी कि सड़क पर अंडा फूट जाए तो ऑमलेट बन जाए, उस तापमान में शिक्षक गांव-गांव घूम रहे हैं, हाथ में मोबाइल, कंधे पर बैग, माथे पर पसीना और दिमाग में प्रशिक्षण की बातें, उन्हें सिखाया गया था कि घर-घर जाकर वास्तविक जानकारी जुटानी है, किसके घर में शौचालय है, कौन लकड़ी पर खाना बना रहा है, किसके पास पानी नहीं है, कौन कच्चे मकान में रह रहा है सब दर्ज करना है, लेकिन आरोप यह है कि जब यही जानकारी ऑनलाइन दर्ज होने लगी और वास्तविक तस्वीर उभरने लगी, तब अचानक सिस्टम को विकास खतरे में दिखाई देने लगा।
प्रशासन की चुप्पी और जनता का सवाल
अब तक प्रशासन की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक बयान सामने नहीं आया है। लेकिन सवाल लगातार उठ रहे हैं,अगर प्रगणकों के आरोप गलत हैं, तो स्पष्ट खंडन होना चाहिए। और अगर सही हैं, तो यह सिर्फ एक जिले का मामला नहीं, पूरे तंत्र पर सवाल है।
आंकड़ों की सजावट से हकीकत नहीं बदलती…
भारत की सबसे बड़ी ताकत उसकी सच्चाई है, अगर जनगणना जैसी प्रक्रिया भी इमेज मैनेजमेंट का हिस्सा बन जाएगी, तो फिर गरीब सिर्फ योजनाओं में जिंदा रहेगा, जमीन पर नहीं, कागज पर गरीबी खत्म करना आसान है, लेकिन गांव की रसोई का धुआं, टूटी दीवारें, खाली पानी की टंकियां और खेत की ओर जाते लोग अब भी वही कहानी कह रहे हैं, जिसे शायद सिस्टम सुनना नहीं चाहता, और आखिर में वही सवाल सबसे भारी पड़ता है अगर सच्चाई लिखनी ही नहीं है, तो फिर इतनी गर्मी में जनगणना कराने की जरूरत क्या है?
जो दिखे वो मत लिखो,जो अच्छा लगे वो लिखो! क्या था जनगणना का प्रशिक्षण?
प्रगणकों का दावा है कि प्रशिक्षण के दौरान उनसे कहा गया था कि मकान मालिक जो बताए,वही दर्ज करें,लेकिन कई शिक्षकों ने जिम्मेदारी दिखाते हुए केवल कथन नहीं,भौतिक स्थिति भी देखी,और यहीं से समस्या शुरू हो गई,क्योंकि जमीन की सच्चाई सरकारी भाषणों से मेल नहीं खा रही थी,जहां गांव ओडीएफ घोषित हो चुके थे,वहां लोग आज भी खेत की मेड़ और नहर किनारे सुबह की सैर पर जाते दिखाई दिए,जहां उज्ज्वला योजना के तहत गैस कनेक्शन बांटे गए थे,वहां रसोई में गैस सिलेंडर धूल खा रहा था और चूल्हे में लकड़ी जल रही थी,लेकिन अब आरोप यह है कि शिक्षकों से कहा जा रहा है कि ऐसी जानकारी मत भरो जिससे नकारात्मक तस्वीर बने,यानी अगर घर में शौचालय नहीं है, तब भी है लिखो, अगर गैस का उपयोग नहीं हो रहा,तब भी एलपीजी लिखो, अगर मकान आधा मिट्टी और आधा तिरपाल से बना है,तब भी पक्का लिखो,लगता है अब जनगणना नहीं, राष्ट्रीय सकारात्मकता अभियान चल रहा है।
उज्ज्वला योजना : सिलेंडर आया, रिफिल नहीं आया
सरकार ने वर्षों तक मंचों से कहा कि गरीब महिलाओं को धुएं से मुक्ति दिलाई गई,सिलेंडर बांटे गए, फोटो खिंचे, पोस्टर लगे, विज्ञापन बने,लेकिन गांवों की रसोई कुछ और कहानी कह रही है,कई घरों में सिलेंडर को लोग ऐसे संभालकर रखे हुए हैं जैसे शादी में मिला कोई कीमती गिफ्ट हो,उपयोग इसलिए नहीं क्योंकि गैस भरवाना जेब के बाहर है,नतीजा यह कि लकड़ी, उपले और कोयले पर ही खाना बन रहा है,अब अगर जनगणना में सबको एलपीजी उपयोगकर्ता दिखा दिया जाएगा,तो सरकार को कैसे पता चलेगा कि योजना का दूसरा हिस्सा अब भी अधूरा है? लेकिन शायद असली लक्ष्य समस्या हल करना नहीं,समस्या को डेटा से गायब करना है।
ओडीएफ का ऐसा जादू कि खेत भी ‘शौचालय’ घोषित हो जाएं!
भारत को खुले में शौच से मुक्त घोषित करने के बाद लगा था कि अब गांवों की तस्वीर बदल जाएगी,लेकिन प्रगणकों का दावा है कि कई जगह शौचालय हैं ही नहीं,और जहां हैं भी,वहां पानी नहीं, टंकी नहीं, दरवाजा नहीं या उपयोग की आदत नहीं, फिर भी अगर डेटा में सब संतृप्त दिखेंगे,तो कागज पर भारत स्वच्छ रहेगा और जमीन पर लोग अब भी खेत खोजते रहेंगे, व्यंग्य यह है कि अब शायद आने वाले समय में सरकारी रिपोर्ट यह भी कह दे कि गांवों में खुले में शौच नहीं होता, लोग प्राकृतिक वातावरण में स्वास्थ्य योग करते हैं।
कच्चे मकानों को पक्का दिखाने की कला, आंकड़ों का सीमेंट बहुत मजबूत है
प्रधानमंत्री आवास योजना की सफलता के बड़े-बड़े दावे हुए, लेकिन जनगणना में जुटी जानकारी कथित तौर पर अलग तस्वीर दिखा रही थी,कई घर ऐसे मिले जहां दीवारें मिट्टी की,छत टीन की और बरसात में पूरा परिवार बाल्टी लेकर बैठता है,लेकिन यदि उन्हें भी पक्का मकान घोषित कर दिया जाएगा,तो फिर योजना पूरी मानी जाएगी, यानी गरीब के घर में बारिश टपक रही है, लेकिन सरकारी आंकड़ों में वहां मॉडर्न हाउसिंग सुविधा उपलब्ध है।
डिजिटल इंडिया का नया अध्याय,एडिट करो और डेटा गायब करो
जनगणना में लगे शिक्षक शिक्षिका की सबसे बड़ी परेशानी तकनीकी व्यवस्था को लेकर भी सामने आई है,आरोप है कि जब वे पहले से भरे डेटा को एडिट करने जाते हैं,तो पूरा कॉलम ही डिलीट हो जाता है,अब जिन्होंने सारी जानकारी सीधे मोबाइल में भरी थी और कहीं नोट नहीं की,वे दोबारा गांव जाकर याददाश्त के भरोसे डेटा भर रहे हैं,इस स्थिति ने शिक्षकों को दोहरी मार दी है,पहले धूप की मार,फिर सिस्टम की मार,एक शिक्षक ने व्यंग्य में कहा की अगर आखिर में ऑफिस में बैठकर ही आंकड़े तय करने हैं,तो हमें गांव भेजने की क्या जरूरत थी? एसी कमरे में बैठकर ही पूरे जिले को विकसित घोषित कर देते।
जनगणना या ‘जन-संतुष्टि प्रमाण-पत्र वितरण योजना’?
असल सवाल यही है,अगर हर गरीब को सुविधाभोगी दिखाना हैज् हर जरूरतमंद को संतृप्त दिखाना हैज्हर समस्या को उपलब्धि में बदलना है तो फिर जनगणना का उद्देश्य क्या बचता है? जनगणना इसलिए होती है ताकि सरकार को पता चले कि देश में कितने लोगों के पास मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं,ताकि नीति बने, बजट बने,योजनाएं बनें,लेकिन यदि शुरुआत में ही वास्तविक तस्वीर बदल दी जाएगी,तो फिर योजनाएं किस आधार पर बनेंगी? यह वैसा ही है जैसे डॉक्टर मरीज की रिपोर्ट देखकर कहे बीमारी तो है,लेकिन रिपोर्ट में स्वस्थ लिख दो,वरना अस्पताल की छवि खराब हो जाएगी।
शिक्षक बने प्रगणक,प्रगणक बने डेटा कलाकार
यह भी विडंबना है कि जिन शिक्षकों को बच्चों को सच और नैतिकता सिखानी चाहिए,उन्हें अब कथित तौर पर सकारात्मक डेटा निर्माण की कला सिखाई जा रही है,वे गांव-गांव घूम रहे हैं,लेकिन कई लोगों का कहना है कि असली सर्वे अब फील्ड में नहीं, सिस्टम की सोच में होना चाहिए, क्योंकि आंकड़े सिर्फ नंबर नहीं होते, वे नीति बनाते हैं, सरकार की दिशा तय करते हैं और आने वाली पीढि़यों का भविष्य भी।
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