Breaking News

रायपुर@दागियों पर मेहरबानी या सिस्टम की मजबूरी? औषधि विभाग की प्रमोशन सूची ने खड़े किए बड़े सवाल

Share

  • रिश्वत,घोटाले और जांच के साए में भी प्रमोशन की दौड़…आखिर किसका संरक्षण और किसका खेल?
  • 80 हजार रिश्वत कांड के आरोपी और ष्टत्ररूस्ष्ट घोटाले में नाम… फिर भी प्रमोशन की तैयारी!
  • दागियों को प्रमोशन? औषधि
  • विभाग की सूची पर मचा बवाल!
  • रिश्वत,घोटाले और जांच के बावजूद
  • प्रमोशन की दौड़ में अधिकारी!
  • एसीबी के शिकंजे से सचिवालय तक…
  • आखिर किसके संरक्षण में चल रहा खेल?
  • औषधि विभाग में प्रमोशन या ‘प्रबंधन ‘? विवादित नामों ने बढ़ाई सरकार की मुश्किलें
  • फाइल सचिवालय पहुंची,फिर लौटी वापस…क्या दागियों को बचाने की तैयारी?
  • स्थापना शाखा पर सवालः
  • योग्य बाहर,विवादित अंदर?
  • दाग अच्छे हैं? औषधि विभाग की
  • प्रमोशन सूची ने खड़े किए बड़े सवाल
  • न्यूज डेस्क-
    रायपुर 14 मई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग के अंतर्गत औषधि प्रशासन विभाग इन दिनों किसी दवा नियंत्रण व्यवस्था से ज्यादा ‘प्रमोशन प्रबंधन विभाग’ के रूप में चर्चा में है, विभाग में एडीसी से डिप्टी ड्रग कंट्रोलर पद पर प्रमोशन की प्रक्रिया चल रही है, लेकिन इस प्रक्रिया ने अब कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं,वजह यह है कि जिन अधिकारियों के नाम भ्रष्टाचार,रिश्वतखोरी और कथित घोटालों में सामने आ चुके हैं,वही अधिकारी अब प्रमोशन सूची में चमकते दिखाई दे रहे हैं,विभागीय गलियारों में चर्चा यह नहीं है कि किस अधिकारी ने अच्छा काम किया, बल्कि यह है कि आखिर ‘दागियों’ के नाम सूची तक पहुंचे कैसे? और यदि पहुंचे भी,तो किसके संरक्षण में पहुंचे? सूत्रों की मानें तो इस पूरी प्रक्रिया के केंद्र में स्थापना शाखा,ड्रग कंट्रोलर कार्यालय और कुछ प्रभावशाली अधिकारी हैं,जिन पर आरोप लग रहे हैं कि वे नियमों की किताब को अपने हिसाब से पलट रहे हैं।
    ‘दाग अच्छे हैं’ वाला प्रशासनिक मॉडल?
    विभागीय कर्मचारियों के बीच अब व्यंग्य में एक लाइन खूब चल रही है अब विभाग में दाग अच्छे हैं… कम से कम प्रमोशन के लिए,यह मामला केवल दो अधिकारियों का नहीं है,यह पूरे प्रशासनिक सिस्टम की पारदर्शिता, जवाबदेही और निष्पक्षता पर सवाल है,यदि रिश्वत और घोटाले के आरोपों से घिरे अधिकारी प्रमोशन पाते हैं, तो यह उन अधिकारियों के साथ भी अन्याय होगा जिन्होंने वर्षों तक बिना विवाद सेवा दी।
    80 हजार की रिश्वत
    और फिर भी प्रमोशन की उम्मीद!

    इस पूरे विवाद में सबसे चर्चित नाम है रविंद्र गेंदले का, वर्तमान में वे जांजगीर-चांपा में एडीसी की जिम्मेदारी संभाल रहे हैं और अब डिप्टी ड्रग कंट्रोलर बनने की दौड़ में बताए जा रहे हैं,लेकिन सवाल यह है कि क्या विभाग इतना ‘उदार’ हो चुका है कि रिश्वत के आरोप भी अब प्रमोशन में बाधा नहीं रहे? मीडिया रिपोर्ट्स और विभागीय चर्चाओं के अनुसार रविंद्र गेंदले पर आरोप था कि उन्होंने एक निरस्त लाइसेंस को दोबारा बहाल करने के एवज में 80 हजार रुपये की मांग की थी,शिकायतकर्ता ने इसकी शिकायत एसीबी से की,बताया जाता है कि गेंदले ने रकम सीधे हाथ में लेने के बजाय अपने कार्यालय के पास स्थित एक दुकान में रखने को कहा था, बाद में एसीबी ने कार्रवाई करते हुए उन्हें रकम लेते समय गिरफ्तार किया,उनके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मामला दर्ज हुआ,मामला न्यायालय में विचाराधीन बताया जाता है,लेकिन विभागीय प्रमोशन सूची में नाम देखकर कर्मचारियों की जुबान पर सिर्फ एक ही सवाल है — ‘क्या अब रिश्वतखोरी भी अनुभव की श्रेणी में गिनी जाएगी’?
    CGMSC घोटाले की छाया और प्रमोशन का उजाला
    दूसरा बड़ा नाम है हिरेन मनुभाई पटेल का,वर्तमान में वे राजनांदगांव जैसे बड़े जिले में एडीसी पद पर पदस्थ बताए जा रहे हैं, लेकिन उनका नाम कथित CGMSC मोक्षित कॉरपोरेशन भुगतान मामले में सामने आया था, अब इस मामले में सामने आए शासकीय पत्र ने विवाद को और गहरा कर दिया है, लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग, महानदी भवन से जारी पत्र क्रमांक LAW-42018/25/2025-HEALTH SECTION-2 दिनांक 19 जनवरी 2026 में जीएम (टेक्निकल) हिरण हिरेन मनुभाई पटेल एवं जीएम (फाइनेंस) मिनाक्क्षी गौतम के खिलाफ शिकायत का उल्लेख किया गया है, पत्र में कहा गया कि ‘Ms ANG Life Science India Ltd.’ को नियम विरुद्ध तरीके से करोड़ों रुपये के भुगतान किए जाने की शिकायत प्राप्त हुई थी, इतना ही नहीं, पत्र में EOW/ACB से प्राप्त स्मरण पत्र का भी हवाला दिया गया है और मामले में तथ्यात्मक प्रतिवेदन मांगा गया है, अब सवाल यह उठता है कि जब किसी अधिकारी का नाम शिकायत, जांच और EOW/ACB पत्राचार में दर्ज हो,तो फिर वह प्रमोशन सूची में कैसे शामिल हो सकता है? लेकिन विभाग में शायद नियमों की नई परिभाषा लिखी जा रही है — ‘जांच चल रही है, इसलिए प्रमोशन रोकना उचित नहीं! ‘
    हाईकोर्ट में मामला लंबित,फिर भी विभाग में सब ‘सामान्य ‘?
    शिकायत में सामने आए हाईकोर्ट दस्तावेजों के अनुसार मामला अभी भी विचाराधीन है, बिलासपुर हाईकोर्ट में ‘छत्तीसगढ़ राज्य बनाम रविंद्र कुमार गेंडले ‘शीर्षक से ्रष्टक्त्र हृश.324/2019 लंबित बताया गया है,दस्तावेजों में यह भी दर्ज है कि स्नढ्ढक्र एंटी करप्शन ब्यूरो रायपुर में 2016 में दर्ज हुई थी, अब विभागीय कर्मचारियों के बीच व्यंग्य में कहा जा रहा है — ‘अब शायद एसीबी केस भी प्रमोशन में बाधा नहीं,बल्कि अनुभव का हिस्सा माना जा रहा है। ‘
    हिरण मनोहर भाई पटेल को ‘विशेष संरक्षण’ मिलने की चर्चा
    सूत्रों के अनुसार कथित ष्टत्ररूस्ष्ट घोटाले से जुड़े मामले में हिरण मनु भाई पटेल का नाम जांच एजेंसियों के दायरे में आ चुका है, विभागीय चर्चाओं में यह दावा किया जा रहा है कि शासन स्तर से जांच की अनुमति भी दी जा चुकी है और एसीबी/श्वह्रङ्ख की सूची में उनका नाम शामिल है, चर्चा यह भी है कि जांच एजेंसी को पूछताछ अथवा आगे की कार्रवाई का अधिकार प्राप्त है, लेकिन मामला अब तक निर्णायक स्तर तक नहीं पहुंच पाया,यही वजह है कि विभाग के भीतर ‘विशेष संरक्षण’ की चर्चा तेज हो गई है, कर्मचारियों के बीच यह सवाल पूछा जा रहा है कि जब किसी अधिकारी का नाम इतने बड़े वित्तीय अनियमितता प्रकरण से जुड़ चुका हो,तब भी उसे महत्वपूर्ण जिले में पदस्थापना कैसे मिल जाती है? व्यंग्य में विभागीय कर्मचारी कह रहे हैं – ‘यहां घोटाले का आकार जितना बड़ा,पदस्थापना उतनी मजबूत! ‘
    स्थानांतरण नीति भी प्रभाव के आगे कमजोर?
    विभागीय सूत्रों के अनुसार बेनी राम साहू और रविंद्र कुमार गेंदले के मामले में भी स्थानांतरण आदेशों को लेकर कई चर्चाएं हैं,आरोप यह हैं कि इन अधिकारियों के लिए स्थानांतरण आदेश केवल कागज तक सीमित रह जाते हैं, बताया जा रहा है कि 29 जुलाई 2025 को सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत स्थानांतरण आदेश जारी हुए थे,चर्चा यह भी है कि यह आदेश समन्वय स्तर से जारी हुआ था,जिसे विभागीय लोग ‘विशेष निगरानी’ वाला आदेश मान रहे थे, उस आदेश में बेनी राम साहू को उपसंचालक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, जिला कोरिया भेजा गया था,वहीं रविंद्र कुमार गेंदले को उपसंचालक कार्यालय,खाद्य एवं औषधि प्रशासन, जगदलपुर जिला बस्तर पदस्थ किया गया था,लेकिन विभागीय चर्चाओं के अनुसार दोनों अधिकारियों ने कथित तौर पर नए पदस्थापना स्थल पर जॉइनिंग नहीं की। बताया जा रहा है कि छुट्टी लेकर समय निकाला गया और बाद में कुछ समय पश्चात संशोधित आदेश जारी हो गए, अब विभागीय गलियारों में यही चर्चा है कि आखिर ऐसा प्रभाव किसके पास होता है कि शासन स्तर से जारी आदेश भी कुछ महीनों में बदल जाते हैं?
    स्थानांतरण आदेश भी बेअसर?
    संरक्षण के आगे सिस्टम बेबस होने की चर्चा-औषधि प्रशासन विभाग में चल रहे विवादों के बीच अब एक और गंभीर सवाल सामने आ रहा है,आखिर कुछ अधिकारियों पर शासन के आदेश भी प्रभावहीन क्यों दिखाई देते हैं? विभागीय सूत्रों और चर्चाओं के अनुसार जिन अधिकारियों के नाम विवादों,जांच और शिकायतों में सामने आए,उन्हीं अधिकारियों को न केवल महत्वपूर्ण पदस्थापनाएं मिलीं बल्कि स्थानांतरण आदेशों का पालन भी कथित तौर पर नहीं किया गया।
    पहले आदेश निकलता है,फिर अधिकारी तय करते हैं जाना कहां है…
    कर्मचारियों के बीच इस पूरे घटनाक्रम को लेकर व्यंग्य भी खूब चल रहा है,एक कर्मचारी ने तंज कसते हुए कहा सामान्य कर्मचारी आदेश मिलते ही रिलीव हो जाता है,लेकिन प्रभावशाली अधिकारी पहले आदेश देखते हैं,फिर तय करते हैं कि पालन करना है या आदेश ही बदलवाना है, यही कारण है कि अब विभाग में यह चर्चा सिर्फ प्रमोशन की नहीं,बल्कि प्रभाव,संरक्षण और प्रशासनिक निष्पक्षता की भी होने लगी है।
    फाइल सचिवालय पहुंची…फिर वापस क्यों लौटी?
    सूत्रों के मुताबिक प्रमोशन से जुड़ी फाइल ड्रग कंट्रोलर कार्यालय से सचिवालय तक पहुंच चुकी थी, लेकिन वहां से फाइल को वापस भेजे जाने की चर्चा है, बताया जा रहा है कि सचिवालय स्तर पर कहा गया कि फाइल में ‘टिप’ लगाकर दोबारा भेजा जाए,अब विभाग में सबसे बड़ा सवाल यही घूम रहा है,आखिर उस टिप में क्या लिखा जाएगा? क्या यह लिखा जाएगा कि अधिकारियों पर मामले लंबित हैं? क्या यह कि न्यायालय में सुनवाई जारी है? या फिर यह कि ‘प्रकरण विचाराधीन होने के बावजूद प्रमोशन में कोई बाधा नहीं ‘? कर्मचारियों के बीच व्यंग्य में यह भी कहा जा रहा है कि शायद अब विभाग में प्रमोशन के लिए एसीबी या ईओडब्ल्यू की जांच ‘अनुभव प्रमाण पत्र’ की तरह मानी जाने लगी है।
    क्या प्रमोशन अब निष्पक्षता नहीं,
    पहुंच का खेल बन गया है?

    यह मामला केवल दो अधिकारियों तक सीमित नहीं है,यह पूरे सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़ा करता है,क्योंकि यदि रिश्वत और घोटाले के आरोपों से घिरे अधिकारी प्रमोशन पा जाते हैं, तो इसका सीधा संदेश यह जाएगा कि व्यवस्था में ईमानदारी की कोई कीमत नहीं बची,विभागीय कर्मचारियों में नाराजगी भी देखी जा रही है,कई कर्मचारियों का कहना है कि वर्षों तक बिना किसी विवाद के सेवा देने वाले अधिकारियों को नजरअंदाज किया जा रहा है, जबकि विवादित अधिकारी ‘विशेष कृपा’ का लाभ उठा रहे हैं।
    सिस्टम का नया फॉर्मूला
    आरोप लगते रहेंगे,प्रमोशन चलते रहेंगे!

    यदि सूत्रों की बात सही है और विवादित अधिकारियों को प्रमोशन देने की तैयारी वास्तव में चल रही है,तो यह प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है,व्यंग्य में कर्मचारी कह रहे हैं-
    – ‘पहले सेवा रिकॉर्ड देखा जाता था,अब संपर्क रिकॉर्ड देखा जाता है।
    – ‘ईमानदार अधिकारी फाइल ढूंढते रह जाते हैं और प्रभावशाली अधिकारी प्रमोशन आदेश।
    – ‘अब विभाग में दाग अच्छे हैं…कम से कम प्रमोशन के लिए। ‘
    सरकार के सामने बड़ी चुनौती
    अब सबसे बड़ा सवाल सरकार और सचिवालय के सामने है,क्या विवादित नामों को प्रमोशन सूची से हटाया जाएगा? क्या लंबित मामलों के निपटारे तक प्रक्रिया रोकी जाएगी? या फिर तकनीकी व्याख्याओं के सहारे सब कुछ सामान्य बताकर प्रमोशन आदेश जारी कर दिए जाएंगे? यदि ऐसा होता है,तो यह केवल विभागीय विवाद नहीं रहेगा, बल्कि सरकार की भ्रष्टाचार विरोधी छवि पर भी बड़ा सवाल खड़ा करेगा।
    आखिर संदेश क्या जाएगा?
    यदि रिश्वत प्रकरण में पकड़ा गया अधिकारी और घोटाले में नाम आने वाला अधिकारी प्रमोशन पा जाते हैं,तो इससे विभाग के भीतर क्या संदेश जाएगा? क्या युवा अधिकारी यह मान लें कि जांच और आरोप सिर्फ समाचारों तक सीमित हैं? क्या ईमानदार कर्मचारी यह समझ लें कि सिस्टम में टिके रहने के लिए काम नहीं, ‘प्रबंधन’ जरूरी है? और क्या जनता यह माने कि विभागीय कार्रवाई सिर्फ दिखावा है? यही वे सवाल हैं जिनका जवाब अब केवल विभाग नहीं, बल्कि सरकार को भी देना होगा।
    अब निगाह सचिवालय
    और सरकार पर…

    पूरा मामला अब सचिवालय और सरकार के अंतिम निर्णय पर टिका हुआ है,क्या विवादित नामों को सूची से हटाया जाएगा? क्या लंबित मामलों के निपटारे तक प्रमोशन रोका जाएगा? या फिर तकनीकी व्याख्याओं के सहारे सब कुछ ‘नियमों के अनुरूप’ बताकर आदेश जारी कर दिए जाएंगे? फिलहाल विभाग में सिर्फ एक ही चर्चा है — ‘प्रमोशन योग्यता से मिलेगा… या पहुंच से?
    स्थापना शाखा पर उठते सवाल
    पूरा मामला अब स्थापना शाखा और वहां पदस्थ अधिकारियों की भूमिका पर आकर टिक गया है, विभागीय सूत्रों के अनुसार स्थापना देख रहे बेनी साहू का नाम भी चर्चाओं में है, आरोप लगाए जा रहे हैं कि प्रमोशन सूची तैयार करने में विवादित अधिकारियों को विशेष प्राथमिकता दी गई,विभाग के भीतर यह भी चर्चा है कि जिन अधिकारियों का रिकॉर्ड साफ है,उनके नाम पीछे कर दिए गए, जबकि प्रभावशाली और विवादित अधिकारियों के नाम सूची में आगे बढ़ाए गए,एक कर्मचारी ने व्यंग्य में कहा — ‘अब विभाग में ईमानदारी नहीं,पकड़ मजबूत होना जरूरी है। ‘
    क्या विभाग में नियम सिर्फ कमजोरों के लिए हैं?
    यह सवाल अब सबसे ज्यादा पूछा जा रहा है,क्योंकि सामान्य कर्मचारी के खिलाफ छोटी सी शिकायत भी उसके प्रमोशन, वेतनवृद्धि और सेवा रिकॉर्ड पर असर डाल देती है, लेकिन यहां ऐसे नाम सूची में हैं जिन पर भ्रष्टाचार और करोड़ों के भुगतान अनियमितता जैसे आरोप लग चुके हैं, तो क्या नियम सिर्फ छोटे कर्मचारियों के लिए हैं? क्या प्रभावशाली अधिकारियों के लिए अलग व्यवस्था चल रही है? क्या विभागीय जांच और एसीबी कार्रवाई अब केवल औपचारिकता बनकर रह गई है?

Share

Check Also

अम्बिकापुर@जीएच रायसोनी मेमोरियल ऑल इंडिया ओपन फिडे रेटेड रैपिड शतरंज प्रतियोगिता 30 व 31 मई को

Share -संवाददाता-अम्बिकापुर,14 मई 2026 (घटती-घटना)। शतरंज संघ सरगुजा द्वारा 30 एवं 31 मई को जीएच …

Leave a Reply