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बिलासपुर@हाई कोर्ट ने फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदला

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बिलासपुर,08 मई 2026। छत्तीसगढ़ बिलासपुर हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने फांसी की सजा को आजीवन कारावास में तब्दील कर दिया है। डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है, मृत्युदंड केवल अत्यंत दुर्लभ मामलों में ही दिया जा सकता है। यदि यह सख्त मानदंड पूरा नहीं होता है, तो मृत्युदंड को आजीवन कारावास में परिवर्तित करना आवश्यक है। साथ ही यह निर्देश भी दिया जाता है, यह आजीवन कारावास दोषी के पूरे जीवनकाल तक जारी रहेगा। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा है, वर्तमान मामले में, ऐसा निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। रिकॉर्ड में ऐसा कोई भी सबूत नहीं है जिससे यह संकेत मिले कि आरोपी के सुधरने या पुनर्वास की कोई संभावना नहीं है। ऐसा कोई सबूत नहीं है जो यह दर्शाता हो कि आरोपी समाज के लिए निरंतर खतरा है या उसमें इतनी गंभीर आपराधिक प्रवृत्ति है कि उसका अस्तित्व ही सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रतिकूल हो। इसके अलावा, यह महत्वपूर्ण है कि दोषसिद्धि पूरी तरह से परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है।
यद्यपि ऐसे साक्ष्य दोषसिद्धि को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं, फिर भी सजा सुनाने के चरण में इनका महत्व बढ़ जाता है, जहां मृत्युदंड जैसी अपरिवर्तनीय सजा देने से पहले न्यायिक सावधानी का उच्च स्तर आवश्यक है। इन सभी कारकों को एक साथ देखने पर मृत्युदंड देने के खिलाफ ठोस आधार बनता है।
कोर्ट ने कहा- अपराध के अनुरुप होनी चाहिए सजा
कोर्ट ने कहा है, भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली यह मानती है कि सजा न केवल अपराध के अनुरूप होनी चाहिए, बल्कि इसमें अपराध के संभावित परिणामों पर भी विचार किया जाना चाहिए। अपराधी के सुधार और समाज में पुनः एकीकरण की संभावना। सुधार की संभावना को केवल सैद्धांतिक विचार के रूप में नहीं, बल्कि एक ठोस कारक के रूप में देखा जाना चाहिए जिसका सकारात्मक मूल्यांकन आवश्यक है। केवल उन्हीं मामलों में जहां ऐसी संभावना स्पष्ट रूप से अनुपस्थित हो, और परिस्थितियां अत्यधिक दुराचार या बर्बरता के साथ-साथ पुनर्वास की असंभवता को दर्शाती हों, मृत्युदंड उचित ठहराया जा सकता है। ऐसी बाध्यकारी परिस्थितियों के अभाव में, मृत्युदंड की अपरिवर्तनीय प्रकृति न्यायिक संयम को अनिवार्य बनाती है।


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