Breaking News

बिलासपुर@ताड़मेटला नरसंहार केस में सभी आरोपी दोषमुक्त

Share


हाईकोर्ट बोला…76 जवान शहीद हुए,लेकिन असली कातिलों को पकड़ने में जांच एजेंसियां नाकाम
बिलासपुर,07 मई 2026। छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले के ताड़मेटला नक्सली हमले में सीआरपीएफ के 76 जवान हुए थे। जिसके सभी आरोपी दोषमुक्त हो गए हैं। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की अपील खारिज करते हुए निचली अदालत के बरी करने के फैसले को बरकरार रखा है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रविंद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने इस पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि, इतनी बड़ी शहादत के बावजूद अभियोजन एजेंसियां असली अपराधियों की पहचान करने और उन्हें न्याय के कटघरे में लाने में पूरी तरह विफल रही हैं। इस तरह हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के दोषमुक्ति के फैसले को सही ठहराया है।
डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि,हमें यह देखकर अत्यंत दुःख हुआ है। बड़े पैमाने पर जवान शहीद हुए और राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर परिणाम भुगतने पड़े। इसके निपटारे में कोई भी कानूनी रूप से मान्य और विश्वसनीय साक्ष्य पेश नहीं किया जा सका। इसलिए निचली अदालत को उन्हें बरी करने के लिए विवश होना पड़ा। जवानों पर हुए सामूहिक हमले के आरोपियों को प्रत्यक्ष साक्ष्यों की कमी, अपूर्ण परिस्थितिजन्य साक्ष्य, जांच में प्रक्रियात्मक खामियों और अपराध की गंभीरता के बावजूद उचित संदेह से परे दोष सिद्ध करने में विफलता के कारण बरी कर दिया गया।
सरकार की दलीलें जो कोर्ट में नहीं टिकीं
राज्य के महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने तर्क दिया कि, आरोपी बरसे लखमा का इकबालिया बयान और बरामद पाइप बम पर्याप्त सबूत हैं। साथ ही, घायल जवानों की गवाही न ले पाना एक गंभीर त्रुटि थी। हालांकि, हाई कोर्ट ने इन्हें अपर्याप्त माना क्योंकि इकबालिया बयान किसी स्वतंत्र साक्ष्य से समर्थित नहीं था।
हाईकोर्ट ने जांच की इन बड़ी खामियों को गिनाया
– किसी प्रत्यक्षदर्शी ने आरोपियों की पहचान नहीं की।
– कोई टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड नहीं कराई गई।
– एफएसएल रिपोर्ट पेश नहीं की गई।
– जब्त हथियार और विस्फोटक आरोपियों के कब्जे से नहीं मिले।
– शस्त्र अधिनियम के तहत जरूरी अभियोजन स्वीकृति का रिकॉर्ड नहीं था।
– परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला साबित नहीं हो सकी।
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को दी सख्त नसीहत
डिवीजन बेंच ने कहा कि, भविष्य में ऐसे गंभीर मामलों में जांच के उच्च मानक अपनाने होंगे, ताकि प्रक्रियात्मक चूक के कारण आरोपी बच न सकें। कोर्ट ने कहा कि जांच में फोरेंसिक, तकनीकी और प्राथमिक साक्ष्यों का अभाव न्याय प्रणाली में लोगों के भरोसे को कमजोर करता है।
क्या था मामला ?
6 अप्रैल 2010 की सुबह ताड़मेटला के जंगलों में नक्सलियों ने सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन पर घात लगाकर हमला किया था। इस भीषण नरसंहार में 75 सीआरपीएफ जवान और राज्य पुलिस का 1 सदस्य शहीद हो गए थे। नक्सलियों ने जवानों के हथियार भी लूट लिए थे।


Share

Check Also

अम्बिकापुर@ सरगुजा के बाद अब बस्तर की बारी?

Share अंचल ओझा का उद्योग और खनन विस्तार पर बड़ा सवाल‘विकास के नाम पर प्रकृति,संस्कृति …

Leave a Reply