



- जल संसाधन विभाग की लापरवाही से डूबा सोनहत, फूटी नहर ने उजाड़े किसानों के खेत
- नहर या जंगल? 6 फीट झाड़ियों में गुम हुई सिंचाई व्यवस्था, किसानों पर संकट
- ‘निराला सिस्टम’ में बह गया करोड़ों का मेंटेनेंस, खेत डूबे और सड़क बनी नाला
- सुशासन के दावों पर पानी, घुनघुट्टा जलाशय की बदहाली ने खोली विभाग की पोल
- धान की खेती पर संकट:टूटी नहर,बहता पानी और बर्बादी के मुहाने पर किसान
- पानी बचाने की बातें,लेकिन यहाँ महीनों से बह रहा जलाशय का पानी
- सिंचाई विभाग बना किसानों की मुसीबत,फूटी नहर ने डुबो दी उम्मीदें
- घुनघुट्टा जलाशय बदहाल: टेल एरिया सूखा,बीच रास्ते में बह गया पानी
-राजन पाण्डेय-
सोनहत (कोरिया),06 मई 2026(घटती-घटना)। कोरिया जिले के जल संसाधन विभाग में मेंटेनेंस अब केवल फाइलों और टेंडरों तक सीमित शब्द बनकर रह गया है,करोड़ों रुपये खर्च होने के दावे हर साल किए जाते हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि नहरें अब सिंचाई का माध्यम कम और भ्रष्टाचार की बहती हुई निशानी ज्यादा दिखाई देने लगी हैं,जिले में लंबे समय से जमे निराला सिस्टम की चर्चा अब आम हो चुकी है। किसानों का आरोप है कि विभाग में काम कम और ठेकेदारी तंत्र ज्यादा हावी है,परिणाम यह है कि कहीं नहर टूट रही है,कहीं गेट रिस रहा है,तो कहीं पूरी नहर झाडि़यों के नीचे दफन हो चुकी है।
बता दे की सोनहत क्षेत्र का सबसे बड़ा जलाशय ‘घुनघुट्टा’ कभी इस इलाके की खेती की जीवनरेखा माना जाता था,इसी जलाशय की नहरों से बोडार,कुशहा और आसपास के गांवों तक पानी पहुंचता था और खेतों में हरियाली लहलहाती थी,लेकिन आज वही जलाशय अपनी बदहाली पर आंसू बहाता नजर आ रहा है। हालत यह है कि नहरों में पानी कम और झाड़-झंखाड़ ज्यादा दिखाई देते हैं,किसानों के खेतों तक सिंचाई पहुंचाने वाली नहरें अब खुद पानी में डूबती और टूटती नजर आ रही हैं,घुनघुट्टा जलाशय की यह स्थिति केवल तकनीकी लापरवाही नहीं बल्कि प्रशासनिक उदासीनता और जवाबदेही की कमी का जीवंत उदाहरण है, यदि समय रहते नहरों की सफाई,टूटे हिस्सों की मरम्मत और गेट रिसाव को नहीं रोका गया,तो सोनहत का सबसे बड़ा जलाशय किसानों के लिए वरदान नहीं बल्कि अभिशाप बन जाएगा,आज जरूरत केवल कागजी दावों की नहीं,बल्कि जमीन पर तत्काल कार्रवाई की है, क्योंकि अगर अभी भी जिम्मेदार नहीं जागे,तो आने वाले दिनों में खेतों की हरियाली की जगह केवल बर्बादी का पानी नजर आएगा।

करोड़ों का मेंटेनेंस या कागजी खेल?
हर वर्ष नहरों की सफाई,गेट मरम्मत और संरचना सुधार के नाम पर बजट जारी होता है, लेकिन जमीन पर नहरों में उगे जंगल,टूटी संरचनाएं और बहता पानी यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि आखिर यह बजट खर्च कहां हो रहा है? ग्रामीणों का कहना है कि विभाग में काम कम, कागज ज्यादा वाली व्यवस्था चल रही है, ठेके होते हैं,भुगतान होते हैं, लेकिन नहरें जस की तस पड़ी रहती हैं, किसानों के बीच अब यह चर्चा आम हो चुकी है कि विभाग में निराला सिस्टम केवल ठेकेदारों और फाइलों के लिए सक्रिय रहता है, किसानों की समस्याओं के लिए नहीं।

कई महीनों से बह रहा व्यर्थ पानी…प्रशासन की बेरुखी की हद
भीषण गर्मी की दस्तक हो चुकी है, आने वाले दिनों में जल संकट गहराने की आशंका है,इसके बावजूद घुनघुट्टा जलाशय से कई महीनों से लगातार पानी व्यर्थ बह रहा है,यह वही समय है जब हर बूंद पानी बचाने के लिए अभियान चलाए जाते हैं,लेकिन सोनहत में सरकारी तंत्र खुद पानी की बर्बादी का सबसे बड़ा उदाहरण बना हुआ है,ग्रामीणों का कहना है कि यदि यही स्थिति रही, तो जून तक जलाशय का जलस्तर काफी नीचे चला जाएगा और खरीफ सीजन के दौरान किसानों को भारी संकट झेलना पड़ेगा।
एसी कमरों तक सीमित अधिकारी… धरातल पर नहीं होता निरीक्षण…
घुनघुट्टा जलाशय की हालत साफ बताती है कि विभागीय अधिकारी नियमित निरीक्षण नहीं करते, यदि समय-समय पर नहरों का दौरा हुआ होता,तो नहरों में 6 फीट के पौधे नहीं उगते और न ही नहर फूटकर किसानों के खेतों को डुबोती, ग्रामीणों का आरोप है कि अधिकारी केवल दफ्तरों और बैठकों तक सीमित हैं,धरातल पर जाकर वास्तविक स्थिति देखने की जहमत शायद ही कोई उठाता हो,यदि समय रहते निरीक्षण और मरम्मत होती,तो आज किसानों को यह दिन नहीं देखना पड़ता।
क्या ‘सुशासन तिहार’ में टूटेगी विभाग की नींद?
एक ओर सरकार सुशासन तिहार मनाकर बेहतर प्रशासन और जवाबदेही के दावे कर रही है,वहीं दूसरी ओर घुनघुट्टा जलाशय की तस्वीरें इन दावों को कटघरे में खड़ा कर रही हैं, किसानों का सवाल सीधा है —क्या सुशासन केवल मंचों और भाषणों तक सीमित है? या फिर खेतों तक पानी पहुंचाने और किसानों की बर्बादी रोकने में भी दिखाई देगा? अब देखना यह है कि विभाग की कुंभकर्णी नींद टूटती है या फिर किसान यूं ही अपनी बर्बादी देखते रहेंगे।

विभाग की ‘निराली’ कार्यशैली…गेट से रिसाव जारी…टेल एरिया तक नहीं पहुंच रहा पानी
घुनघुट्टा जलाशय में एक ओर पानी लगातार रिसकर व्यर्थ बह रहा है,वहीं दूसरी ओर टेल एरिया के किसान पानी के लिए तरस रहे हैं,मुख्य गेट से महीनों से पानी का रिसाव जारी है,ग्रामीणों का आरोप है कि विभाग को इसकी जानकारी होने के बावजूद कोई तकनीकी सुधार नहीं किया गया,विडंबना यह है कि जहां जरूरत नहीं है वहां पानी बहकर खेत और सड़क डुबो रहा है,जबकि जिन किसानों के खेतों तक सिंचाई पहुंचनी चाहिए,वहां नहरों में पानी ही नहीं पहुंच पा रहा, यह स्थिति विभाग के रखरखाव और निगरानी के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है।

नहर या 6 फीट का जंगल?…जहाँ तक नजर जाए वहाँ तक उगे झाड़-झंखाड़
घुनघुट्टा जलाशय से निकलने वाली नहरों की हालत देखकर यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि यह सिंचाई परियोजना है या फिर किसी परित्यक्त जंगल का हिस्सा,ग्राम अमहर से कर्री तक नहरों के भीतर 6-6 फीट ऊंचे पौधे और झाडि़यां उग चुकी हैं,कई स्थानों पर तो नहर पूरी तरह दिखाई तक नहीं देती,दूर से देखने पर ऐसा लगता है जैसे विभाग ने नहर निर्माण नहीं बल्कि झाडि़यों की खेती का ठेका दिया हो। नहरों के भीतर जमा कचरा,मिट्टी और विशाल झाडि़यां पानी के प्रवाह को पूरी तरह रोक रही हैं,सवाल यह है कि जब हर साल सफाई और मरम्मत के नाम पर लाखों-करोड़ों रुपये खर्च होते हैं, तो आखिर यह पैसा जाता कहाँ है?
जल तांडव : फूटी नहर ने खेतों को बनाया तालाब….मुख्य मार्ग हुआ जलमग्न
अमहर से कर्री की ओर जाने वाली नहर अब किसानों के लिए राहत नहीं बल्कि तबाही का कारण बन चुकी है, जर्जर और कमजोर हो चुकी नहर बीच रास्ते में फूट गई है,इसके बाद पानी अनियंत्रित होकर किसानों के खेतों में घुस रहा है, जिस खेत में किसान धान की तैयारी कर रहे थे,वहां अब तालाब जैसा दृश्य दिखाई दे रहा है। तेज जलप्रवाह के कारण खेतों की मेड़ें टूट चुकी हैं और कई किसानों की भूमि दलदल में तब्दील हो गई है,स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि खेतों से बहता पानी अब मुख्य पक्की सड़क के ऊपर से गुजर रहा है, सड़क के दूसरी ओर भी अनावश्यक जलभराव हो गया है,जिससे आवागमन प्रभावित हो रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि कई महीनों से यह स्थिति बनी हुई है, लेकिन विभाग का कोई जिम्मेदार अधिकारी मौके तक नहीं पहुंचा।
धान की बुवाई पर संकट…खेत उजाड़ने पर तुला विभाग,कैसे लगेगा ‘थरहा’?
धान की खेती शुरू होने में अब महज कुछ सप्ताह शेष हैं, किसान इस समय थरहा (धान नर्सरी) की तैयारी में जुटने वाले थे,लेकिन जल संसाधन विभाग की लापरवाही ने उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया है, जहाँ खेत समतल और तैयार होने चाहिए थे,वहाँ अब कीचड़, दलदल और टूटी मेड़ें दिखाई दे रही हैं। किसानों का कहना है कि यदि समय रहते नहर की मरम्मत नहीं हुई और खेतों से अतिरिक्त पानी नहीं निकाला गया,तो इस वर्ष खेती की शुरुआत ही प्रभावित हो जाएगी, सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस विभाग का गठन किसानों को पानी देने के लिए हुआ, वही विभाग अब किसानों के खेत उजाड़ने का कारण क्यों बन गया है?
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