Breaking News

कोरिया@ झुमका में झूमता सिस्टम में पर्यटन कम तमाशा ज्यादा? सपना ‘डल झील’ का,हकीकत ‘ढलती व्यवस्था’ की

Share

  • झुमका में झूमता भ्रष्टाचार पर्यटन के नाम पर बना ‘चारागाह’
  • 3 करोड़ का क्रूज बना मयखाना, अब जागा प्रशासन!
  • डल झील का सपना, अव्यवस्था का दलदल: झुमका की सच्चाई
  • खर्च करोड़ों का,नतीजा सन्नाटा का, झुमका बना सिस्टम का आईना
  • जब हादसा जबलपुर हुआ तब याद आई सुरक्षा झुमका में सिस्टम बेनकाब
  • झुमका में ‘विकास’ की नाव, लापरवाही के भंवर में फंसी
  • पर्यटन कम,कमाई ज्यादा झुमका बना अधिकारियों का खेल
  • क्रूज में सैर नहीं,शराब का दौर झुमका की डूबती साख
  • कागजों में स्वर्ग, हकीकत में अव्यवस्था, झुमका का कड़वा सच
  • पहले खर्च, फिर जांच: झुमका में उल्टा चलता सिस्टम


-रवि सिंह-
कोरिया,05 मई 2026(घटती-घटना)।
कोरिया जिले का झुमका जलाशय जिसे कभी बड़े गर्व के साथ छत्तीसगढ़ का मिनी डल झील कहा गया आज खुद अपनी हालत पर खामोश खड़ा है,पानी वही है, किनारे वही हैं,लेकिन बदल गया है तो सिर्फ उसका इस्तेमाल,जहां कभी पर्यटन का सपना दिखाया गया था,वहां अब सवालों की लहरें उठ रही हैं,विकास की कहानी लिखने की कोशिश में ऐसा अध्याय जुड़ गया है,जिसे पढ़कर खुद सिस्टम भी असहज हो जाए,पिछले 6-7 वर्षों में झुमका को संवारने के नाम पर करोड़ों रुपये बहाए गए,योजनाएं बनीं, टेंडर निकले,क्रूज खरीदे गए,उद्घाटन हुए और फोटो खिंचवाई गईं,हर नए अधिकारी ने झुमका को अपनी उपलब्धि का आईना बनाया,लेकिन आईने में दिखने वाली तस्वीर जितनी चमकदार थी,जमीन पर उतनी ही धुंधली।
कश्मीर की नकल,कोरिया में विफल,शिकार बना ‘शोपीस’ या खर्च का बहाना?
कोरिया जिले के झुमका जलाशय में विकास की कहानी सिर्फ क्रूज तक सीमित नहीं रही, बल्कि कश्मीर मॉडल को भी यहां उतारने की कोशिश की गई,डल झील की खूबसूरती और वहां चलने वाली शिकारा नौकाओं से प्रेरित होकर,ठीक वैसी ही शिकारा कोरिया में भी मंगाई गई,उद्देश्य साफ था की पर्यटकों को आकर्षित करना,झुमका को मिनी कश्मीर बनाना और एक अलग पहचान देना, लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ दिखावे से पर्यटन विकसित होता है? कश्मीर की डल झील में शिकारा सिर्फ नाव नहीं है, वह वहां की जीवनशैली, संस्कृति और पर्यटन का अभिन्न हिस्सा है,वहां शिकारा चलाने वाले पीढि़यों से इस काम से जुड़े हैं,पर्यटकों की निरंतर आवाजाही है, और पूरा सिस्टम उस अनुभव को जीवंत बनाता है, लेकिन झुमका में लाई गई शिकारा क्या वह उस संदर्भ में फिट बैठती है? यही वह सवाल है, जिसका जवाब आज तक स्पष्ट नहीं हो पाया, झुमका में शिकारा लाई तो गई,लेकिन उसके संचालन की कोई ठोस योजना नहीं बनी,न तो नियमित संचालन दिखा,न ही प्रशिक्षित नाविकों की व्यवस्था, और न ही पर्यटकों के लिए कोई व्यवस्थित अनुभव तैयार किया गया,नतीजा यह हुआ कि शिकारा,जो कभी आकर्षण बन सकती थी,आज अधिकतर समय किनारे खड़ी नजर आती है—एक शोपीस की तरह, यह स्थिति अपने आप में कई सवाल खड़े करती है,क्या खरीदी के समय इसकी उपयोगिता पर गंभीरता से विचार किया गया था? या फिर यह सिर्फ एक और आकर्षक आइटम जोड़ने की जल्दबाजी थी, जिससे यह दिखाया जा सके कि झुमका में भी अब कश्मीर जैसा अनुभव मिलेगा? व्यंग्य यह है कि जहां कश्मीर में शिकारा पर्यटकों को शांति और सौंदर्य का अनुभव कराती है, वहीं झुमका में वही शिकारा खुद अपनी उपयोगिता तलाशती नजर आती है। यहां न वह भीड़ है,न वह माहौल, और न ही वह योजना,जो इसे सफल बना सके, स्थानीय लोगों के बीच यह चर्चा आम है कि शिकारा की खरीदी में भी अच्छी-खासी राशि खर्च की गई,लेकिन उसका प्रतिफल शून्य के बराबर है,यानी,एक और परियोजना जो कागजों और कल्पनाओं में तो शानदार दिखती है,लेकिन जमीन पर उसका कोई ठोस अस्तित्व नहीं है,झुमका में खड़ी शिकारा अब एक प्रतीक बन चुकी है उस सोच का, जिसमें विकास का मतलब सिर्फ कॉपी-पेस्ट करना रह गया है,बिना यह समझे कि हर जगह की अपनी जरूरतें और परिस्थितियां होती हैं,अंततः सवाल वही पुराना लेकिन जरूरी है क्या झुमका को वास्तव में पर्यटन स्थल बनाना था,या सिर्फ उसे दिखाना था? अगर जवाब पहला है,तो शिकारा जैसी योजनाओं को सिर्फ खरीदने से नहीं,बल्कि उन्हें सही तरीके से संचालित करने से ही सार्थक बनाया जा सकता है। वरना यह शिकारा,पानी में तैरने के बजाय,फाइलों और खर्चों में ही डूबती रहेगी।
क्रुजः सैर का साधन या ‘मयखाना’ का माध्यम?
3 करोड़ की लागत से तैयार डबल डेकर हाउस बोट—जिसे सुनकर किसी को भी लगे कि अब झुमका में लक्ज़री टूरिज्म का दौर शुरू होगा—आज चर्चा में है,लेकिन वजह पर्यटन नहीं, बल्कि शराबखोरी और अव्यवस्था है, जब क्रूज के डस्टबिन से शराब की बोतलें निकलती हैं,तो सवाल सिर्फ ठेकेदार पर नहीं उठता,बल्कि उस पूरी सोच पर उठता है जिसने इसे बिना ठोस निगरानी के चलने दिया,क्या यह वही क्रूज है, जो परिवारों और पर्यटकों के लिए बनाया गया था? या फिर यह पहले दिन से ही सुविधा के नाम पर छूट का खेल बन गया था? यहां विडंबना देखिए की जिस चीज़ को पर्यटन का चेहरा बनना था, वही अब प्रशासन के लिए सिरदर्द बन चुकी है।
नोटिस की नौटंकी,हादसे के बाद जागी जिम्मेदारी
जब सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था कम से कम कागजों में तब किसी को सुरक्षा याद नहीं आई,लेकिन जैसे ही बरगी डैम में हादसे की खबर आई,अचानक झुमका में भी जागरूकता का सूरज उग गया,अब नोटिस जारी हो रहे हैं,अल्टीमेटम दिए जा रहे हैं,टेंडर रद्द करने की चेतावनियां दी जा रही हैं,ऐसा लग रहा है जैसे प्रशासन कह रहा हो हमें पहले पता नहीं था,अब पता चला है,पर सवाल यह है कि क्या जिम्मेदारी का मतलब सिर्फ हादसे के बाद कार्रवाई करना है? क्या पहले से ही सिस्टम को सजग नहीं होना चाहिए था?
खरीदी का खेल में मानक पीछे,भुगतान आगे
कहानी यहीं खत्म नहीं होती,बल्कि असली कहानी यहीं से शुरू होती है, जब यह क्रूज खरीदा जा रहा था,तब क्या किसी ने यह देखा कि इसकी सुरक्षा मानक क्या हैं? इसकी क्षमता कितनी है? इसमें आपातकालीन व्यवस्था कैसी है? या फिर उस समय प्राथमिकता सिर्फ यह थी कि काम पूरा दिखना चाहिए? आज जब घटना के बाद मानक जांच की बात हो रही है,तो यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या पहले यह सब जानबूझकर नजरअंदाज किया गया?
करोड़ों का खर्च,लेकिन सन्नाटा क्यों?
झुमका पर खर्च हुए पैसों का आंकड़ा छोटा नहीं है,कई करोड़ रुपये डीएमएफ फंड से लेकर अन्य योजनाओं तक यहां झोंक दिए गए, लेकिन अगर कोई आम नागरिक वहां पहुंचता है, तो उसे सबसे पहले जो दिखता है,वह है—खालीपन,पर्यटक नहीं,गतिविधि नहीं,व्यवस्था नहीं,बस एक सुंदर जगह,जो अपनी क्षमता के बावजूद उपेक्षा का शिकार है,यह स्थिति खुद बताती है कि विकास सिर्फ पैसे खर्च करने से नहीं होता,बल्कि योजना और ईमानदारी से होता है जो यहां शायद कहीं खो गई।
अधिकारियों का ‘चारागाह’ में बदलते चेहरे,वही कहानी
झुमका की सबसे बड़ी त्रासदी शायद यही रही कि यह एक सतत योजना कभी बन ही नहीं पाई, जो भी अधिकारी आया,उसने इसे अपने तरीके से देखा,अपने हिसाब से काम किया और फिर चला गया, हर बार नई शुरुआत,नई घोषणा,नया खर्च लेकिन पुरानी गलतियों पर कभी कोई चर्चा नहीं,यह सिलसिला इतना आम हो गया कि लोगों ने कहना शुरू कर दिया झुमका अब पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि चारागाह बन चुका है,जहां हर कोई अपने हिस्से की हरियाली तलाशता है।
सुरक्षा,नाम की चीज़,काम की नहीं
अगर झुमका की सबसे खतरनाक सच्चाई को एक शब्द में बताया जाए,तो वह है सुरक्षा की अनदेखी,लाइफ जैकेट पर्याप्त नहीं, मेडिकल टीम का अभाव,गोताखोरों की व्यवस्था नहीं,ओवरलोडिंग का खतरा यह सब किसी हादसे का इंतजार नहीं, बल्कि उसे आमंत्रण देने जैसा है, और जब तक हादसा नहीं होता, तब तक सब सामान्य माना जाता है यही सबसे बड़ी विडंबना है।
पर्यटन या एकांत का दुरुपयोग?
झुमका की लोकेशन उसकी ताकत हो सकती थी शांत, प्राकृतिक और सुंदर,लेकिन वही एकांत अब उसकी कमजोरी बन गया है, कम भीड़,कम निगरानी और ढीला सिस्टम इन सबने मिलकर इसे असामाजिक गतिविधियों के लिए अनुकूल जगह बना दिया है,जहां पर्यटक परिवार के साथ सुकून ढूंढने आते,वहां अब लोग गोपनीयता के नाम पर गलत गतिविधियों को अंजाम दे रहे हैं।
अब सवाल सिस्टम से है,सिर्फ ठेकेदार से नहीं
आज ठेकेदार को नोटिस दिया गया है,कार्रवाई की जा रही है, लेकिन क्या इससे पूरी कहानी खत्म हो जाती है? क्या यह मान लिया जाए कि सारी गलती सिर्फ एक व्यक्ति की है? या फिर यह एक पूरे सिस्टम की विफलता है,जिसने समय रहते न तो जांच की, न निगरानी रखी? अगर जवाब ईमानदारी से ढूंढा जाए,तो उंगलियां कई दिशाओं में उठेंगी।
झुमका की असली तस्वीर
झुमका जलाशय की कहानी किसी एक घटना की कहानी नहीं है, यह उस सोच की कहानी है, जहां विकास को दिखाने पर ज्यादा जोर होता है,सुधारने पर नहीं,आज जो कार्रवाई हो रही है,वह जरूरी है लेकिन पर्याप्त नहीं,जरूरत है कि पारदर्शी जांच की, जिम्मेदारी तय करने की और सबसे महत्वपूर्ण—ईमानदारी से सुधार की वरना झुमका हमेशा एक उदाहरण बना रहेगा—कैसे एक खूबसूरत सपना, लापरवाही और दिखावे की भेंट चढ़ गया,और तब शायद लोग यही कहेंगे झुमका तो बना था चमकने के लिए,लेकिन यहां तो सिस्टम ही झूमता रह गया।


Share

Check Also

बलरामपुर@ बलरामपुर पुलिस की बड़ी कार्रवाई

Share 12 घंटे में 22 स्थायी वारंटी गिरफ्तार,वर्षों से फरार आरोपी भी पकड़ेबलरामपुर,01 जून 2026 …

Leave a Reply