बिलासपुर,24 अप्रैल 2026। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंर्त्य विधेयक को चुनौती देने वाली याचिका को हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया है। याचिकाकर्ता ने विधेयक को संविधान के अनुच्छेदों का उल्लंघन बताया था। मामले की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए महाधिवक्ता ने याचिका की ग्राह्यता पर आपत्ति जताते हुए, खारिज करने का अनुरोध किया था। इस मामले की सुनवाई चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा व जस्टिस रविंद्र अग्रवाल की डिवीजन बेंच में हुई।
याचिका में की गई थी विधेयक
को निरस्त करने की मांग…
दरअसल,छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंर्त्य विधेयक को चुनौती देते हुए याचिकाकर्ता अमरजीत पटेल ने अधिवक्ता ज्ञानेंद्र कुमार महिलांग के जरिए हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। जिसमें कहा गया था, कि विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता, अंतःकरण और चयन के मौलिक अधिकार पर कठोर प्रतिबंध लगाता है। यह विधेयक मनमाना, अस्पष्ट, अत्यधिक व्यापक, भेदभावपूर्ण, असंगत तथा भारत के संविधान के अनुच्छेद 14,19 (1) (ए), 21,25, और 29 का उल्लंघन करने वाला है। लिहाजा विधेयक को असंवैधानिक घोषित करते हुए निरस्त करने की मांग की थी।
राज्य सरकार का पक्ष
इस मामले में राज्य सरकार की ओर से पैरवी करते हुए महाधिवक्ता विवेक शर्मा ने याचिका की ग्राह्यता को चुनौती देते हुए कहा कि याचिका इस समय विधि विचारण की पात्रता नहीं रखती, यह ग्राह्य होने योग्य ही नहीं है। हाई कोर्ट ने कहा, राज्य सरकार ने अभी तक प्रवर्तन की तिथि अधिसूचित नहीं की है, इसलिए अधिनियम को चुनौती देना समय से पहले होगा। इस आधार पर डिवीजन बेंच ने याचिका को खारिज कर दिया है।
विधानसभा में 19 मार्च को पारित
हुआ था धर्म स्वातंर्त्य विधेयक
बता दें कि छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंर्त्य अधिनियम को 19 मार्च 2026 को विधानसभा ने पारित किया है। 10 अप्रैल 2026 को अधिसूचना प्रकाशित की गई, अधिसूचना में लिखा है, विधानसभा का निम्नलिखित अधिनियम जिस पर 6 अप्रैल 2026 को राज्यपाल की अनुमति प्राप्त हो चुकी है। राज्यपाल के हस्ताक्षर के बाद राज्य सरकार राजपत्र में प्रकाशित करेगी। राजपत्र में प्रकाशन होते ही विधेयक कानून का रूप ले लेगा।
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