

- 15 लाख का रपटा अब भी अधूरा-गोबरी नदी पर विकास की दो रफ्तार
- पुल टूटा 7 महीने से…रपटा फाइलों में-ठेकेदार बड़े काम में व्यस्त,छोटा काम उपेक्षित
- गोबरी नदी : करोड़ों का निर्माण जारी,जरूरी राहत कार्य ठप्प—जनता जोखिम में
- गोबरी नदी पर विकास की दो तस्वीरें : एक तेज…एक ठप्प
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/कोरिया,23 अप्रैल 2026 (घटती-घटना)। गोबरी नदी पर चल रहे निर्माण कार्यों ने प्रशासनिक प्राथमिकताओं,ठेकेदारी व्यवस्था और जमीनी जरूरतों के बीच गहरे अंतर को उजागर कर दिया है,एक ओर जहां बिरमताल से उमेशपुर मार्ग पर लगभग 3 करोड़ 60 लाख रुपये की लागत से स्थायी पुल का निर्माण कार्य तेज गति से जारी है,वहीं दूसरी ओर उसी नदी पर पहले से टूटा हुआ पुल और उसके विकल्प के रूप में प्रस्तावित 15 लाख रुपये का रपटा पुल अब तक शुरू भी नहीं हो पाया है, स्थिति की विडंबना यह है कि दोनों कार्यों की जिम्मेदारी एक ही ठेकेदार के पास है,लेकिन उसकी प्राथमिकता स्पष्ट रूप से बड़े बजट वाले प्रोजेक्ट पर केंद्रित दिखाई दे रही है,इसका सीधा असर उन हजारों ग्रामीणों पर पड़ रहा है,जिनके लिए रपटा पुल रोजमर्रा के जीवन की जरूरत बन चुका है।
एक ही नदी, दो परियोजनाएं प्राथमिकता में फर्क क्यों?
गोबरी नदी पर दो अलग-अलग परियोजनाएं चल रही हैं पहली,एक स्थायी पुल जो भविष्य के लिए महत्वपूर्ण है और जिसकी लागत करोड़ों में है, दूसरी,एक अस्थायी लेकिन तत्काल राहत देने वाला रपटा पुल, जिसकी लागत अपेक्षाकृत बहुत कम है,हालांकि,जमीनी हकीकत यह है कि स्थायी पुल का निर्माण जहां गति पकड़ चुका है, वहीं रपटा पुल का कार्य फाइलों और औपचारिकताओं में उलझा हुआ है,सूत्रों के अनुसार,रपटा पुल का काम उसी ठेकेदार को दिया गया, जिसने प्रारंभिक स्तर पर नदी में मिट्टी भराव का कार्य किया था। यह भी कहा जा रहा है कि यह कार्य उसे लगभग ‘उपहार’ के रूप में सौंपा गया। इसके बावजूद,कार्य प्रारंभ न होना कई सवाल खड़े करता है क्या छोटे कार्यों को जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है? क्या आर्थिक लाभ के आधार पर प्राथमिकताएं तय हो रही हैं?
7 महीने से टूटा पुल जमीनी हकीकत जस की तस
गोबरी नदी पर बना पुराना पुल पिछले लगभग 7 महीनों से क्षतिग्रस्त अवस्था में पड़ा हुआ है। यह पुल डुमरिया से राष्ट्रीय राजमार्ग 43 (एनएच-43) होते हुए शिवप्रसाद नगर को जोड़ने वाला प्रमुख मार्ग था, इसके टूटने के बाद से दो जिलों के बीच सीधा संपर्क बाधित हो गया है,व्यापार और परिवहन गतिविधियां प्रभावित हुई हैं, ग्रामीणों को लंबा और महंगा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ रहा है,शुरुआत में प्रशासन ने तत्काल वैकल्पिक व्यवस्था और स्थायी समाधान का भरोसा दिया था,स्थायी पुल को बजट में शामिल करने की बात भी कही गई, लेकिन यह योजना अब तक जमीन पर नहीं उतर पाई है।
हल्की बारिश में भी रास्ता बंद—बढ़ता खतरा
गोबरी नदी में जलस्तर बढ़ते ही स्थिति और गंभीर हो जाती है, लोग नदी पार करने से कतराने लगते हैं,कई बार बीच रास्ते में फंस जाते हैं, दुर्घटनाओं की संभावना बढ़ जाती है,बरसात के मौसम में यह समस्या विकराल रूप ले सकती है। यदि समय रहते रपटा पुल नहीं बना,तो पूरा क्षेत्र संपर्कहीन हो सकता है।
जनसहयोग से शुरुआत, लेकिन अधूरा प्रयास
पुल टूटने के बाद स्थानीय ग्रामीणों ने स्वयं आगे आकर समस्या का समाधान निकालने की कोशिश की,उन्होंने चंदा एकत्र किया और श्रमदान के जरिए रपटा पुल बनाने का कार्य शुरू किया, कुछ हद तक काम भी हुआ, लेकिन यह प्रयास अधूरा रह गया, जैसे ही मामला प्रशासनिक स्तर पर पहुंचा, जनसहयोग की पहल फाइलों में दब गई।
रपटा पुलः स्वीकृति,टेंडर, ठेकेदार—फिर भी काम शुरू नहीं
रपटा पुल के लिए लगभग 15 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की जा चुकी है,टेंडर प्रक्रिया पूरी हो चुकी है,ठेकेदार का चयन भी हो चुका है, इसके बावजूद,निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ है,स्थानीय सूत्रों के अनुसार, ठेकेदार कार्य शुरू करने के लिए मंत्री और विधायक के भूमिपूजन कार्यक्रम का इंतजार कर रहा है,यह स्थिति विकास कार्यों की प्राथमिकता पर गंभीर सवाल खड़े करती है, क्या अब जरूरी काम भी राजनीतिक कार्यक्रमों के बिना शुरू नहीं हो सकते?
ग्रामीणों का संघर्ष, हर दिन जोखिम भरा सफर
पुल के अभाव में स्थानीय लोगों की जिंदगी बेहद कठिन हो गई है,स्कूली बच्चे जान जोखिम में डालकर नदी पार कर रहे हैं, गर्भवती महिलाओं और मरीजों को अस्पताल ले जाना चुनौती बन गया है,किसानों और मजदूरों के काम पर सीधा असर पड़ रहा है, हल्की बारिश में भी नदी का जलस्तर बढ़ते ही आवागमन पूरी तरह ठप्प हो जाता है, ग्रामीणों का कहना है कि यह समस्या अब उनकी दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन गई है, लेकिन समाधान अभी भी दूर नजर आता है।
पूर्व चेतावनियां नजरअंदाज अब संकट गहराया
जुलाई और अगस्त 2025 में प्रकाशित खबरों में इस पुल की स्थिति और निर्माण गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठाए गए थे,इन खबरों में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया, तो स्थिति गंभीर हो सकती है,इसके बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई निरीक्षण के बाद भी काम शुरू नहीं हुआ,चेतावनियों को नजरअंदाज किया गया आज 7 महीने बाद वही आशंकाएं हकीकत बन चुकी हैं।
विभागीय उदासीनताः जिम्मेदारी से दूरी-
इस पूरे मामले में सेतु विभाग की भूमिका भी सवालों के घेरे में है,ठेकेदार पर कोई दबाव नहीं, कार्य प्रारंभ कराने में देरी,अधिकारियों का संपर्क से बचना,स्थानीय लोगों का आरोप है कि संबंधित अधिकारी फोन तक उठाने से बच रहे हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि इस समस्या को प्राथमिकता नहीं दी जा रही है।
निरीक्षण और आश्वासनः जमीनी असर नहीं…
इस दौरान कई बार जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों ने स्थल का निरीक्षण किया,हर बार समाधान का आश्वासन दिया गया,लेकिन वास्तविकता में कोई ठोस कार्य शुरू नहीं हुआ,यह स्थिति दर्शाती है कि प्रशासनिक स्तर पर निर्देश और क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर है।
आगामी मानसून में संकट और गहराने की आशंका
बरसात का मौसम नजदीक है,यदि जल्द ही रपटा पुल का निर्माण नहीं हुआ, तो आवागमन पूरी तरह ठप हो सकता है ग्रामीणों की परेशानी कई गुना बढ़ सकती है,आपातकालीन सेवाएं प्रभावित हो सकती हैं यह केवल एक पुल का मुद्दा नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की जीवनरेखा का सवाल है।
जनता के सवाल की जवाबदेही कौन तय करेगा?
जब बजट स्वीकृत है,तो काम क्यों नहीं शुरू हुआ?
एक ही ठेकेदार के पास दोनों काम क्यों दिए गए?
छोटे लेकिन जरूरी कार्य को प्राथमिकता क्यों नहीं मिली?
क्या प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से ले रहा है?
विकास का संतुलन जरूरी
गोबरी नदी का यह मामला केवल एक निर्माण कार्य की देरी नहीं है, बल्कि यह दर्शाता है कि विकास की प्राथमिकताएं किस तरह असंतुलित हो सकती हैं,एक ओर करोड़ों का पुल बन रहा है, जो भविष्य के लिए जरूरी है,लेकिन दूसरी ओर वर्तमान की जरूरत रपटा पुल अब भी अधूरा है,जब तक तत्काल जरूरतों और दीर्घकालिक योजनाओं के बीच संतुलन नहीं बनाया जाएगा, तब तक ऐसी समस्याएं बार-बार सामने आती रहेंगी,अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन और जिम्मेदार विभाग इस मामले में कब तक ठोस कदम उठाते हैं या फिर यह पुल भी लंबे समय तक केवल फाइलों और घोषणाओं में ही बना रहेगा।
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