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रायपुर@वरिष्ठता का खेल या घोटाला? 10 साल में उलटी सूची, सीधी पदोन्नति!गलत सूची पर प्रमोशन का खेलः खाद्य विभाग में 10 साल का बड़ा खुलासा

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  • मेरिट दबाई,आरक्षण तोड़ा-वरिष्ठता घोटाले ने खोली सिस्टम की पोल
  • पहले वाले पीछे, बाद वाले आगे—खाद्य विभाग में उलटी वरिष्ठता का सच
  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन में 10 साल से चल रहा वरिष्ठता विवाद,गलत सूची पर पदोन्नति,स्थापना शाखा की भूमिका पर गंभीर सवाल
  • दो नियुक्तियों को मिलाने से शुरू हुई गड़बड़ी, मेरिट और आरक्षण रोस्टर की अनदेखी,अब आयोग और न्यायालय तक पहुंचा मामला
  • विवादित वरिष्ठता सूची बनी प्रमोशन का आधार, जांच की मांग तेज
  • 10 साल से दोहराई गई गलती या सुनियोजित खेल? वरिष्ठता विवाद की पड़ताल
  • स्थापना शाखा की भूमिका पर सवालः कैसे बिगड़ी खाद्य अधिकारियों की वरिष्ठता?
  • वरिष्ठता से प्रमोशन तकः एक ही गलती ने कैसे बदल दिया पूरा सिस्टम

न्यूज डेस्क
रायपुर,29 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की वरिष्ठता सूची को लेकर उठा विवाद अब एक बड़े प्रशासनिक और कानूनी मुद्दे का रूप ले चुका है, पिछले लगभग 10 वर्षों से चली आ रही इस प्रक्रिया में लगातार गड़बडि़यों के आरोप लगे हैं,जिनका असर न केवल अधिकारियों की वरिष्ठता पर पड़ा, बल्कि पदोन्नति,वेतनमान और सेवा क्रम भी प्रभावित हुआ,मामला अब राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग और न्यायालय तक पहुंच चुका है,जहां इस पूरी प्रक्रिया की वैधता पर सवाल उठाए जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ के खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वरिष्ठता सूची का यह विवाद अब एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक और कानूनी मुद्दा बन चुका है,यह मामला केवल कुछ अधिकारियों की वरिष्ठता का नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की पारदर्शिता और जवाबदेही से जुड़ा हुआ है, आने वाले समय में आयोग और न्यायालय के निर्णय से यह स्पष्ट होगा कि यह केवल एक त्रुटि थी या एक ऐसी प्रक्रिया, जिसने वर्षों तक कुछ को लाभ और कुछ को नुकसान पहुंचाया।
मामले की पृष्ठभूमिः 2015 की नियुक्ति से शुरुआत
विवाद की जड़ वर्ष 2015 में हुई खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति से जुड़ी है, उस समय भर्ती प्रक्रिया विधिवत चयन सूची (मेरिट सूची) और आरक्षण रोस्टर के अनुरूप की गई थी,नियुक्ति आदेश भी निर्धारित नियमों के अनुसार जारी किए गए थे, नियमों के अनुसार,नियुक्ति के बाद वरिष्ठता का निर्धारण तीन प्रमुख आधारों पर होना था चयन सूची (मेरिट),आरक्षण रोस्टर व नियुक्ति तिथि,लेकिन आरोप है कि यहीं से प्रक्रिया में पहली बड़ी चूक हुई,जिसने आगे चलकर पूरे विवाद को जन्म दिया।
वरिष्ठता उलटने से
प्रभावित हुआ सेवा क्रम

वरिष्ठता सूची में हुई इस गड़बड़ी का सीधा असर अधिकारियों के सेवा क्रम पर पड़ा, जिन अधिकारियों की नियुक्ति पहले हुई थी, वे अपेक्षाकृत नीचे स्थान पर पहुंच गए, जबकि बाद में नियुक्त अधिकारी सूची में ऊपर आ गए। इससे,पदोन्नति के अवसर प्रभावित हुए,वेतनमान और एसीआर पर असर पड़ा,प्रशासनिक जिम्मेदारियों में भी असंतुलन पैदा हुआ।
स्थापना शाखा की
भूमिका पर सवाल

इस पूरे मामले में सबसे अधिक सवाल विभाग की स्थापना शाखा पर उठ रहे हैं, वर्ष 2015 के दौरान स्थापना से जुड़े अधिकारियों में शामिल थे,डॉ. अजय शंकर कनौजिया (तत्कालीन असिस्टेंट कमिश्नर),हिरेन/हिरण मन्नू भाई पटेल, बसंत कौशिक,बेणीराम साहू आरोप है कि इन्हीं के कार्यकाल में वरिष्ठता सूची तैयार करने में प्रारंभिक त्रुटियां हुईं,इसके बाद अगले 10 वर्षों में कई अधिकारी स्थापना शाखा में आए और गए,लेकिन किसी ने भी इस त्रुटि को सुधारने का प्रयास नहीं किया, बल्कि आरोप यह है कि हर बार वही गलती दोहराई गई, वरिष्ठता सूची को और अधिक जटिल बनाया गया।
गलतियों की श्रृंखलाः
2015 से 2026 तक…

यह मामला केवल एक बार हुई गलती तक सीमित नहीं रहा, 2015 से लेकर 2026 तक वरिष्ठता सूची में सुधार के बजाय संशोधन किए गए,लेकिन मूल त्रुटि को ठीक नहीं किया गया,परिणामस्वरूप हर संशोधन के साथ विवाद और गहराता गया,इस तरह यह मामला एक ‘सिस्टमेटिक एरर’ का रूप लेता गया।
2024 व 2025 की वरिष्ठता सूची बनी विवाद का केंद्र
विभाग द्वारा 01 अप्रैल 2024 की स्थिति में अंतिम वरिष्ठता सूची जारी की गई, इस सूची में अधिकारियों की नियुक्ति तिथि,श्रेणी (त्रद्गठ्ठद्गह्म्ड्डद्य/स्ष्ट/स्भ्/ह्रख्ष्ट),सेवा विवरण दर्ज किया गया है,लेकिन शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि यह सूची,मेरिट के अनुसार नहीं है,आरक्षण रोस्टर के अनुरूप नहीं है, नियुक्ति क्रम का पालन नहीं करती।
दो अलग नियुक्तियों को एक सूची में मिलाने से बढ़ा विवाद-
मामले की सबसे महत्वपूर्ण और विवादित कड़ी यह बताई जा रही है कि खाद्य सुरक्षा अधिकारियों की भर्ती दो अलग-अलग चरणों में हुई थी, नियमों के अनुसार इन दोनों नियुक्तियों की वरिष्ठता सूची अलग-अलग तैयार की जानी चाहिए थी,लेकिन विभाग की स्थापना शाखा द्वारा, दोनों नियुक्तियों को एक ही वरिष्ठता सूची में समाहित कर दिया गया, मेरिट और आरक्षण के मूल सिद्धांतों को नजरअंदाज किया गया, इस एक निर्णय ने पूरी वरिष्ठता व्यवस्था को प्रभावित कर दिया, परिणामस्वरूप, पहले नियुक्त अधिकारी सूची में नीचे चले गए, बाद में नियुक्त अधिकारी ऊपर आ गए।
इसी विवादित सूची पर
जारी हुए प्रमोशन आदेश

विवाद को और गंभीर तब माना गया जब इसी वरिष्ठता सूची के आधार पर 07 अक्टूबर 2025 को पदोन्नति आदेश जारी कर दिए गए, इस आदेश के तहत 25 अधिकारियों को पदोन्नति दी गई,उन्हें उच्च पदों पर पदस्थ किया गया, वेतनमान में वृद्धि की गई, हालांकि आदेश में यह भी उल्लेख है कि यह प्रक्रिया न्यायालय में लंबित प्रकरण के अंतिम निर्णय के अधीन होगी।
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
प्रभावित अधिकारियों ने इस पूरे मामले को गंभीर बताते हुए राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग को शिकायत भेजी, शिकायत में कहा गया है कि वरिष्ठता में हेरफेर से समानता का अधिकार प्रभावित हुआ, आरक्षण नीति का उल्लंघन हुआ,अनुसूचित जनजाति वर्ग के अधिकारियों के साथ अन्याय हुआ,संविधान के जिन प्रावधानों का उल्लेख किया गया है,अनुच्छेद 14 – समानता का अधिकार,अनुच्छेद 16(4) – आरक्षण का अधिकार,अनुच्छेद 338ए – आयोग की शक्तियां है।
कानूनी स्थितिः ‘अशक्त
और शून्य’ की मांग-

शिकायत में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि वरिष्ठता सूची त्रुटिपूर्ण पाई जाती है,तो उसके आधार पर की गई पूरी पदोन्नति प्रक्रिया स्वतः अवैधमानी जाएगी इसके साथ ही मांग की गई है कि वरिष्ठता सूची को निरस्त किया जाए,पदोन्नति प्रक्रिया को रोका जाए और नई सूची तैयार की जाए।
न्यायालय में लंबित मामला
पदोन्नति आदेश में यह उल्लेख है कि मामला पहले से ही न्यायालय में विचाराधीन है, इसका अर्थ है कि अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा लिया जाएगा,वर्तमान पदोन्नतियां स्थायी नहीं हैं, यदि न्यायालय वरिष्ठता सूची को गलत ठहराता है,तो पदोन्नति आदेश रद्द हो सकते हैं,अधिकारियों की स्थिति पूर्ववत की जा सकती है।
संख्या और स्थिति
सिस्टम की वास्तविक तस्वीर,वरिष्ठता सूची के अनुसार विभाग की स्थिति इस प्रकार हैः-
– कुल स्वीकृत पदः 112
– भरे हुए पदः 47
– रिक्त पदः 65
इतनी बड़ी संख्या में रिक्त पद होने के बावजूद वरिष्ठता विवाद ने विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर असर डाला है।
सबसे बड़ा सवालः गलती या साजिश?
इस पूरे मामले में अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि क्या यह केवल प्रशासनिक लापरवाही थी? या जानबूझकर वरिष्ठता में बदलाव किया गया? विशेषज्ञों के अनुसार 10 वर्षों तक एक ही प्रकार की त्रुटि का बने रहना, सुधार के प्रयासों का अभाव,उसी त्रुटिपूर्ण सूची पर पदोन्नति देना, यह सामान्य प्रशासनिक गलती से अधिक गंभीर मामला प्रतीत होता है,कुछ अधिकारी इसे प्रमोशन दिलाने के लिए प्रभाव या आर्थिक लाभ का माध्यम के रूप में भी देख रहे हैं, हालांकि इसकी पुष्टि जांच के बाद ही संभव होगी।
प्रशासनिक प्रणाली की विफलता,यह मामला कई स्तरों पर प्रशासनिक विफलता को दर्शाता हैः-
– नीतिगत स्तर पर त्रुटि – वरिष्ठता निर्धारण के नियमों का पालन नहीं।
– कार्यान्वयन स्तर पर चूक-गलत सूची को बार-बार लागू करना।
– सुधार तंत्र की कमी-10 वर्षों में सुधार नहीं होना।
– पारदर्शिता का अभाव-अधिकारियों को स्पष्ट जानकारी नहीं देना।


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