-संवाददाता-
अम्बिकापुर, 26 मार्च 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ का सरगुजा अंचल अपनी प्राकृतिक सुंदरता, पुरातत्व, इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के साथ-साथ अटूट धार्मिक आस्था के लिए भी विश्व विख्यात है। यहाँ की मिट्टी के कण-कण में शक्ति का वास माना जाता है। राज्यपाल पुरस्कृत पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी स्मृति पुरस्कार प्राप्तकर्ता साहित्यकार अजय कुमार चतुर्वेदी ने बताया कि माँ महामाया से लेकर कुदरगढ़ी देवी तक, यहां भक्ति के कई रूप हैं। सरगुजा अंचल अपनी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और अटूट धार्मिक आस्था के लिए विख्यात है। यहां कण-कण में देवी का वास माना जाता है। मां भगवती यहाँ अलग-अलग रूपों और नामों से पूजी जाती हैं, पर भक्तों की अटूट श्रद्धा हर नाम में एक समान है। अजय चतुर्वेदी ने बताया कि सरगुजा की धरती पर शक्ति की उपासना की गहरी परंपरा है। यहाँ भक्त माँ महामाया के दरबार में शीश नवाते हैं, तो कहीं ज्वालामुखी देवी, खुडिय़ा रानी, बडकी माई, रमपुरहिन दाई, बूढ़ी दाई, गढ़वतिया देवी, वनदेवी और माँ समलाया के रूप में शक्ति की आराधना होती है। इन्हीं दिव्य रूपों में से एक हैं माँ वनदेवी, जिन्हें सरगुजा अंचल की मनोकामना पूर्ति की देवी के रूप में विशेष मान्यता प्राप्त है। आइए, जानते हैं साडबार स्थित माँ वनदेवी की अद्भुत महिमा।
साडबार (हर्रा टिकरा) में
विराजमान हैं माँ वनदेवी
सरगुजा जिला मुख्याल अंबिकापुर से लगभग 4 किमी की दूरी पर हर्रा टिकरा ग्राम पंचायत के साडबार के घनाघेर जंगलों के बीच माँ वनदेवी स्वयंभू रूप में हाथी स्वरूप विसाल पत्थर के पास पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान थीं। वर्तमान समय मे माँ वनदेवी मंदिर में विराजमान हैं। लगभग तीन दशक पहले वनदेवी मंदिर वनवाकर मां को स्थान दिया गया है। माँ वनदेवी मंदिर आस्था, इतिहास और प्रकृति का एक अद्भुत संगम है। श्रद्धा का अनूठा धाम सरगुजा की मनोकामना देवी माँ वनदेवी के संबंध में एक मान्यता प्रचलित है कि यहां पत्थर चढ़ाने से पूरी होती है मुराद।
प्रकृति और आस्था का अनूठा संगम
साडबार स्थित माँ वनदेवी मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ की सदियों पुरानी पूजा पद्धति है। मान्यता है कि वन में निवास करने वाली देवी को प्रकृति का यही सरल स्वरूप प्रिय है। मंदिर परिसर में पड़े पत्थरों के ढेर इस बात की गवाही देते हैं कि यहाँ आने वाला कोई भी भक्त खाली हाथ नहीं लौटता। जब मन्नत पूरी होती है, तो भक्त कृतज्ञता के साथ यहाँ पत्थर अर्पित करते हैं।
त्रेतायुग और राजशाही
इतिहास से गहरा नाता
जनश्रुतियों के अनुसार, वनवास काल के दौरान माता सीता ने इस एकांत स्थल पर समय बिताया था। यहाँ उन्होंने ‘वन देवी’ के रूप में अपनी पहचान गुप्त रखी थी। मंदिर के समीप एक विशाल ‘हाथी स्वरूप’ पत्थर है। रियासत काल में जब राजाओं के हाथी अनियंत्रित या पागल हो जाते थे, तो उन्हें इसी पत्थर के पास बांधा जाता था। माना जाता है कि माँ की कृपा से वे हाथी शांत और स्वस्थ हो जाते थे। सरगुजा रियासत के राजा शिकार पर निकलने से पहले माँ वनदेवी की अनुमति लेना अनिवार्य समझते थे। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि पूर्वजों के अनुसार, राजा साहब ने इसी क्षेत्र में शेर का शिकार भी किये थे।
आध्यात्मिक केंद्र के
रूप में उभरता साडबार
आज यह स्थल केवल एक छोटा स्थान नहीं, बल्कि एक जागृत सिद्धपीठ बन चुका है। जंगलों के बीच स्थित इस परिसर में अब भव्य मंदिर का निर्माण हो चुका है। यहाँ माँ वनदेवी के साथ-साथ वनेश्वर महादेव, विनायक मंदिर,पंचमुखी हनुमान, राधा-कृष्ण, संतोषी माता और माँ दुर्गा के मंदिर भी स्थापित हैं। प्रकृति की गोद में बसा यह मंदिर न केवल मानसिक शांति प्रदान करता है, बल्कि प्राचीन लोक मान्यताओं और मानवीय जुड़ाव का एक जीवंत उदाहरण पेश करता है। माँ वनदेवी के दरबार में अटूट विश्वास ही सबसे बड़ा प्रसाद है। यहाँ चढ़ाया गया एक गोटा पत्थर भक्त की बड़ी से बड़ी मुराद पूरी करने की शक्ति रखता है।
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