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बिलासपुर@हाईकोर्ट ने पैतृक संपत्ति में हिस्सेदारी को लेकर दिया महत्वपूर्ण फैसला…

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बिना प्रमाणित मौखिक बंटवारे से बेटी का सहदायिक अधिकार नहीं होता समाप्त

बिलासपुर,03 फरवरी 2026। पैतृक संपत्ति में बेटियों के अधिकार को लेकर छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि 20 दिसंबर 2004 से पहले का अप्रमाणित मौखिक बंटवारा बेटी के सहदायिक (कॉपरसेनरी) अधिकार को समाप्त नहीं कर सकता। न्यायालय ने पैतृक कृषि भूमि में हिस्सेदारी की मांग को लेकर दायर अपील को स्वीकार करते हुए विचारण न्यायालयों के आदेशों को निरस्त कर दिया। न्यायमूर्ति बिभु दत्त गुरु की एकलपीठ ने कहा कि यदि विधि द्वारा मान्य बंटवारे का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है, तो वादी (पुत्री) सहदायिक बनी रहती है और उसे संपत्ति के विभाजन व पृथक कब्जे का अधिकार है। केवल मौखिक बंटवारे का दावा, बिना कानूनी प्रमाण के,बेटी के अधिकार को नकारने का आधार नहीं बन सकता। यह अपील उस वाद से जुड़ी थी,जिसमें वादी ने पैतृक कृषि भूमि में अपना हिस्सा मांगा था। ट्रायल कोर्ट और प्रथम अपीलीय न्यायालय ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 6(1) के प्रावधान का हवाला देते हुए वाद खारिज कर दिया था। हाईकोर्ट ने इन दोनों समवर्ती निर्णयों को रद्द करते हुए कहा कि संशोधित कानून का उद्देश्य लैंगिक भेदभाव को समाप्त करना और बेटियों को पुत्रों के समान अधिकार देना है। प्रतिवादियों ने यह तर्क दिया कि 20 दिसंबर 2004 से पहले संपत्ति का मौखिक बंटवारा हो चुका था और वादी को पिता के जीवनकाल में भूमि व मकान का हिस्सा दे दिया गया था। अदालत ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि धारा 6(1) का संरक्षण केवल उन्हीं बंटवारों को मिलता है, जो या तो सक्षम न्यायालय के डिक्री से हुए हों या पंजीकृत दस्तावेज के माध्यम से। यहां न तो कोई पंजीकृत बंटवारा पत्र प्रस्तुत किया गया और न ही कोई न्यायिक आदेश। हाईकोर्ट ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय विनीता शर्मा बनाम राकेश शर्मा (2020) का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि सामान्यतः मौखिक बंटवारे को कानून मान्यता नहीं देता,जब तक कि वह सार्वजनिक दस्तावेजों से सिद्ध न हो,जो इस मामले में अनुपस्थित था। अदालत ने यह भी कहा कि यदि पिता के जीवनकाल में बेटी को कुछ भूमि या मकान का हिस्सा दिया गया हो,तो उसे पूर्ण और अंतिम बंटवारा नहीं माना जा सकता। यह केवल भरण-पोषण और निवास की अस्थायी व्यवस्था हो सकती है। प्रतिवादियों की ओर से माता-पिता के बीच प्रथागत तलाक का दावा भी किया गया, जिसे भी अदालत ने अस्वीकार कर दिया। न्यायालय ने कहा कि किसी भी प्रथा को मान्य कराने के लिए उसका स्पष्ट उल्लेख और कठोर प्रमाण आवश्यक होता है,जो इस मामले में प्रस्तुत नहीं किया गया। अंततः न्यायालय ने माना कि बिना प्रमाणित मौखिक बंटवारे के आधार पर बेटी के वैधानिक अधिकार को नकारना कानून सम्मत नहीं है। वादी सहदायिक बनी रहेगी और उसे पैतृक संपत्ति के विभाजन व पृथक कब्जे का पूरा अधिकार प्राप्त है।


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