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कविता@झर-झर-झर-झर पानी बरसे …

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झर-झर-झर-झर पानी बरसे,सर-सर-सर हवा ह धुंके
घड़-घड़-घड़ बादर गरजे चम-चम-चम बिजली चमके
चारो मुड़ा म घपटे बदरिया,उमड़ घुमड़ के बादर बरसे
प्यास बुझे हे भुईया के,नदिया नरवा झोरकी ह छलके
दादुर बोले झींगुर हर बोले कोयलिया ह कुहक लगाए
उमड़-घुमड़ के बदरिया बरसे,पानी के धार हर बोहाए
डी-डोंगर म हरियाली छाए,मंजूरिया हर पाँव थिरकाये
कल-कल, छल-छल,नदिया-नरवा सुग्घर तान सुनाये
रुनझुन-रुनझुन,खेत-खारी लागे, पैडगरी हर हरियागे
मेड-पार म तिल-राहेर बोंवागे, मुही पार जमो बंधागे
खेत के गोबर खातु पलागे,खेत खार जमो हर जोंतागे
कर्मा-ददरिया, गावत-गावत नगरिया के नागर फंदागे
खलभल-खलभल पानी लागे बईला ह नागर फंदाए
धरके तुतारी नांगर मुठ ल नंगरिया हर नांगर चलाए
खेत-खार के चारो मुड़ा म,नंगरिया के कुहकी सुनाए
गाँव-गंवई म उजास आगे,जईसे खेती तिहार आए


अशोक पटेल
तुस्मा शिवरीनारायण
छत्तीसगढ़


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