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बैकुंठपुर@क्या कोरिया भाजपा ने एक आदिवासी महिला नेत्री पर कार्यवाही करके उसका मनोबल तोड़ने का काम किया?

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-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,13 मार्च 2025 (घटती-घटना)। भाजपा ने अभी एक बड़ी कार्यवाही करते हुए भाजपा की एक ऐसी आदिवासी महिला नेत्री पर कार्यवाही की है जो आदिवासी समुदाय को भाजपा के लिए जोड़कर रखती हैं साथ ही भाजपा के लिए जिला से लेकर जनपद तक की कई सीटें जिताने का माद्दा रखती है, अपने क्षेत्र की वह एक अच्छी नेत्री है अभी तक आदिवासी महिला नेत्री ने सरपंच से लेकर जिला पंचायत तक हार का मुंह नहीं देखा सिर्फ जीत ने उनके कदम चूमे,भाजपा के लिए पूरी तरीके से समर्थित होकर काम करती रहने वाली आदिवासी महिला नेत्री भाजपा को मजबूत करती रही हैं, महिला नेतृत्व की भाजपा में कमी है उसके बावजूद भी एक ऐसी महिला नेत्री है सौभाग्यवती कुसरो जो भाजपा के लिए महिला मतदाताओं से लेकर महिलाओं को जोड़ने का काम करती है कई कांग्रेस समर्थित महिलाओं को उन्होंने भाजपा से जोड़ने का काम किया भाजपा में सिर्फ उनकी गलती इतनी थी कि जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रत्याशी वह बनना चाहती थीं और उसके लिए वह योग्य भी थीं सबसे प्रथम अधिकार भी उनका था पर इसके बावजूद पहली बार भाजपा में शामिल हुए एक व्यक्ति को मौका दिया गया जो कहीं ना कहीं उनके लिए दुखी होने वाला पल था यही कारण था कि उन्होंने पार्टी के निर्णय के विरुद्ध जाने का निर्णय लिया और पार्टी ने उनके विरुद्ध 6 साल की निष्कासन की बड़ी करते हुए उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया। वहीं क्या इस कार्यवाही के बाद भी वह भाजपा के लिए उस तरह काम कर पाएगी जिस तरह वह काम कर रही थी या फिर भाजपा का उन्हें अध्यक्ष प्रत्याशी न बनाने का निर्णय आगे चलकर गलत साबित होगा क्योंकि वह हर तरह से कोरिया जिले की जिला पंचायत अध्यक्ष बनने की काबिलियत रखती थी। सौभाग्यवती सिंह भाजपा की सच्ची सिपाही थीं और उनका निष्कासन कर्मठ कार्यकर्ताओं के हिसाब से गलत है जल्दबाजी में लिया गया निर्णय है यह कहना गलत नहीं होगा।

सौभाग्यवती सिंह के विरुद्ध हुई निष्कासन की कार्यवाही नियम विरुद्ध,राजनीतिक जानकार
राजनीतिक जानकारों की माने तो सौभाग्यवती सिंह के विरुद्ध की गई भाजपा पार्टी से निष्कासन की कार्यवाही नियम विरुद्ध है। जानकारों के अनुसार निष्कासन तब किसी का अनुशासनात्मक कारणों से होता है जब कोई पार्टी सदस्य पदाधिकारी पार्टी के चिन्ह के विरुद्ध जाकर चुनाव लड़ता है। पार्टी चिन्ह जिला जनपद के चुनाव में न तो सदस्य निर्वाचन में होता है और न अध्यक्ष उपाध्यक्ष निर्वाचन में इस हिसाब से यदि कोई चुनाव लड़ भी जाता है वह उतना दोषी नहीं होता जैसे राजेश साहू संगीता सोनवानी को भाजपा ने कोरिया में ही अपना लिया जबकि दोनों ने भाजपा समर्थित प्रत्याशी को चुनाव हराया है अब ऐसे में सौभाग्यवती का निष्कासन कहीं न कहीं नियम विरुद्ध है व्यक्तिगत द्वेष की वजह से है यह कहना सही होगा या विधायक का समर्थक होना उनकी गलती है। अब मामला जो भी हो सौभाग्यवती का निष्कासन किसी भी हिसाब से सही नहीं है वहीं यदि सौभाग्यवती सिंह गलत हैं तो राजेश साहू गलत हैं वहीं भरतपुर सोनहत विधायक खुद पुत्री सहित गलत हैं जिन्होंने अपनी बेटी को पार्टी समर्थित प्रत्याशी के विरुद्ध चुनाव में उतारा और जीत दर्ज किया।

क्या विधायक को नुकसान पहुंचाने के लिए संगठन ने जिला पंचायत अध्यक्ष के दावेदार में वर्चस्व की लड़ाई का तड़का लगाया
जिला पंचायत अध्यक्ष में वर्चस्व की कोई लड़ाई नहीं थी सीनियरिटी को देखते हुए सौभाग्यवती जिला पंचायत अध्यक्ष की प्रबल दावेदार थी इसमें कोई संदेह नहीं था पर अचानक मोहित के जीतने के बाद संगठन ने इस लड़ाई को वर्चस्व की लड़ाई बता बना दिया यदि मोहित पैकरा हार जाता तो शायद सौभाग्यवती ही भाजपा की समर्थित अध्यक्ष प्रत्यासी होती और वह भी निर्विरोध निर्वाचित अध्यक्ष हो सकती थी, पर कहीं न कहीं संगठन ने उसके जीतने के साथ ही पार्टी में एक अंदरूनी लड़ाई भी निर्मित कर दी और वह लड़ाई आज निष्कासन तक पहुंच गई, सूत्रों का दावा है कि यह लड़ाई सिर्फ विधायक के कद को नीचे दिखाने के लिए लड़ी गई है। यदि संगठन चाहता तो इस लड़ाई को खत्म कर सकता था कई पहलु पर विचार करके, पर शायद जिला संगठन इस लड़ाई को निष्कासन तक पहुंचाना ही उसका उद्देश्य था, यह भी माना जा रहा है। यह लड़ाई का असर आगामी चुनाव में भी देखने को मिल सकता है। कहीं ना कहीं अध्यक्ष के दावेदार का प्रत्यासी चैन से लेकर निष्कासन तक बीजेपी के लिए नुकसान से जोड़ कर देखा जा रहा है।

निष्कासन…भाजपा की तरफ उस समाज को आने से रोकने वाला निर्णय साबित होगा?
सौभाग्यवती सिंह आदिवासी समुदाय की उस जाती से आती हैं जिसका समर्थन भाजपा को कम ही मिलता है और कहीं न कहीं सौभाग्यवती की वजह से यह समाज भाजपा की तरफ आना चाह रहा था लेकिन उनका निष्कासन भाजपा की तरफ उस समाज को आने से रोकने वाला निर्णय साबित होगा ऐसा राजनीति के जानकारों का कहना है। सौभाग्वती सिंह के लिए जिला पंचायत अध्यक्ष पद का दरवाजा पहले बंद किया गया और अब पार्टी का दरवाजा बंद कर दिया गया। अनुशासनात्मक कार्यवाही अंतर्गत की गई यह कार्यवाही समझ से परे रही क्योंकि जिन लोगों ने भाजपा समर्थित जिला पंचायत सदस्य जनपद पंचायत सदस्य प्रत्याशियों के विरुद्ध जाकर चुनाव लड़ा और पार्टी प्रत्याशियों को हार का मजा चखाया साथ ही थाना पुलिस करके पार्टी की छवि को गिराया उन्हें आज पार्टी में प्रथम पंक्ति दे दी गई है। कुल मिलाकर सौभाग्यवती सिंह पर हुई कार्यवाही की चौतरफा निंदा हो रही है और इस निर्णय को गलत और जल्दबाजी वाला निर्णय बताया जा रहा है।
जिन्होंने भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को हराया उन्हें भाजपा ने गले क्यों लगाया?
सौभाग्यवती सिंह पर निष्कासन की कार्यवाही के बाद अब सवाल यह भी उठ रहा है कि जिन लोगों ने भाजपा समर्थित प्रत्याशियों को जनपद जिला पंचायत सदस्य चुनाव में हराया उन्हें भाजपा ने गले क्यों लगाया। जब कार्यवाही भाजपा की परम्परा है और भाजपा अनुशासन वाली पार्टी है तो जिला पंचायत सदस्य राजेश साहू को पार्टी ने क्यों पार्टी से निष्कासित नहीं किया वहीं संगीता सोनवानी को भी भाजपा प्रत्याशी को हार तक पहुंचाने के बाद भी भाजपा ने तत्काल स्वीकार कर लिया। कुल मिलाकर राजेश साहू के निष्कासन नहीं किए जाने को लेकर सवाल उठ रहे हैं। राजेश साहू के मामले में तो एक मामला यह भी था जो निष्कासन के लिए आधार था वह था पुलिस में शिकायत कर भाजपा नेताओं के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज कराने का। भाजपा नेताओं के साथ मारपीट और उसके बाद प्राथमिकी भी दर्ज कराने का आरोप राजेश साहू समर्थकों पर लगा था बावजूद उन्हें निष्काशित नहीं किया गया। राजेश साहू का निष्कासन क्यों रुका यह सवाल अब सभी उठा रहे हैं जब सौभाग्यवती पर कार्यवाही हुई है।
भाजपा की कार्यवाही से सौभाग्यवती सिंह को लगा झटका,जिस वजह से वह शपथ ग्रहण कार्यक्रम में भी नहीं हुई शामिलःसूत्र
सूत्रों का दावा है कि पार्टी से छः साल के निष्कासन के निर्णय को लेकर सौभाग्यवती सिंह को बड़ा झटका लगा और उन्हें विश्वास नहीं हुआ और उन्होंने इसी वजह से जिला पंचायत में आयोजित प्रथम सम्मिलन में भाग नहीं लिया। बिना सौभाग्यवती की उपस्थिति के ही प्रथम सम्मिलन संपन्न भी हुआ। सभी जिला पंचायत सदस्य जहां मौजूद थे वहीं सौभाग्यवती सिंह की पूछ परख पार्टी नेताओं ने भी नहीं की, कुल मिलाकर पार्टी के लोगों ने तव्वजो नहीं दिया और कार्यक्रम सम्पन्न कराकर चले गए। कार्यक्रम में सौभाग्यवती की उपस्थिति नहीं होना अन्य लोगों के लिए चर्चा का विषय रही।
एक सदस्य के उपस्थित न होने के बाद भी शपथ ग्रहण समारोह का हुआ आयोजन
एक जिला पंचायत सदस्य उपस्थित नहीं हुआ उसके बावजूद प्रथम सम्मिलन संपन्न हुआ। अब शपथ ग्रहण में या सम्मिलन में क्या बिना एक सदस्य की उपस्थिति कार्यक्रम सम्पन्न करना सही है इसकी जानकारी तो संबंधित आयोजक देंगे या फिर एक सदस्य सौभाग्यवती का शपथ बाद में कभी कराया जाए यह भी संभव है। वैसे भाजपा नेताओं ने सौभाग्यवती की अनुपस्थिति को लेकर कोई भी प्रतिक्रिया नहीं दी और न किसी का ध्यान इस तरफ जाने दिया।
विधायक समर्थित लोग कार्यक्रम से हुए किनारे जिलाध्यक्ष समर्थित ही कार्यक्रम में रहे उपस्थित
जिला पंचायत के प्रथम सम्मिलन के दिन आयोजित कार्यक्रम में विधायक समर्थक लोग किनारे नजर आये।केवल जिलाध्यक्ष भाजपा समर्थित लोग ही कार्यक्रम में मौजूद रहे। विधायक की ही गुट की सौभाग्यवती सिंह मानी जाती हैं और उनके साथ अन्य कई ग्रामीण शहरी क्षेत्र के नेता कार्यक्रम से दूरी बनाए रखे।
क्या कांग्रेस इस मौके को लाभ उठाकर सौभाग्यवती सिंह को पार्टी में शामिल कराने का प्रयास करेगी?
प्रथम सम्मेलन की मिठाई खाने कांग्रेस नेता जिला पंचायत पहुंचे और उन्होंने कार्यक्रम में उपस्थित होकर जिला कांग्रेस की उपस्थिति दर्ज कराई। चुनाव के दौरान नदारद रही कांग्रेस की प्रथम सम्मिलन में उपस्थिति वजनदार उपस्थिति के बाद यह सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस सौभाग्यवती सिंह के भाजपा से निष्कासन का फायदा उठाने का प्रयास करेगी? क्या वह सौभाग्यवती सिंह को कांग्रेस में प्रवेश का आमंत्रण देगी। वैसे यह देखने वाली बात होगी वहीं कांग्रेस के वर्तमान प्रदर्शन को देखते हुए लगता नहीं वह ऐसा कुछ करने वाली है या ऐसा कुछ करके वह सफल होगी।
सौभाग्यवती इस समय दुविधा में हैं फंसी हुई
सौभाग्यवती सिंह इस समय दुविधा में फंसी हुई हैं। वह विधायक की खास समर्थक हैं इस नाते वह जल्दी पार्टी नहीं छोड़ सकती जल्दी वहीं यदि ऐसा कोई निर्णय लेती भी हैं तो अभी नए दल में जाना सही निर्णय होगा नहीं क्योंकि चार साल भाजपा की सत्ता है, कुल मिलाकर सौभाग्यवती सिंह हाल फिलहाल में असमंजस में हैं।


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