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रायपुर@महाराष्ट्र में तुकाराम मुंढे, छत्तीसगढ़ में कौन? खाद्य सुरक्षा के नाम पर आखिर किसका चल रहा राज?

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  • मिठाई में मिलावट खोजनी थी, विभाग कुर्सियों की मिठास में उलझ गया खाद्य एवं औषधि प्रशासन!
  • जनता की थाली में मिलावट, विभाग की फाइलों में च्सब ठीकज्…कौन बनेगा छत्तीसगढ़ का तुकाराम मुंढे?
  • खाद्य सुरक्षा विभाग में ‘सेफ’ कौन? जनता की थाली या अधिकारियों की कुर्सियां?
  • मिलावटखोर बेखौफ,विभाग में कुर्सियों का खेल,छत्तीसगढ़ को अब तुकाराम मुंढे का इंतजार…
  • छत्तीसगढ़ में कौन बनेगा तुकाराम मुंढे? खाद्य एवं औषधि प्रशासन में जनता की थाली से ज्यादा कुर्सियों की चिंता!
  • जनता की थाली असुरक्षित,विभाग में कुर्सियों की सुरक्षा पक्की! खाद्य एवं औषधि प्रशासन पर व्यंग्यात्मक सवाल
  • कौन देखेगा जनता की थाली? खाद्य एवं औषधि प्रशासन में कार्रवाई से ज्यादा तबादले-पदोन्नति की चर्चा
  • खाद्य सुरक्षा की कुर्सी पर कौन? छत्तीसगढ़ में तुकाराम मुंढे की जरूरत या व्यवस्था सुधारने की?
  • जनता की थाली में मिलावट,विभाग की फाइलों में ‘सब ठीक’…कौन बनेगा छत्तीसगढ़ का तुकाराम मुंढे?


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,18 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। महाराष्ट्र के खाद्य एवं औषधि प्रशासन की मौजूदा आधिकारिक जानकारी में तुकाराम मुंढे को आयुक्त बताया गया है,और विभाग अपने मूल उद्देश्य को खाद्य पदार्थों,दवाइयों और कॉस्मेटिक्स की सुरक्षा,गुणवत्ता तथा नियामकीय अनुपालन सुनिश्चित करना बताता है,यही वह बिंदु है जहां से छत्तीसगढ़ के लिए एक असहज लेकिन जरूरी सवाल निकलता है कि आखिर यहां कौन बनेगा तुकाराम मुंढे?
यह सवाल किसी अधिकारी को महान और किसी को निकम्मा घोषित करने के लिए नहीं है, सवाल व्यवस्था का है,खाद्य एवं औषधि प्रशासन का नाम सुनते ही आम आदमी की उम्मीद बहुत सीधी होती है की उसकी थाली में सुरक्षित भोजन पहुंचे,दूध-मिठाई-मसाले में मिलावट न हो,दवा मानक के अनुरूप हो और नकली या अमानक उत्पाद बाजार में टिक न पाए,महाराष्ट्र एफडीए की आधिकारिक जानकारी भी निरीक्षण, निगरानी और अमानक, मिलावटी,नकली या प्रतिबंधित खाद्य एवं दवा उत्पादों के विरुद्ध कार्रवाई को अपनी मूल भूमिका का हिस्सा बताती है,लेकिन छत्तीसगढ़ में पिछले कुछ समय से विभाग की चर्चा का बड़ा हिस्सा यदि तबादला,पदस्थापना, अतिरिक्त प्रभार,पदोन्नति और कथित वसूली के आरोपों के इर्द-गिर्द घूमने लगे,तो फिर जनता को यह पूछने का पूरा अधिकार है कि उसकी थाली और उसकी दवा की सुरक्षा का नंबर आखिर कब आएगा?
त्योहार आया,अभियान आया, त्योहार गया,क्या निगरानी भी गई?-मिलावट के खिलाफ अभियान जरूरी हैं,त्योहारों के समय मिठाई और खाद्य पदार्थों की जांच भी जरूरी है, लेकिन व्यंग्य यहीं से शुरू होता है की अगर मिलावट सिर्फ त्योहारों में पैदा होती है तो अभियान पर्याप्त है,लेकिन यदि मिलावट सालभर चलती है तो फिर विभाग की निगरानी भी सालभर चलनी चाहिए,एक दिन में कुछ दुकानों से नमूने लेना और उसे पूरे जिले की खाद्य सुरक्षा का प्रमाण-पत्र मान लेना आसान है,कठिन काम है लगातार निगरानी,वैज्ञानिक नमूना संग्रह,प्रयोगशाला परीक्षण,समयबद्ध कार्रवाई और दोषी पर समान कानून लागू करना,महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट पर शिकायत,प्रवर्तन और विभागीय संपर्क व्यवस्था भी प्रकाशित है, छत्तीसगढ़ में भी यदि ऐसी पारदर्शिता बढ़े तो सवाल कम और भरोसा ज्यादा होगा।
सबसे गंभीर आरोप…कार्रवाई या कथित ‘रेट’? छत्तीसगढ़ के खाद्य एवं औषधि प्रशासन को लेकर सार्वजनिक चर्चा में कथित वसूली और कार्रवाई के नाम पर लेन-देन के आरोप भी सामने आते रहे हैं,इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि के बिना उन्हें तथ्य नहीं कहा जा सकता,लेकिन आरोप बार-बार सामने आएं तो उन्हें जांच के बिना दफन कर देना भी स्वस्थ प्रशासन नहीं है,निष्पक्ष रास्ता एक ही है…जांच करिए,आरोप गलत है तो अधिकारी को क्लीन चिट दीजिए,सही है तो दोषी पर कार्रवाई कीजिए,लेकिन चुप्पी को जवाब मान लेना सबसे खराब विकल्प है,क्योंकि खाद्य सुरक्षा अधिकारी की कुर्सी का काम ‘रेट तय करना’ नहीं,मानक तय कराना है,यदि व्यापारी नियम तोड़ता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई हो, यदि वह नियमों का पालन करता है तो उसे बेवजह परेशान न किया जाए,यही नियामक की विश्वसनीयता है।
विजय चौधरी,दीपक अग्रवाल,राजेंद्र कटारा या अमित कटारिया…कसौटी नाम नहीं,काम होना चाहिए…विभाग से जुड़े विमर्श में दीपक अग्रवाल,राजेंद्र कटारा,अमित कटारिया और विजय चौधरी जैसे नामों को लेकर चर्चाएं होती रही हैं,लेकिन किसी अधिकारी को केवल आरोपों के आधार पर ईमानदार या भ्रष्ट घोषित करना पत्रकारिता नहीं होगी,असली कसौटी उनका रिकॉर्ड है, कितने निरीक्षण? कितने नमूने? कितने फेल? कितने अभियोजन? कितनी अंतिम कार्रवाई? कितनी शिकायतों का निस्तारण? कितने अधिकारियों पर कार्रवाई? कितने बड़े कारोबारी कानून के दायरे में आए? यही रिपोर्ट कार्ड होना चाहिए, यदि यह रिकॉर्ड अच्छा है तो विभाग को किसी ‘मुंढे’ की जरूरत नहीं,और यदि रिकॉर्ड कमजोर है तो केवल पदनाम बदलने से जनता का भरोसा वापस नहीं आएगा।
अमित कटारिया तक सही जानकारी पहुंच रही है या सिर्फ सुंदर फाइलें?-किसी भी आयुक्त के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि नीचे से ऊपर आने वाली सूचना कितनी सही है,आयुक्त हर दुकान पर खुद नहीं जा सकता, वह अधिकारियों की रिपोर्ट पर निर्णय लेता है,इसलिए सवाल केवल आयुक्त की नीयत का नहीं,सूचना तंत्र की विश्वसनीयता का भी है,अगर नीचे सब ठीक है तो शिकायतों का निस्तारण तेजी से होना चाहिए,अगर शिकायत सही है तो कार्रवाई होनी चाहिए, और यदि शिकायत झूठी है तो शिकायतकर्ता को कारण सहित जवाब मिलना चाहिए,वरना ऊपर बैठे अधिकारी को फाइल में प्रदेश बिल्कुल चमकदार दिख सकता है और जमीन पर जनता कुछ और देख सकती है,प्रशासन में इसे ही शायद ‘फाइल की हरी तस्वीर और बाजार की काली सच्चाई’ कहा जा सकता है।
क्या नितेश मिश्रा जैसे अधिकारी पर भरोसा करे छत्तीसगढ़?-खाद्य एवं औषधि प्रशासन में अधिकारी की कुर्सी सिर्फ सरकारी कुर्सी नहीं,जनता की थाली और दवा की सुरक्षा की जिम्मेदारी है, ऐसे में जब किसी अधिकारी की लंबे समय तक एक ही संभाग में पदस्थापना,कई जिलों के अतिरिक्त प्रभार और महत्वपूर्ण विभागीय जिम्मेदारियों को लेकर सवाल उठें,तो जनता का सवाल भी स्वाभाविक है—भरोसा किस आधार पर किया जाए? नितेश कुमार मिश्रा का पक्ष है कि उनकी पदस्थापनाएं शासन के आदेश से हुईं और वर्तमान में भी कई अधिकारी एक से अधिक जिलों का दायित्व संभाल रहे हैं, यह पक्ष अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन व्यंग्य यहीं है…अगर सब कुछ शासन के आदेश से हुआ,तो फिर आदेशों की पूरी फाइल सार्वजनिक कर दीजिए,जनता भी देख ले कि यह प्रशासनिक दक्षता थी या विभागीय व्यवस्था का कोई खास ‘फॉर्मूला’,दस वर्षों तक एक ही संभाग के आसपास मूल और अतिरिक्त प्रभारों का सिलसिला,फिर पदोन्नति के बाद गृह क्षेत्र के आसपास जिम्मेदारी—इसे संयोग कहा जाए,योग्यता कहा जाए या फिर सरकारी सेवा का ऐसा भाग्य जिसे हर अधिकारी हासिल करना चाहे? सवाल यह भी है कि एक अधिकारी को बार-बार महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां मिलने के पीछे विभागीय कसौटी क्या थी। क्या उपलब्धियां थीं? क्या निरीक्षण और कार्रवाई का रिकॉर्ड था? कितने नमूने लिए गए,कितने अमानक पाए गए और कितनों पर प्रभावी कार्रवाई हुई? क्योंकि खाद्य सुरक्षा अधिकारी की असली परीक्षा यह नहीं कि वह कितनी कुर्सियां संभाल सकता है,बल्कि यह है कि वह जनता की थाली कितनी सुरक्षित रख सकता है,और आखिर में सबसे सीधा सवाल क्या छत्तीसगढ़ को ऐसे अधिकारी पर आंख मूंदकर भरोसा करना चाहिए,या सरकार को पहले उनके पूरे कार्यकाल,पदस्थापनाओं,अतिरिक्त प्रभारों और विभागीय निर्णयों का स्वतंत्र एवं पारदर्शी ऑडिट कराकर जनता को बताना चाहिए कि ‘होनहार अधिकारी’ की सरकारी परिभाषा आखिर है क्या? रिपोर्ट कार्ड चाहिए…
तुकाराम मुंढे का नाम यहां किसी चमत्कारिक समाधान की तरह इस्तेमाल नहीं होना चाहिए, किसी भी अधिकारी का मूल्यांकन काम से होना चाहिए,महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन की आधिकारिक वेबसाइट स्वयं सुरक्षित भोजन, सुरक्षित दवाएं,सुरक्षित महाराष्ट्र को मिशन के रूप में प्रस्तुत करती है और खाद्य-दवा सुरक्षा को विभाग का केंद्रीय उद्देश्य बताती है, छत्तीसगढ़ को भी यही चाहिए…सुरक्षित भोजन, सुरक्षित दवाएं,सुरक्षित छत्तीसगढ़,लेकिन इसके लिए पहले यह देखना होगा कि विभाग का रिपोर्ट कार्ड क्या कहता है,पिछले एक वर्ष में जिलेवार कितने नमूने लिए गए? कितने फेल हुए? फेल नमूनों पर क्या कार्रवाई हुई? कितने मामले न्यायालय तक पहुंचे? कितने मामलों में दंड हुआ? कितनी शिकायतें आईं और कितनी का निस्तारण हुआ? अगर इन सवालों के जवाब साफ हैं तो फिर तुकाराम मुंढे की तलाश की जरूरत नहीं,छत्तीसगढ़ का कोई भी अधिकारी अपने काम से खुद उदाहरण बन सकता है।
व्यंग्य का आखिरी सवाल…मिठाई कौन देखेगा,कुर्सी कौन?
खाद्य एवं औषधि प्रशासन में अगर सब कुछ नियम से चल रहा है तो चिंता की कोई बात नहीं,फाइल खोलिए,नियम दिखाइए,डीपीसी की नोटशीट बताइए,निरीक्षण के आंकड़े रखिए और सवाल खत्म कीजिए,लेकिन यदि जनता की थाली की सुरक्षा वाली कुर्सी पर बैठकर सबसे ज्यादा चर्चा उसी कुर्सी की हो रही है,तो सवाल उठेंगे ही,महाराष्ट्र में तुकाराम मुंढे हैं पर छत्तीसगढ़ में कौन होगा? कौन ऐसा अधिकारी होगा जो मिठाई की दुकान पर सिर्फ मिठाई नहीं, मिलावट भी देखेगा? कौन ऐसा होगा जो दवा की दुकान पर सिर्फ लाइसेंस नहीं,दवा की गुणवत्ता भी देखेगा? कौन ऐसा होगा जो छोटे दुकानदार से नियम पूछते समय बड़े कारोबारी से भी वही सवाल पूछेगा? कौन ऐसा होगा जो अधीनस्थ की सुंदर रिपोर्ट देखकर संतुष्ट होने के बजाय कभी-कभी बाजार की सच्चाई भी देखेगा? क्योंकि अंततः खाद्य एवं औषधि प्रशासन की असली कुर्सी रायपुर के कार्यालय में नहीं,जनता की थाली और मरीज की दवा में है,और यही इस पूरे मामले का सबसे बड़ा व्यंग्य है की जिस विभाग को जनता के खाने और दवा की शुद्धता देखनी है,उसकी अपनी व्यवस्था कितनी शुद्ध है, इसका टेस्ट भी अब जनता ही ले रही है।
विभाग का असली काम कहीं फाइलों के नीचे तो नहीं दब गया?
खाद्य एवं औषधि प्रशासन कोई ऐसा विभाग नहीं है जहां केवल फाइलों का वजन देखकर काम की सफलता मापी जाए,यहां असली परीक्षा बाजार में होती है,मिठाई की दुकान पर,होटल की रसोई में,दूध के कारोबार में,खाद्य निर्माण इकाई में,दवा दुकान में और उस प्रयोगशाला में जहां नमूनों की जांच होती है,आधिकारिक नियामकीय ढांचे में खाद्य सुरक्षा अधिकारी को निर्धारित योग्यता के आधार पर नियुक्त किया जाता है और वह खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन से जुड़ा मैदानी अधिकारी होता है,नामित अधिकारी को निरीक्षण,नमूने,शिकायतों और आगे की कार्रवाई की निगरानी जैसी जिम्मेदारियां दी गई हैं,यानी व्यवस्था का मकसद साफ है की कानून कागज पर नहीं,बाजार में दिखाई दे,अब सवाल है कि छत्तीसगढ़ में कितने निरीक्षण नियमित होते हैं? कितने नमूने लिए जाते हैं? कितने नमूने फेल होते हैं? फेल नमूनों पर कितने मामलों में अभियोजन या दंड होता है? कितने बड़े होटल और खाद्य निर्माता उसी कठोरता से जांचे जाते हैं जिस कठोरता से छोटा दुकानदार जांचा जाता है? और सबसे महत्वपूर्ण…क्या कार्रवाई का रिकॉर्ड सार्वजनिक रूप से इतना पारदर्शी है कि आम आदमी खुद देख सके कि विभाग ने क्या किया? अगर जवाब आंकड़ों में है तो आंकड़े सामने आने चाहिए,क्योंकि प्रेस विज्ञप्ति विभाग की उपलब्धि बता सकती है,लेकिन आंकड़े विभाग की असली परीक्षा बताते हैं।
छोटे दुकानदार पर डंडा,बड़े पर सन्नाटा तो सवाल उठेंगे…
एक पुराना सवाल फिर सामने आता है की क्या विभाग की कार्रवाई सब पर समान है? छोटे दुकानदार की दुकान में जांच आसान है,लेकिन बड़े होटल,बड़े खाद्य निर्माता,प्रभावशाली कारोबारी और बड़े प्रतिष्ठान भी क्या उसी नियमितता से जांचे जाते हैं? यदि विभाग कहता है कि हां, तो जिलेवार और श्रेणीवार आंकड़े सार्वजनिक करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए,कितने निरीक्षण हुए, कितने नमूने लिए गए और कितने मामलों में कार्रवाई हुई…यह सामने आते ही चर्चा आरोप से तथ्य पर आ जाएगी,कानून की असली ताकत तब दिखाई देती है जब उसका वजन दुकान के आकार से नहीं,उल्लंघन की गंभीरता से तय होता है।
सुर्खियों में विभाग का मूल
काम कम,कुर्सियों की चर्चा ज्यादा क्यों?

खाद्य एवं औषधि प्रशासन को लेकर हालिया बहसों में पदोन्नति, पदस्थापना, अतिरिक्त प्रभार और स्थापना शाखा के निर्णयों पर सवाल उठे हैं,नमूना सहायक से खाद्य सुरक्षा अधिकारी पद पर 13 कर्मचारियों की पदोन्नति और इसी वर्ष नमूना सहायक के 30 पदों की भर्ती का विज्ञापन भी इसी व्यापक चर्चा का हिस्सा बना है, इन निर्णयों को सही या गलत बताने के लिए लागू सेवा नियम,पदोन्नति कोटा, पात्रता,डीपीसी की कार्यवाही और स्वीकृत पदों की वास्तविक स्थिति देखना जरूरी है, लेकिन एक सवाल तो बनता ही है—विभाग की दीर्घकालिक मानव संसाधन नीति आखिर है क्या? अगर तकनीकी पदों की कमी है तो सीधी भर्ती कब होगी? अगर पदोन्नति से पद भरने हैं तो उसका स्पष्ट कोटा क्या है? अगर दोनों रास्ते हैं तो दोनों का अनुपात कितना है? और यदि कोई कर्मचारी पदोन्नति से तकनीकी पद पर पहुंच रहा है तो उसकी योग्यता और अनुभव का परीक्षण किस स्तर पर हुआ?


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